अध्याय १७८
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे भूतीश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तसप्तत्यधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १७८ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र गङ्गावाहकमुत्तमम् ।नर्मदायां महापुण्यं भृगुतीर्थसमीपतः
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe bhūtīśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma saptasaptatyadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 178 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra gaṅgāvāhakamuttamam / narmadāyāṃ mahāpuṇyaṃ bhṛgutīrthasamīpataḥ
हिन्दी अर्थ
दूसरा नहीं था। उस पुरुषरत्न वसुदेव की कीति चन्द्रमा को चाँदनो की भाँति लोकमनोरजनी तथा विशद थी। वासुदेव के उपरान्त शूर के देव भाग नामक पुत्र उत्पन्न हुए थे। उनके-बाद देवश्रवा नामक पुत्र का जन्म हुआ था। इनके अतिरिक्त अनादृष्टि, कड, नन््दन, भृज्जिन, श्याम, शमीक, और गण्ड्घ नामक पुत्र थे। चार सुन्दरी कन्याएं थीं।१४३-१४८। जिनके नाम पृथा, श्रुतवेदा, श्रवकीति और
English
Govinda (Kra'a) desire, it Though he was