Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
175
अध्याय 175 / 232

Adhyaya 175

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अध्याय १७५

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे गोपेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुःसप्तत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १७५ श्रीमार्कण्डेय उवाच: उत्तरे नर्मदाकूले भृगुक्षेत्रस्य मध्यतः ।कपिलेश्वरं तु विख्यातं विशेषात्पापनाशनम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe gopeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma catuḥsaptatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 175 śrīmārkaṇḍeya uvāca: uttare narmadākūle bhṛgukṣetrasya madhyataḥ / kapileśvaraṃ tu vikhyātaṃ viśeṣātpāpanāśanam

हिन्दी अर्थ

त॑ प्रसेनजिते दिव्यं मणिरत्नं स्थमन्तकस् । ददो श्रात्रे नरपतिः प्रेम्णा शक़जिदुत्तमम् (३० + स्थमन्तको नाम मणियंस्य राष्ट्रे स्थितों भवेत् । कालवर्षो च पर्जन्यो न च व्याधिभयं तदा ॥३ १ लिप्सां चक प्रसेनात्त मणिरत्न स्थमन्तकम् । गोबिन्दो न च त॑ लेभे शक्तोषपि न जहार च

English

(Defective verse) Proudly he went to Lanka. With his bow and five hundred arrows he overpowered Ravana along with his army. He defeated and brought him to Mahismatl and imprisoned him there.

अध्याय १७५

श्लोक 2

यो ऽसौ सनातनो देवः पुराणे परिपठ्यते ।वासुदेवो जगन्नाथः कपिलत्वमुपागतः

yo 'sau sanātano devaḥ purāṇe paripaṭhyate / vāsudevo jagannāthaḥ kapilatvamupāgataḥ

हिन्दी अर्थ

कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूषितः । स्थभन्तककृते सिहाद्वधं प्राप्त: सुदारुणम् 0३ ३ तत्कर्म कृष्णस्प ततो वुष्ण्यन्धकमहत्तरा: । सणो गुध्नुं तु मन्‍्वानास्तसेव विशशद्धिरे

English

(Sage) Pulastya himself went to Arjuna and propitiat¬ ed him. The king released Paulastya (Ravana) at the request of Pulastya.

अध्याय १७५

श्लोक 3

पातालं सुतलं नाम तस्यैव नितलं ह्यधः ।गभस्तिगं च तस्याधो ह्यन्धतामिस्रमेव च

pātālaṃ sutalaṃ nāma tasyaiva nitalaṃ hyadhaḥ / gabhastigaṃ ca tasyādho hyandhatāmisrameva ca

हिन्दी अर्थ

मिथ्याभिशस्त तेभ्यस्तां बलवानरिसुदनः । अम्ृष्यम्ाणो भगवान्वनं स विचचार ह

English

The sound produced by the twang of the bowstrings by his thousand arms was like the thunder at the time of the close of the Yugas, when the trees* of the clouds of dissolution seem to burst.

अध्याय १७५

श्लोक 4

पातालं सप्तमं यच्च ह्यधस्तात्संस्थितं महत् ।वसते तत्र वै देवः पुराणः परमेश्वरः

pātālaṃ saptamaṃ yacca hyadhastātsaṃsthitaṃ mahat / vasate tatra vai devaḥ purāṇaḥ parameśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

स तु प्रसेनो मृगयासचरतत्र चाप्यथ । प्रसेनस्य पर गृह्य पुरुषेराप्तकारिभिः ३३७ अपने पुर में प्रवेश किया । लोग यह समझकर उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे कि यह सूर्य जा रहे हैं।” इस प्रकार नगर निवासियों को तथा अन्तः पुर को उस मणिद्वारा विस्मय विमुग्ध कर राजा शक्रजित ने दिव्य मणि को अपने भाई प्रसेनजित को प्रेमपुर्वक प्रदान कर दिया ।२७-३०। उस स्यथमन्तक भणि के विषय में यह प्रसिद्धि है कि वह जिस राष्ट्र में रहता है, वहाँ सेघ समय समय पर वष्टि करते हैं, और वहाँ व्याधियों का भय नहीं

English

Sad indeed that his thousand powerful arms were cut off by Bhargava (Parasurama) in battle, as though they were gol¬ den palm trees.

