Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
176
अध्याय 176 / 232

Adhyaya 176

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अध्याय १७६

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कपिलेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चसप्ताधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १७६ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल पिङ्गलावर्तमुत्तमम् ।तीर्थं सर्वगुणोपेतं कामिकं भुवि दुर्लभम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe kapileśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcasaptādhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 176 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla piṅgalāvartamuttamam / tīrthaṃ sarvaguṇopetaṃ kāmikaṃ bhuvi durlabham

हिन्दी अर्थ

शतधन्वा ने परम सुन्दरी सत्यभामा की प्राप्ति के लिये अक्रर से सहायता की प्रार्थना की, अक्रूर ने उस मणिश्रेष्ठ स्यमम्तक की प्राप्ति की आश्या से उससे सहायता की याचना की । जिसपर रात्रि के समय सोते 5६४ वायुपुराणमें

English

O Lord Sun, please tell me with what you will be satisfied. What type of food I should give to you; I shall serve it.

अध्याय १७६

श्लोक 2

वाचिकं मानसं पापं कर्मजं यत्पुरा कृतम् ।पिङ्गलेश्वरमासाद्य तत्सर्वं विलयं व्रजेत्

vācikaṃ mānasaṃ pāpaṃ karmajaṃ yatpurā kṛtam / piṅgaleśvaramāsādya tatsarvaṃ vilayaṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

अक्ररस्तु तदा रत्नमादाव स नरघेभः । समय॑ कारणं चके बोध्यो नान्यस्त्वयेत्युत ५६ वयमम्युपपत्स्थामः कृष्णेन तय प्रधषित: सम च द्वारका सर्वा वशे तिथ्ठत्यसंशयम्

English

O most excellent one among donors, give unto me all the immobile beings as my food. I shall be satisfied only there¬ by O king, and not by anything else.

अध्याय १७६

श्लोक 3

तत्र स्नानं च दानं च देवखाते कृतं नृप ।अक्षयं तद्भवेत्सर्वमित्येवं शङ्करो ऽब्रवीत्

tatra snānaṃ ca dānaṃ ca devakhāte kṛtaṃ nṛpa / akṣayaṃ tadbhavetsarvamityevaṃ śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

ततस्त्वरितमागस्थ द्वारकां मधुसुदन: । पूर्वजं हलिनं श्रीमानिदं बचनसब्रवीत् हतः प्रसेनः सिहेन शत्रुजिच्छतधन्चना । स्थमन्तकमहुं मार्ग तस्य प्रहर है प्रभो ॥६ ५ तदारोह रथं शीघ्र भोज हत्वा महबलम् । स्यमन्‍्तको महाबाहो तदाउस्माकं भविष्यति १६६ ततः प्रवत्त रुद्धे तु तुमुले भोजकृष्णयो: । शतधन्वा न चाक़्रमवेक्षत्सवंतरों दिशि

English

O the most excellent one among those who blaze, no fiery splendour of human beings can burn down all immobile beings. I bow unto you.

अध्याय १७६

श्लोक 4

पृथिव्यां सर्वतीर्थेषु समुद्धृत्य शुभोदकम् ।मुक्तं तत्र सुरैः खात्वा देवखातं ततो ऽभवत्

pṛthivyāṃ sarvatīrtheṣu samuddhṛtya śubhodakam / muktaṃ tatra suraiḥ khātvā devakhātaṃ tato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

हुए भद्रकार को महाबलवान् दातधन्वा ने मारकर उस बहुमुल्य मणि को अक्रर को दे दिया। नरश्रष्ठ अक्रूर ने मणि को लेते समय उससे प्रतिज्ञा करा लिया कि हमारे षड्यन्त्र को तुम्हें किसी से नहीं बतलाना होगा । कृष्ण जब तुम्हें पीड़ित करेगे तो हम सब लोग तुम्हारी सहायता करेंगे। इसमें कोई भी सन्‍्देह नहीं है इस समय सारी द्वारिकापुरी हमारे वश में है । पिता के मारे जाने पर यशस्विनी सत्यभामा बहुत दुखी

English

I am delighted. I shall give you an inexhaustible quiver of arrows that are conducive to all happiness* and that never fail. When discharged they will burn because they are charged with my brilliance.

अध्याय १७६

श्लोक 5

युधिष्ठिर उवाच: कथं तु देवखातं तत्संजातं द्विजसत्तम ।सुराः सर्वे कथं तत्र मुमुचुर् वारि तीर्थजम् ।सर्वं कथय मे विप्र श्रवणे लम्पटं मनः

yudhiṣṭhira uvāca: kathaṃ tu devakhātaṃ tatsaṃjātaṃ dvijasattama / surāḥ sarve kathaṃ tatra mumucur vāri tīrthajam / sarvaṃ kathaya me vipra śravaṇe lampaṭaṃ manaḥ