अध्याय १७५

श्लोक 5

स ब्रह्मा स महादेवः स देवो गरुडध्वजः ।पूज्यमानः सुरैः सिद्धैस् तिष्ठते ब्रह्मवादिभिः

sa brahmā sa mahādevaḥ sa devo garuḍadhvajaḥ / pūjyamānaḥ suraiḥ siddhais tiṣṭhate brahmavādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

रहता । गोविन्द के मत में उस स्थमस्तक मणि को प्रसेतजित से ले लेने की इच्छा हुई, किश्तु सामथ्य रखते हुए भी उन्होंने उसे प्रसेतजित से छीना नहीं । एक बार कभी उस सुरदर मणि से विभूषित होकर प्रसेनजित शिकार के लिये वन को गये, वहाँ उसी स्यमन्तक के कारण एक सिंह ने उनको मार डाला । रीछराज जाम्बवान ने उस सिह को मार डाला, भौर स्यमन्तक को लेकर अपने बिल में प्रवेश किया। महान् वृष्णि,

English

Once upon a time, the thirsty Sun-god begged alms of him.. The Lord of the people bestowed on the Sun-god the seven continents as alms.

अध्याय १७५

श्लोक 6

वसतस् तस्य राजेन्द्र कपिलस्य जगद्गुरोः ।विनाशं चाग्रतः प्राप्ताः क्षणेन सगरात्मजाः

vasatas tasya rājendra kapilasya jagadguroḥ / vināśaṃ cāgrataḥ prāptāḥ kṣaṇena sagarātmajāḥ

हिन्दी अर्थ

अन्धकों के वंशजों ने इस हत्या कर्म की शंका कृष्ण के ऊपर की, उसी मणि की लालच से कृष्ण ने ऐसा किया! इस प्रकार की आशंकाएं सबों के मत में हुईं । शत्रुम॒दंत बलवान भगवान् कृष्ण इस सिंथ्या अपवाद को उन लोगों द्वारा सुनकर सहन न कर सक्रे और तुरन्त वन को प्रस्थित हुए ।११-३६। प्रसेनजित जिस स्थान पर शिकार खेलने के लिये गये थे, उसी स्थान को प्रसेन के पदचिन्हों को जानकर लोगों से पता लगाकर अनुसरण करते हुए कृष्ण चले। और इस प्रकार ऋक्षवान् गिरिवर और पव॑तश्रेष्ठ विन्ध्याचल में घूमतै-घूमते वे बहुत परेशान हो गये । वहाँ पर महामनस्वी कृष्ण ने घोड़े समेत प्रसेन को मरा हुआ पाया पर मणि को

English

With a desire to consume (everything), the Sun-god blazed at the tips of his arrows and burnt cities, cowherd colonies, villages and all the towns.

अध्याय १७५

श्लोक 7

भस्मीभूतांस्तु तान्दृष्ट्वा कपिलो मुनिसत्तमः ।जगाम परमं शोकं चिन्त्यमानो ऽथ किल्बिषम्

bhasmībhūtāṃstu tāndṛṣṭvā kapilo munisattamaḥ / jagāma paramaṃ śokaṃ cintyamāno 'tha kilbiṣam

हिन्दी अर्थ

+ एतदर्धस्थान इमे अर्धे --'स्यमन्तकर्माण रत्न धृष्यकं॑ स्व॑ निवेशने! इति ख. पृस्तके 'स्यमम्तकेमर्णि रत्न दुश्यकस्त न्रिवेशने' इति घ. पुस्तके ।

English

Thanks to the prowess of that chief of men (Arjuna) the (Sun-god) of great fame burnt the mountains and forests of Kartavirya.

अध्याय १७५

श्लोक 8

सर्वसङ्गपरित्यागे चित्ते निर्विषयीकृते ।अयुक्तं षष्टिसहस्राणां कर्तं मम विनाशनम्

sarvasaṅgaparityāge citte nirviṣayīkṛte / ayuktaṃ ṣaṣṭisahasrāṇāṃ kartaṃ mama vināśanam

हिन्दी अर्थ

प्ध्र वायुपु राणम् साश्व॑ हतं प्रसेन॑ तं नाविन्दत्तत्र वे मणिम् । अथ सिंहः प्रसेनस्थ शरोरस्थाविदृरतः

English

The Sun-god in the company of Haihaya (Kartavirya) burnt everything including continents along with forests. He burnt the empty hermitage of Varuna's son completely.

अध्याय १७५

श्लोक 9

कृतस्य करणं नास्ति तस्मात्पापविनाशनम् ।गत्वा तु कापिलं तीर्थं मोचयाम्यघमात्मनः

kṛtasya karaṇaṃ nāsti tasmātpāpavināśanam / gatvā tu kāpilaṃ tīrthaṃ mocayāmyaghamātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रसेनमवर्धीत्सिह: सिहो जाम्बता हतः सुकुमारक मा रोदीस्तव होष स्यमन्‍्तकः

English

Varuna had obtained this glorious and excellent son formerly. He was famous by the name of sage Vasistha other- wise known as Apava.

अध्याय १७५

श्लोक 10

पातालं तु ततो मुक्त्वा कपिलो मुनिसत्तमः ।तपश्चचार सुमहन्नर्मदातटमास्थितः

pātālaṃ tu tato muktvā kapilo munisattamaḥ / tapaścacāra sumahannarmadātaṭamāsthitaḥ

हिन्दी अर्थ

व्यक्तोकृतं च शब्द त॑ तुर्णं सोडषपि ययौ बिलम्। अपश्यच्च बिलाम्यासे प्रसेनमवदारितम् ॥४ ३ प्रविश्य चापि भगवांस्तदक्षबिलमञ्जसा । ददर्श ऋक्षराजानं जाम्बवन्तमुदारधीः ४४ पुयु्े वासुदेवस्तु बिले जाम्बब॒ता सह । बाहुश्यामेव गोविन्दों दिवसानेर्कावशतिम् प्रविष्टे च बिल कृष्णे वासुदेवपुरः सराः । पुनर्हारवतामेत्य हतं कृष्णं स्यवेदयन्

English

Out of anger the powerful Apava cursed Arjuna then, 1 O Haihaya, since you have not spared this forest of mine another man will set aside even this difficult task achieved by you. He will be Kuntl's son named Arjuna. 2 He will not be a king.

अध्याय १७५

श्लोक 11

व्रतोपवासैर्विविधैः स्नानदानजपादिकैः ।परं निर्वाणमापन्नः पूजयन्रुद्रमव्ययम्

vratopavāsairvividhaiḥ snānadānajapādikaiḥ / paraṃ nirvāṇamāpannaḥ pūjayanrudramavyayam

हिन्दी अर्थ

वासुदेवस्तु निजित्य जाम्बवन्तं महाबलम् । लेभे जाम्बबतीं कन्यामक्षराजस्थ संमताम् (३४७ भगवत्तेजसा ग्रस्तो जाम्बवान्प्रसभं मणिम् । सुतां जाम्बवती माशु विष्वक्सेनाय दत्तवान् ४८

English

O Arjuna, the extremely powerful Rama, the fore¬ most among those who strike with weapons, will cut off and shatter your thousand arms. The powerful. Brahmana and Sage of great strength will kill you." Then, as a result of the curse of that intelligent (sage), Rama became the cause of his death.

अध्याय १७५

श्लोक 12

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत् परमेश्वरम् ।गोसहस्रफलं तस्य लभते नात्र संशयः

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram / gosahasraphalaṃ tasya labhate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

नहीं पाया । उसी प्रसेन के शव से थोड़ी दूर सिह को भी मरा हुआ पाया, वहाँ पर रीछ के पद चिद्नों से यह स्पष्ट पता चल रहा था कि रीछ ने सिंह को मारा। तदनस्तर यादव श्रौक्ृष्ण जी ने रीछ के उन्हीं पद चिन्हों से रीछ की गुफा का पता लगाया । उन्होंने उसकी विशाल बिल में स्त्री की आवाज सुनौ द्विजगण ! जाम्बवान की बिल में उसके लड़के को धाय प्रेमपूर्वक स्ममस्तक मणि को दिखलाकर यह कह रही थी कि 'बेटा मत रोओ' इसके अतिरिक्त वह इस प्रकार की बातें भो कह रही थी

English

Such a boon had been chosen by the king himself for¬ merly (from Datta). He had a hundred sons, five of whom were great warriors..