हिन्दी अर्थ

हुई और रथ पर चढ़कर वारणावत नगर को गई ।५७-६१। बहाँ पहुँचकर उसने भोजवंशीय शतधस्बा के इस - दारुण कर्म को पति से निवेदन क्रिया और परम कातर होकर उसके बगल में बंठकर आँसू गिराती रही । वारणावत में पाण्डवों को जलजाने पर,हरि ने पिण्डादिक क्रियाएं सम्पन्न की और उस समय अपने भादयों . के स्थान पर सात्यकि को नियुक्ति किया । भगवान् मधुसुदन ने तुरन्त द्वारकापुरी में जाकर अपने बड़े भाई हलधर से सभी बातें बला कर यह निवेदन किया। है सवं-शक्ति-सम्पन्न ! जिस स्यमध्तक मणि के कारण सिंह ने प्रसेनजित् का निधन किया था, उसी के कारण शतधन्वा ने शत्रुजित् का निधन किया है, मैं उसी स्थमस्तक को चाहता हूं आप शतधन्वा का संहार करे । आप शीघ्र ही रथ पर सवार हों, है महाबाहु ! महाबलवान् भोज का संहार करने पर ही स्यमन्तक हम लोगों के हाथ लगेगा ।६२-६६। इस प्रकार

English

When it is commanded, it will dry up the clouds and the oceans. When it is dry, I will reduce it to ashes and shall be delighted thereby, O king!

अध्याय १७६

श्लोक 6

श्रीमार्कण्डेय उवाच: यदा तु शूलशुद्ध्यर्थं रुद्रो देवगणैः सह ।बभ्राम पृथिवीं सर्वां कमण्डलुधरः शुभाम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca: yadā tu śūlaśuddhyarthaṃ rudro devagaṇaiḥ saha / babhrāma pṛthivīṃ sarvāṃ kamaṇḍaludharaḥ śubhām

हिन्दी अर्थ

परामश् कर लेने के उपरान्त जब भगवान् कृष्ण और भोजवंशी शतबन्वा में तुमुल युद्ध छिड़ गया तब पू्षे- प्रतिज्ञा के अनुसार शत उन्‍्वा ने लड़ाई के मंदान में दसों दिसाओं में देखा पर अक्रूर का कहीं भी पता न लगा। रणक्षेत्र में भगवान् जनादंन ओर शतधन्वा घोड़े पर सवार थे; उस समय हृदय से मित्र तथा सहायता में समर्थ होने पर भी अक्रूर शतघन्वा की सहायता के लिए नहीं आए । इससे शतधश्वा बहुत भयभीत हुआ

English

Then Aditya gave Arjuna those arrows. Securing them, (Arjuna) burnt all the great immobile beings, hermitages, villages, cowherd colonies, cities, penance groves, beautiful forests and parks etc. and then circumambulated the Sun-god. The earth burnt down by the splendour of the Sun, became tree-less and grass-less.

अध्याय १७६

श्लोक 7

प्रभासाद्येषु तीर्थेषु स्नानं चक्रुः सुरास्तदा ।सर्वतीर्थोत्थितं तोयं पात्रे वै निहितं तु तैः

prabhāsādyeṣu tīrtheṣu snānaṃ cakruḥ surāstadā / sarvatīrthotthitaṃ toyaṃ pātre vai nihitaṃ tu taiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतिबेश ततो रामो सिथिलासरिसर्दतः सवंकाम एपहतमथिलेनेव पूजितः "७८ एतस्मिन्नेव काले तु बश्चुमंतिमतां बरः । नानारूपान्क्रतुस्सर्वानाजहार निरगेलान् ७६ और वहाँ से भाग निकलने की बात सोचने लगा । दातधरंवा की विज्ञात हृदया नाम की घोड़ी थी, जिसके द्वारा विचार करते ही करते सौ योजन दूर पहुँच गया । उसी दिव्य गुणसम्पन्न घोड़ी पर चढ़ कर वह भगवान् कष्ण से युद्ध कर रहा था। उस तीत्रवेगशालिनी घोड़ी के वेग को सौ योजन देखकर, और उस पर चढ़कर छातघन्तरा को भागते देखकर कृष्ण ने पीछा किया ॥६७-७१। दिजव॒न्द । भगवान् कृष्ण के पीछा करने

English

In the meantime the great sage (Apava) who had been residing under water for ten thousand years, completed his holy observance. Then the ascetic of great splendour emer¬ ged out (from water). The great sage then saw his hermitage burnt down by Arjuna. Out of anger he cursed the saintly king as already recounted by me to you.

अध्याय १७६

श्लोक 8

शूलभेदमनुप्राप्य शूलं शुद्धं तु शूलिनः ।तत्रोत्थमुदकं गृह्य आगता भृगुकच्छके

śūlabhedamanuprāpya śūlaṃ śuddhaṃ tu śūlinaḥ / tatrotthamudakaṃ gṛhya āgatā bhṛgukacchake

हिन्दी अर्थ

पर अति परिश्रम से प्रचुर परिमाण में पसीना निकलने के कारण शतधस्वा की घोड़ी के जब. प्राण निकल गये तब उध्होने बलराम से कहा, है महाबाहु ! आप यहीं रहिये, मैं देख रहा हूं, वह घोड़ी तो भर गई है, अतः पैदल ही जाकर स्यमन्तक मणि को मैं शैतधन्वा से छीन लाऊंगा। ऐसा कहकर परम अस्त्रवेत्ता भगवान् अच्युत ने पंदल ही जाकर भिथिलाधिपति-शतधन्वा कासंहार किया, किस्तु उस महा-

English

Listen to the race of the saintly king Krostu consi-

अध्याय १७६

श्लोक 9

तत्रापश्यंस्ततो ह्यग्निं च पिङ्गलाक्षं च रोगिणम् ।तपस्युग्रे व्यवसितं ध्यायमानं महेश्वरम्

tatrāpaśyaṃstato hyagniṃ ca piṅgalākṣaṃ ca rogiṇam / tapasyugre vyavasitaṃ dhyāyamānaṃ maheśvaram

हिन्दी अर्थ

बलशाली भोजवंशीय शतधरवा के मार डालने पर भी स्थमन्तक को उसके पास नहीं देखा। वहाँ से शतधम्या को मारकर जब भगवान् कृष्ण लौटे तब हलघर बलराम ने उनसे स्यमन्तक मणि माँगा ।७२-७५। कृष्ण ने कहा कि मणि तो वहाँ पर नहों मिला। उनकी इस बात से बलराम बहुत क्रुढ् हुए भोर अनेक बार जर्नादन को घिवकारा । बलराम ने आगे कहा, भाई के नाते तुम्हें मैं क्षमा प्रदान कर रहा हें, जाओ तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो जा रहा हूँ मेरा अब द्वारका से कोई सम्बन्ध नहीं है, और न तुमसे तथा बुष्णिवंशियों से हो कोई प्रयोजन है। छात्रुओं के विनाश करनेवाले बलराम जी ने कृष्ण से ऐसी बातें कर मिथिलापुरी में प्रवेश किया, वहाँ पर मिथिलावासियों ने उन्हें सभी प्रकार के उपहार अपित किये ओर बड़ा

English

Thus the heroic Citraratha performed many \ajnas giving vast wealth as Daksina. His successor was Sasabindu, who followed (the footsteps) of saintly kings.

अध्याय १७६

श्लोक 10

हविर्भागैस्तु विप्राणां राज्ञां चैवामयाविनाम् ।दृष्ट्वा तु बहुरोगार्तमग्निं देवमुखं सुराः ।प्राहुस्ते सहिता देवं शङ्करं लोकशङ्करम्

havirbhāgaistu viprāṇāṃ rājñāṃ caivāmayāvinām / dṛṣṭvā tu bahurogārtamagniṃ devamukhaṃ surāḥ / prāhuste sahitā devaṃ śaṅkaraṃ lokaśaṅkaram

हिन्दी अर्थ

दीक्षामयं सकवचच रक्षार्थ प्रविवेश ह। स्यम्नन्तककृते राजा गाधिपुत्रो महायशाः ८० अर्थान्नत्नानि चाग्याणि द्रव्याणि विविधानि च। षष्टिवर्ष गते काले यज्ञेषु विन्‍्ययोजपत्.

English

He was an emperor of great prowess. He was ver powerful and he had many children. In this connection, this genealogical verse has been cited by those who know ancient traditions.

अध्याय १७६

श्लोक 11

देवा ऊचुः ।प्रसादः क्रियतां शम्भो पिङ्गलस्यामयाविनः ।यथा हि नीरुजः कायो हविषां ग्रहणक्षमः ।पुनर्भवति पिङ्गस्तु तथा कुरु महेश्वर

devā ūcuḥ / prasādaḥ kriyatāṃ śambho piṅgalasyāmayāvinaḥ / yathā hi nīrujaḥ kāyo haviṣāṃ grahaṇakṣamaḥ / punarbhavati piṅgastu tathā kuru maheśvara

हिन्दी अर्थ

अक्वरयज्ञा इत्येते ख्यातास्तस्प महात्मनः । बह्धन्नदक्षिणा: सर्वे सर्वकामप्रदायिनः : ८२ अथ दुर्योधनो राजा गत्वाइ्थ मिथिलां प्रभ्भुः गदाशिक्षां ततो दिव्यां बलभव्रादबाप्ततवानू ॥षरे प्रसाद्य तु ततो रामो व॒ष्ण्यन्धकमहारथः । आनीतो द्वारकामेव कृष्णेन व महात्मना हा स्वफल्कतनयायां तु नरायां नरसत्तमों । भद्भकारस्य तनयो विश्वुतों सुमहाबलो द

English

"Sasabindu had ten thousand sons. They were all very intelligent. They possessed vast wealth and great splendour. They were worthy (of their father).