अध्याय १७५

श्लोक 13

ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे चतुर्दशी ।तत्र स्नात्वा विधानेन भक्त्या दानं प्रयच्छति

jyeṣṭhamāse tu samprāpte śuklapakṣe caturdaśī / tatra snātvā vidhānena bhaktyā dānaṃ prayacchati

हिन्दी अर्थ

घाय बोली--प्रसेनेजित को सिंह ने मारा, सिंह को जाम्बवान् ने मारा, मेरे सुकुमार बेटे ! तुम मत रोओ । यह स्यमन्‍्तक मणि तुम्हारा है।! धाय की यह वाणी सुनते ही कृष्ण शीक्षतापूर्वक उस बिल में प्रविष्ट हो गये, बिल के समीप ही वे प्रसेनजित् को मारा हुआ देख चुके थे। बिल में शौघ्रतापूर्वक प्रविष्ट होकर परम तेजस्वी उदारबुद्धि भगवान् क्रष्ण ने रीछराज जाम्बवान् कों देखा । और उसी बिल में ही

English

They were Surasena, Vrstyadya, Vr?a and Jaya- dhvaja. All of them were well-trained in the use of miraculous weapons. They were heroic, strong, pious-souled and re-

अध्याय १७५

श्लोक 14

पात्रभूताय विप्राय स्वल्पं वा यदि वा बहु ।अक्षयं तत्फलं प्रोक्तं शिवेन परमेष्ठिना

pātrabhūtāya viprāya svalpaṃ vā yadi vā bahu / akṣayaṃ tatphalaṃ proktaṃ śivena parameṣṭhinā

हिन्दी अर्थ

जाम्बवान् के साथ वासुदेव का युद्ध प्रारम्भ हो गया, बाहुद्वारा ही गोविन्द ने इक्कीस दिनों तक युद्ध क्रिया । उधर कृष्ण के बिल में प्रविष्ट हो जाने पर जब देरी होने लगी तो उनके साथियों ने द्वारकापुरी में लौटकर यह बात बतलाई कि कृष्ण तो मारे गये। इधर वासुदेव ने महाबलक्षाली रीछराज जाम्बवान को पराजित कर उसकी सम्मति से जाम्बवती नामक सुल्दरी कन्या को प्राप्त किया तेजोबल से अभिभूत होकर जाम्बवान् ने जबरदस्ती अपनी कन्या जाम्बंवती को और स्थमन्‍्तकमणि को

English

The curse motif and that of boon were very popular with Puraria- writers to explain an unlikely or miraculous, event. Here both are used to explain Kartavirya's death at the hands of Parasurama. Kartavirya is stated to have sought such a boon from Datta (supra v. 13) and received a curse from Apava Vasistha (w. 46-47) for destroying (i.c. helping the Sun-god to destroy) his hermitage.

अध्याय १७५

श्लोक 15

अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां नवमीषु च ।स्नानं करोति पुरुषो भक्त्योपोष्य वराङ्गना

aṅgārakadine prāpte caturthyāṃ navamīṣu ca / snānaṃ karoti puruṣo bhaktyopoṣya varāṅganā

हिन्दी अर्थ

बशंस्व्सुभ्यों भार्यास्यः शत्रुजित्त: शर्त सुताः। स्यातिमन्तस्त्रयस्तेषां भज्ञकारस्तु पुव॑ज: ३४३

English

Apava's curse was of a twofold nature. Kartavirya Arjuna will meet physical death at the hands of Parasurama and he will be superseded in reputation by another Arjuna (Kunti's son) for a similar act (viz. burn¬ ing of Kharujava forest).

अध्याय १७५

श्लोक 16

रूपमैश्वर्यमतुलं सौभाग्यं संततिं पराम् ।लभते सप्तजन्मानि नित्यं नित्यं पुनः पुनः

rūpamaiśvaryamatulaṃ saubhāgyaṃ saṃtatiṃ parām / labhate saptajanmāni nityaṃ nityaṃ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

अथ द्वारवती नाम भड्कारस्य सुप्रजा:। सुषवे सा कुमारीस्तु तिल्नो रूपगुणान्विताः ३५४ भव्रकारं ततो हत्वा शतधन्वा महाबलः। रात्रौ तं मणिमादाय ततोक्कलूराय दत्तवान् ४८

English

That king had the boon of never losing his wealth.