अध्याय १७६

श्लोक 12

ईश्वर उवाच: भोभोः सुरा हि तपसा तुष्टो ऽहं वो विशेषतः ।वचनाच्च विशेषेण ददाम्यभिमतं वरम्

īśvara uvāca: bhobhoḥ surā hi tapasā tuṣṭo 'haṃ vo viśeṣataḥ / vacanācca viśeṣeṇa dadāmyabhimataṃ varam

हिन्दी अर्थ

. जज्ञातेबन्धकमुख्यस्य शत्रुध्नो बन्धुमांश्व तो वधार्थ भड्भकारस्य कृष्णो न प्रोतिसान्भवेत्.

English

Six of diem were very important; they were known as ' Prthusatkas ' (six men who had theword Prlhu i.e. great added on to their name). They were—Prthusravas, Prthuyasas, Prthunjaya, Prthuklrti and Pjrthundata. All the sons of Sasa¬ bindu were kings. All the Puranas praise Antara who was the son of Prthusravas. He was the same Antara as was the son of Yajna formerly.' 5

अध्याय १७६

श्लोक 13

पिङ्गल उवाच: यदि तुष्टो ऽसि देवेश दीयते देव चेप्सितम् ।चन्द्रादित्यौ च नयने कृत्वात्र कलया स्थितः

piṅgala uvāca: yadi tuṣṭo 'si deveśa dīyate deva cepsitam / candrādityau ca nayane kṛtvātra kalayā sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

अनावुष्ट्या हत॑ राष्ट्रमभवत्तद्रधोद्यतम् । ततः प्रासादयामासुरक्वरं कुकुरान्धका: ॥८€ सम्मान किया ।७६-७८। इधर इसो अवधि में बुद्धिमानों में श्रेष्ठ प्रभु ने अनेक प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान बिना किसी विघ्न बाधा के सम्पन्न किया । महायस्वी गाधिपुत्र ने उसी स्पभस्तक के लिये अपनी रक्षा के हेतु एक दीक्षामथ कवच भी पहन रखा था इस साठ वर्ष कौ अवधि में उसने अपने इन यज्ञों में विविध प्रकार के बहुमूल्य रत्न एवं द्र्यादि लगाये थे। उस परम बुद्धिमान् महात्मा के ये यज्ञ अक्वर यज्ञ के नाम से

English

After getting the earth (i.e. having become king) the same pious-souled excellent, righteous (king) performed a hundred horse-sacrifices.

अध्याय १७६

श्लोक 14

तथा पुनर्नवः कायो भवेद्वै मम शङ्कर ।तथा कुरु विरूपाक्ष नमस्तुभ्यं पुनः पुनः

tathā punarnavaḥ kāyo bhavedvai mama śaṅkara / tathā kuru virūpākṣa namastubhyaṃ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

विश्यात हो चले थे । उबमें बहुत परिणाम में अन्न एवं दक्षिणा रूप में द्रव्य व्यय किया गया था, और वे सभी मनोरथों को पूर्ण करनेवाले थे ।७९६-८२॥ उसी अवधि में प्रभुवर्य्य कुरुपति दुर्योधन ने मिथिलापुरी में जाकर बलराम से ग॒दा चलाने की दिव्य शिक्षा ग्रहण की थी । इस प्रकार बहुत दिन बीत जाने पर भगवान् कृष्ण के साथ वृष्णि और अंधकों ने बड़ी अनुनय विनय कर बलराम को प्रसन्न किया और उन्हें द्वारकापुरी चलने के लिये

English

His son was Marutta 1 who followed (the footsteps of) saintly kings. Heroic Kambalabarhis is remembered as Marutta's son.

अध्याय १७६

श्लोक 15

मार्कण्डेय उवाच: ततः स भगवाञ्छम्भुर् मूर्तिमादित्यरूपिणीम् ।कृत्वा तु तस्य तद्रोगम् अपानुदत शङ्करः

mārkaṇḍeya uvāca: tataḥ sa bhagavāñchambhur mūrtimādityarūpiṇīm / kṛtvā tu tasya tadrogam apānudata śaṅkaraḥ

हिन्दी अर्थ

बाध्य किया । बलवान पुरुष में श्रेष्ठ अक्र युद्ध में बन्धुमान के साथ शत्रुघ्न का संहार कर अंधकों के साथ द्वारका पुरी से बाहर चले गये । ये दोनों महाबलबान् पुत्र भद्भकार के थे, स्वफल्क की पुत्री नरा में इन दोनों प्रख्यात पुरुष रत्नों का जन्म हुआ था। अंधकों के स्वामी भज्भुकार के ये दोनों द्ात्रुष्ण और बन्धुमान नामक पुत्र परम बलवान थे भड़ुकार की मृत्यु के कारण भगवान् कृष्ण अक़र से प्रसन्न नही रहते थे जाति भेद के भय से तथा समाज उपेक्षित होकर अक्र द्वारिकापुरी के बाहर चले गये थे । उनके चले जाने पर इन्द्र ने वृष्टि करता दह्वी बन्द कर दिया ।5३-८८। अनावृष्टि के कारण समस्त राष्ट्र का विनाक्ष उपस्थित हो गया, लोग परस्पर मारने काटने को उद्यत हो गये । इस दुघंटना से प्रभावित होकर कुकुर ओर अंधकों ने जाकर - अकूर को प्रसन्न किया दानशिरोमणि अक्रंर जब लोटकर द्वारकापुरी में आये तब सहसनेत्र इन्द्र ने

English

Our text has dropped two generations between Antara (Ak§ara in Bd.P.) and Marutta— vide Bd. 3.70.23-25.

अध्याय १७६

श्लोक 16

ततः पुनर्नवीभूतः पुनः प्रोवाच शङ्करम् ।अत्रैव स्थीयतां शम्भो तथैव भास्करः स्वयम्

tataḥ punarnavībhūtaḥ punaḥ provāca śaṅkaram / atraiva sthīyatāṃ śambho tathaiva bhāskaraḥ svayam

हिन्दी अर्थ

कस्यां च वासुदेवाय स्वसारं शीलसंमताम् । अक्लूरः प्रददो श्रीमान्प्रीत्यर्थ यदुपुंगवः ३६ १

English

Scholarly Rukmakavaca was the son of Kambala- barhis. This Rukmakavaca had formerly attained excellent glory by killing (many) warriors wearing coats of mail and armed with bows, with his sharp arrows. He attained great fame as a performer of horse-sacrifices and gave profuse wealth (as Daksina) to Bralimanas.

अध्याय १७६

श्लोक 17

प्राणिनामुपकाराय रोगाणामुपशान्तये ।पापानां ध्वंसनार्थाय श्रेयसां चैव वृद्धये

prāṇināmupakārāya rogāṇāmupaśāntaye / pāpānāṃ dhvaṃsanārthāya śreyasāṃ caiva vṛddhaye

हिन्दी अर्थ

बष्टिवषंगते काले यव्रोषो5मृत्तदा सम । सुसंरूढः सकृत्प्राप्तत्तकालाशरित्य यो महान् (१). 0६४ स कृष्णहस्तात्संप्राप्पय मणिरत्नं स्थमन्तकस् । आबध्य गान्दिनीपुत्रो विरराजांशुमानिव १९७

English

From king Rukmakavaca were born five very strong sons of great prowess who killed heroic enemies without turning away (from the battlefield).

अध्याय १७६

श्लोक 18

एवमुक्तस्तु भगवान्पिङ्गलेन महात्मना ।अवतारं च कृतवान् गीर्वाणान् इदम् अब्रवीत्

evamuktastu bhagavānpiṅgalena mahātmanā / avatāraṃ ca kṛtavān gīrvāṇān idam abravīt

हिन्दी अर्थ

हमाँ मिथ्याभिर्शास्त यो विशुद्धामपि चोत्तमाम् । वेद मिथ्याभिशस्ति स न ब्रजेच्च कर्थंचन ॥€८

English

They were Rukmesu, Prthurukma, Jyamagha, Parigha and Hari. The father established Hari and Parigha in (the land called) Videha.

अध्याय १७६

श्लोक 19

ईश्वर उवाच: मुञ्चध्वमुदकं देवास्तीर्थेभ्यो यत्समाहृतम् ।मम चोत्तरतः कृत्वा खातं देवमयं शुभम्

īśvara uvāca: muñcadhvamudakaṃ devāstīrthebhyo yatsamāhṛtam / mama cottarataḥ kṛtvā khātaṃ devamayaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

सात्यकिर्युयुधानशभ्व तस्य मृतिः सुतोडभवत् । भूवेयगंधरः पुत्र इति मौत्याः प्रकोतिताः १०० विपुल वृष्टि की, यहाँ तक कि समुद्र में भी विपुल वष्टि हुई यदुवं्षियों में श्रेष्ठ श्रीमान् अकर ने प्रसस्ष करने के लिये अपनी सर्वेगुणसम्पन्न शीलवती भभिनी को वासुदेव कृष्ण को समर्पित किया । भगवान वासुदेव ने योगबल से अक्रर के पास स्यमन्तक मणि का होना जान लिया ओर एक बार भरी सभा में उन्होंने अक्र से कहा, 'सम्माननीय ! सर्वेसमर्थ ! अक्रूर जी ! आपके पास जो सर्व्ेष्ठ

English

Brahmcsu 1 (? Rukmesu) became king, and Prthurukma became his dependent. Banished from the kingdom by them, Jyamagha 2 lived in a hermitage.