अध्याय १७५

श्लोक 17

पौर्णमास्याममावास्यां स्नात्वा पिण्डं प्रयच्छति ।तस्य ते द्वादशाब्दानि तृप्ता यान्ति सुरालयम्

paurṇamāsyāmamāvāsyāṃ snātvā piṇḍaṃ prayacchati / tasya te dvādaśābdāni tṛptā yānti surālayam

हिन्दी अर्थ

विष्वकसेन भगवान् कृष्ण को समपित कर दिया। भगवान् कृष्ण ने अपने ऊपर फैले हुए अपवादों की शुद्धि के लिये स्यमन्तकमणि को ऋक्षराज जमबवान् से ले लिया और उससे फिर अनुनय विनय कर बिल से बाहर आये इस प्रकार स्यमन्तक मणि को प्राप्त कर उन्होंने अपने पुरुषाथं से अपना अपयश्ञ दूर किया और ले जाकर समस्त सात्वत वंक्षियों के समक्ष श््कोजित को समपित किया । तदनन्तर भगवान् मधुसूदन कृष्ण ने जाम्बवती

English

Why was the world (hermitage) of the noble-souied Apava burnt by Kartavirya forcibly? 1 Please explain it to us who ask.

अध्याय १७५

श्लोक 18

तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या दद्याद्दीपं सुशोभनम् ।जायते तस्य राजेन्द्र महादीप्तिः शारीरजा

tatra tīrthe tu yo bhaktyā dadyāddīpaṃ suśobhanam / jāyate tasya rājendra mahādīptiḥ śārīrajā

हिन्दी अर्थ

से अपना विवाह किया। इस प्रकार उस मिथ्या अपवाद से जनादंन भगवान् क्रृष्ण की मुक्ति हुई भगवान् कृष्ण के ऊपर फेलायी गयी इस् मिथ्या अपक्षीति को दूर करने का वृत्तान्त जो ध्यक्ति जानता है उसे कभी किसी प्रकार से इस प्रकार की मिथ्या अपकीर्ति का भाजन नहीं होना पड़ता। शत्रुजित से उसको दस पत्नियों में जो सब की सब संगी बहिन थीं, एक सौ पुत्र उत्तन्न हुए, उनमें तीन ख्यात हुए, उनमें सब से बड़ा पुत्र भूज़कार था । अन्य दो पुत्रों के नाम बलवान् ब्रतपति तथा सुप्रिय अपस्वान्त थे भृज्धकार को

English

We have heard that the saintly king was a protector of his subjects. Being a guardian, therefore, why did he destroy that hermitage? Aditya (the Sun-god) desirous of satisfaction (of hunger) approached Kartavirya in the guise of a Brahmana (and said), "Please give me food. Undoubtedly I am Adilya."

अध्याय १७५

श्लोक 19

तत्र तीर्थे मृतानां तु जन्तूनां सर्वदा किल ।अनिवर्तिका भवेत्तेषां गतिस्तु शिवमन्दिरात्

tatra tīrthe mṛtānāṃ tu jantūnāṃ sarvadā kila / anivartikā bhavetteṣāṃ gatistu śivamandirāt

हिन्दी अर्थ

स्‍त्री द्वारवती सुन्दर सन्‍्ततियों वाली थी, उसने तीन सर्वगुणसम्पन्न कन्याओं को उत्पन्न किया था । जिनमें स्त्रियों में परम सुन्दर सत्यभामा परम दृढ़ब्रतपरायण, तथा तपस्विनी थी। पिता ने उसे क्रृष्ण को समपित करने की बात की थी, क्ृष्ण ने जिस स्थमन्तक नामक वहुसूल्य मणि को शक्रजित् को दिया था, उसे बच्च ने धारण किया था । भोज वंशीय शतधन्वा ने उससे उस मणि को छीनकर अक्रूर को दे दिया

English

Verses 1-13 explain in details again why the hermitage of Apava Vasi?tha was burnt by Kartavirya. As these verses deal with the curse of Apava, they should have formed a part of the last chapter after v. 39. Vv. 1-13 hereof are unrelated to the present chapter (Race of Kro?tii)

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 175
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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