अध्याय १७६

श्लोक 20

तत्र निक्षिप्यतां वारि सर्वरोगविनाशनम् ।सर्वपापहरं दिव्यं सर्वैरपि सुरादिभिः

tatra nikṣipyatāṃ vāri sarvarogavināśanam / sarvapāpaharaṃ divyaṃ sarvairapi surādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

सुन्दर स्यमन्तक मणि है, उसे हमें दे दीजिये, इसमें इनकार न कीजिये ।१६-६३॥ इसके लिये साठ वर्ष से हमारा क्रोध आपके ऊपर पैदा हुआ है, उस महान् क्रोध को प्रकाशित करने का अवसर बुझे एक बार मिला है । आज समय पड़ने पर मैं उस मणि की याचना कर अपने उस पुराने क्रोध को शान्‍्त करना चाहता हैं । भगवान कृष्ण के इस वचन को .सुनकर परम बुद्धिमान् अक्रर ने सात्वत वंशियों को भरी सभा में बिना

English

He was quiescent (by temperament). He lived in the terrible forest but he was actuated by a Brahmana. Taking up his bow he went to the middle of the land, seated in his chariot and waving his flag.

अध्याय १७६

श्लोक 21

एवमुक्ताः सुराः सर्वे खातं कृत्वा तथोत्तरे ।वयस्त्रिंशत्कोटिगणैर्मुक्तं तत्तीर्थजं जलम्

evamuktāḥ surāḥ sarve khātaṃ kṛtvā tathottare / vayastriṃśatkoṭigaṇairmuktaṃ tattīrthajaṃ jalam

हिन्दी अर्थ

किमी क्लेश के उस स्यमश्तकमणि को भगवान् वासुदेव को समपित किया ।। शत्रुओं को वश में करनेवाले भगवान् बासुदेव इस प्रकार सरलतापूर्वक अक्र्र के हाथ से उस महामणि के प्राप्त हो जाने पर पुनः प्रसस्त मन से अक्रूर को वह मणि वापस कर दिया । भगवान् कृष्ण के हाथ से उस मणिवर स्यमन्तक को प्राप्तकर गान्दिनोनन्दन अक्रर ने उसे यथा स्थान अलंकत कर लिया और उस समय अंशुमान् की तरह वे शुशोभित ह६ए भगवान् के उबर लगाई गई इस भिथ्या अपवाद मूलक वार्ता को, जो वास्तव में विशुद्धि और उत्तम शिक्षा देने- वाली है, जो व्यक्ति जानता है, वह कभी ऐसे मिथ्या अपवाद का भाजन नहीं हो सकता। कनिष्ठ वृष्णिनन्दन अनमित्र से शिनि की उत्पत्ति हुई, उनके पुत्र परम सत्यवादी सत्याचरण-परायण सत्यक हुए। सत्यक के पुत्र सात्यकि हुए जिनका दूसरा नाम युयुधान भी था । सात्यकि के पुत्र भूति हुए । भूति के पुत्र युगन्धर हुए। ईन

English

He (wandered) along in the marshy place on the banks of Narmada. After passing through Mekala mountains and the mountain Rksavan, he entered Suktimanya (?)

अध्याय १७६

श्लोक 22

प्रोचुस्ते सहिताः सर्वे विरूपाक्षपुरोगमाः ।यः कश्चिद्देवखाते ऽस्मिन्मृदालम्भनपूर्वकम्

procuste sahitāḥ sarve virūpākṣapurogamāḥ / yaḥ kaściddevakhāte 'sminmṛdālambhanapūrvakam

हिन्दी अर्थ

सभी भौत्य के नाम से विख्यात वृष्णिवंधियों का विवरण कह चुका। माद्वी के पुत्र युधाजित् के पृद्ठिन नाभ

English

Jyamagha's wife was Saibya who was very strong. Though the king had no son, he did not take a second wife.

अध्याय १७६

श्लोक 23

स्नानं कृत्वा रविदिने संस्नाय नर्मदाजले ।श्राद्धं कृत्वा पितृभ्यो वै दानं दत्त्वा स्वशक्तितः

snānaṃ kṛtvā ravidine saṃsnāya narmadājale / śrāddhaṃ kṛtvā pitṛbhyo vai dānaṃ dattvā svaśaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

प्ष्थ वायुपुराणभ् स्व(श्व )फल्कस्तु महाराजो धर्मात्मा यत्र वतंते। नास्ति व्याधिभयं ततन्न न चावृष्टिभयं तथा

English

He became victorious in a battle and won a girl there¬ in. The king then came to his wife and said, "Here is your daughter-in-law".

अध्याय १७६

श्लोक 24

पूजयिष्यति पिङ्गेशं तस्य वासस्त्रिविष्टपे ।भविष्यति सुरैरुक्तं शृणोति सकलं जगत्

pūjayiṣyati piṅgeśaṃ tasya vāsastriviṣṭape / bhaviṣyati surairuktaṃ śṛṇoti sakalaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

कदाचित्काशिराजस्य विभोस्तु द्विजसत्तमा: । त्रीणि वर्षाणि विषये नाव्षत्पयाकशासन:ः .

English

On being addressed thus she said, "This daughter-in law of yours is loveable. She will be the wife of your son who will be born (who is yet to be born)."

अध्याय १७६

श्लोक 25

आमया भुवि मर्त्यानां क्षयरोगविचर्चिकाः ।व्याधयो विकृताकाराः कासश्वासज्वरोद्भवाः

āmayā bhuvi martyānāṃ kṣayarogavicarcikāḥ / vyādhayo vikṛtākārāḥ kāsaśvāsajvarodbhavāḥ

हिन्दी अर्थ

स॒ तन्न वासयामास स्व( शव )फल्कं परमाचितम् । स्व(श्व )फल्कपरिवासेन प्रावर्षत्पाकशासनः स्व(श्व )फल्कः काशिराजस्य सुतां भार्षामनिन्दिताम् । सान्दिनीं नाम गां सा हि ददो विप्राय नित्यशः।।

English

By performing a severe penance, the beautiful chaste lady Saibya gave birth to his son Vidarbha in her old age.

अध्याय १७६

श्लोक 26

एकद्वित्रिचतुर्थाहा ये ज्वरा भूतसम्भवाः ।ये चान्ये विकृता दोषा दद्रुश्च कामलं तथा

ekadvitricaturthāhā ye jvarā bhūtasambhavāḥ / ye cānye vikṛtā doṣā dadruśca kāmalaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

यदि दत्ता तदा स्यां हि यदि स्वामीहतां पितः । तथेत्युवाच तां तस्या: पिता कामसपुपुरत्

English

Vidarbha begot of that daughter-in-law two scholarly

अध्याय १७६

श्लोक 27

दिनैस्ते सप्तभिर्यान्ति नाशं स्नानैर् रवेर्दिने ।शतभेदप्रभिन्ना ये कुष्ठा बहुविधास् तथा

dinaiste saptabhiryānti nāśaṃ snānair raverdine / śatabhedaprabhinnā ye kuṣṭhā bahuvidhās tathā

हिन्दी अर्थ

धर्मभूच्च शृष्टवयों वर्गमोचस्तथा5पर: । आवाह॒प्रतिवाहौ च॒ बसुदेवा बराड्रसा १११ से विख्यात पुत्र हुआ पृष्टिन के स्‍्वफल्क और चित्रक नामक दो पुत्र उत्पन्म हुए । महाराज स्वफल्क परम धर्मात्मा थे, वे जहाँ पर विद्यमान रहते थे, वहाँ पर व्याधियों तथा अनावृष्टि का भय नहीं रहता था । द्विजबये- वृन्द एक बार कभी सवसमथ्थ काशिराज के राज्य में इख्र ने तीन वर्ष तक लगातार बृष्टि हो नहीं की । काशिराज ने परम सम्माननौय महाराज स्वफल्क को अपने यहाँ बुलाकर निवास करवाया, स्वफल्क के वास

English

Brahmefu is a mistake for Rukmesu. In AIHT Paravrt is named as the successor of Rukmakavaca.

अध्याय १७६

श्लोक 28

शतमादित्यवाराणां स्नायादष्टोत्तरं तु यः ।सम्पूज्य शङ्करं दद्यात्तिलपात्रं द्विजातये

śatamādityavārāṇāṃ snāyādaṣṭottaraṃ tu yaḥ / sampūjya śaṅkaraṃ dadyāttilapātraṃ dvijātaye

हिन्दी अर्थ

करते ही इन्द्र ने वहाँ पर वृष्टि की । स्वफल्क ने काशिराज की परम सुन्दरी कन्या गान्दिनी के साथ अपना विवाह किया था, गान्दिनो प्रति दिन ब्राह्मणों को गोदान करता थी ।8८-१०५। ऐसा कहा जाता है कि गान्दिनी अपनी माता के गर्भ में अनेक सौ वर्षों तक रही, उत्पश्त नहीं हुई, गर्भावस्‍था में अवस्थित उससे पिता ने कहा, गर्भस्थ सन्‍्तान ! तुम शीघ्र उत्पन्न हो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम किस लिये ग्रभे में निवास क्र

English

Jyamagha's dynasty was famous but he is personally noted as a hen- Pecked husband in Puranas, vide vv. 32-34, also Bd. 3.70. 33-3b

अध्याय १७६

श्लोक 29

नश्यन्ति तस्य कुष्ठानि गरुडेनेव पन्नगाः ।एवमुक्त्वा गताः सर्वे त्रिदशास्त्रिदशालयम्

naśyanti tasya kuṣṭhāni garuḍeneva pannagāḥ / evamuktvā gatāḥ sarve tridaśāstridaśālayam

हिन्दी अर्थ

रहे हो । राजा की ऐसी बातें सुनकर गर्भावस्‍था में ही कन्या ने उत्तर दिया, पिता जी! यदि आप प्रतिदिन यौओं का दान करें तब मैं उत्पर्न होऊँगी।” पिता ने बहुत अच्छा! कहकर कन्या की मनः कामना पूर्ण की उसी ग्रान्दिनी के स्वफलक के संयोग से परम दानी, परम यज्ञकर्ता, श्रवौर, वेदश, अतिथिसेवक, अक्रूर उत्पस्त हुए । महाराज स्वफल्क भी परम दानी थे । अक्रर के भतिरिक्त स्वफल्क के अन्य पुत्र भी उत्पन्न हुए, जितके नाम ये हैं--उपमंगु, मंग्रु, मुदुर, अरिमिजय, गिरिरक्ष, यक्ष, शत्रघ्त, अथवा अरिमदेन, धर्मभृत, शृष्टव्य, वर्गगोच, आवाह तथा प्रतिवाह। इनके अतिरिक्त परमसुन्दरी

English

King Devaksatra of great fame was the son of Devarata. Devana, the delighter of Ksatriyas, was born as the son of

अध्याय १७६

श्लोक 30

मार्कण्डेय उवाच: नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरित्सु च ।स्नानं समाचरेन्नित्यं नरः पापैः प्रमुच्यते

mārkaṇḍeya uvāca: nadīṣu devakhāteṣu taḍāgeṣu saritsu ca / snānaṃ samācarennityaṃ naraḥ pāpaiḥ pramucyate

हिन्दी अर्थ

तास्त्यधेमिदं क पृस्तके ।

English

Madhu was born of Devana. His son was Medna- Purudvaha was born of Bhadravati as the son of Puru¬ dvan. AiksakI was the wife (of Purudvan). Sattva was born of her. FromSattva was born Sattvata who was endowed with Sattvaguna. He increased the fame (of the race).

अध्याय १७६

श्लोक 31

षष्टितीर्थसहस्रेषु षष्टितीर्थशतेषु च ।यत्फलं स्नानदानेषु देवखाते ततो ऽधिकम्

ṣaṣṭitīrthasahasreṣu ṣaṣṭitīrthaśateṣu ca / yatphalaṃ snānadāneṣu devakhāte tato 'dhikam

हिन्दी अर्थ

अक्वरादुप्रसेन्‍्यां तु सुतो दो कुलनरिदनो । देवश्वानृपदेवश्न जज्ञाते देवसंमितो सत्यकात्काशिदुहिता लेभे सा चतुरः सुतान् । ककुदं भजमाने च शमीकम्बलबहिषो

English

After perfectly understanding this creation (race) of the noble-souled Jyamagha, one obtains childern and attains Sayujya (identity) with the intelligent king Soma.

अध्याय १७६

श्लोक 32

देवखातेषु यः स्नात्वा तर्पयित्वा पित्ःन्नृप ।पूजयेद् देवदेवेशं पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्

devakhāteṣu yaḥ snātvā tarpayitvā pitḥnnṛpa / pūjayed devadeveśaṃ piṅgaleśvaramuttamam

हिन्दी अर्थ

इमांश्वोदाहरन्त्यन्न शोकान्प्रति तमाहुकम् । सोपास ड्भानुकर्षाणां सध्वजानां वरूथिनामू

English

Sattvata's wife Kausalya gave birth to handsome sons, viz. Bhajin, Bhajamana, Divya, Devavrdha the king, Andhaka, Mahabhoja, Vrsni and Yadunandana. They established four races. Listen to them in detail. Bhajamana begot of Srujayl two sons, Bahya and (the next) Bahyaka. Bahyaka married firry aya's two daughters

अध्याय १७६

श्लोक 33

सो ऽश्वमेधस्य यज्ञस्य वाजपेयस्य भारत ।द्वयोः पुण्यमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा

so 'śvamedhasya yajñasya vājapeyasya bhārata / dvayoḥ puṇyamavāpnoti nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

वसुदेवा नाम की एक कन्या भी थी ।? ०६-१११। अक्रर के संयोग से उग्रसेनी में दो परिवार को आनन्द देनेवाले सूपुत्न उत्पन्न हुए, उनके माम थे देव और अनृपदेव ! ये दोनों पुत्र देवताओं के समान गुणशाली थे । चित्रक के जो उत्पन्न हुए, उनके नाम थे, पृथु, विपृथु, भश्वग्रीव, अदवबाहु, सुपाइवंक, गवेषण, अरिष्टनेमि, अदब, सुवर्मा, चमंभृत्, वर्मभृतू, अभूमि भौर बहुभुमि श्रविष्ठा और श्रवणा नामक दो स्त्रियाँ थीं। काशिराज की क्या ने सत्यक के संयोग से चार पुत्रों को प्राप्त किया जिनके नाम थे ककुद, भजमान, शमी और कम्बलबहिंष । ककुद के पुत्र वष्टि थे, वृष्टि के पुत्र का नाम कपोतरोमा था। कपोतरोमा का पुत्र रेबत था । उस रेवल का पुत्र तुम्बुदसखा हुआ, जो प्रम- प्रसिद्ध विद्वान था; इसी के नाम चन्दनोदक दुंदुभि भी स्यात थे ।११२-११७। उसका पुत्र अभिजित हुआ, उस अभिजित से पुनर्वसु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । द

English

His wives, the two sisters, gave birth to many sons 2, viz. Nirni,, Panava, Vrsni and Parapuranjaya.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 176
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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