Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
19
अध्याय 19 / 232

Adhyaya 19

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अध्याय १९

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे नर्मदामाहात्म्यवर्णनं नामाष्टादशो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १९ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततस्त्वेकार्णवे तस्मिन् मुमूर्षुरहमातुरः ।काकूच्छ्वासस्तरंस्तोयं बाहुभ्यां नृपसत्तम

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe narmadāmāhātmyavarṇanaṃ nāmāṣṭādaśo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 19 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tatastvekārṇave tasmin mumūrṣurahamāturaḥ / kākūcchvāsastaraṃstoyaṃ bāhubhyāṃ nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

स्वतः सनगां प्रृथ्वीं कृत्वा मनसि धारयेत् । हृदि कृत्वा समुद्रांश्र तथा सर्वाश्य देवता: ५७

English

Henceforth I shall explain the evil omens. Know that

अध्याय १९

श्लोक 2

शृणोम्यर्णवमध्यस्थो निःशब्दस्तिमिते तदा ।अम्भोरवमनौपम्यं दिशो दश विनादिनम्

śṛṇomyarṇavamadhyastho niḥśabdastimite tadā / ambhoravamanaupamyaṃ diśo daśa vinādinam

हिन्दी अर्थ

होने से उरःस्थान या कण्ठ देश में भी वंसी ही धारणा करे। वाग्रोध होने से वचन में और बधिरत्व होने से कानों में धारणा क्री जाती है ।४६। तृषाते होने से जिह्ा स्थान में स्नेहाक्त प्रज्वयलित अग्नि की धारणा करे इन चिकित्साओं का जो फल हो, उसकी प्रतीक्षा करे । फिर तो वह सुखी हो जायगा ।४७। क्षय, कुष्ठ और कीला- सादि राजस रोग में सात्तिकी वत्ति की धारणा करे। जिस-जिस देश में जो विकार उत्पन्न हो, वहाँ-बहाँ

English

He whose feet crack either in front or at the back or

अध्याय १९

श्लोक 3

हंसकुदेन्दुसंकाशां हारगोक्षीरपाण्डुराम् ।नानारत्नविचित्राङ्गीं स्वर्णशृङ्गां मनोरमाम्

haṃsakudendusaṃkāśāṃ hāragokṣīrapāṇḍurām / nānāratnavicitrāṅgīṃ svarṇaśṛṅgāṃ manoramām

हिन्दी अर्थ

सात्त्विकी धारणा करे ४५। जिस ब्राह्मण को इस प्रकार योग जनित दोष उत्पन्न हो उसको इसी प्रकार की चिकित्सा करती चाहिए जो भयभीत हो जाय बाँस की कील से उसके सिर पर ताड़ना करे अथवा भयभीत योगी के सिर पर लकड़ी की कील रखकर लकड़ी से खटखटावे । इससे उसकी संज्ञा लौट जाती है। जिसकी संज्ञा लुप्त हो गयी हो उसे सिर पर दोनों हाथों से धारणा करावे, इससे उसकी संज्ञा फिर जाती है - उसको

English

He who is obstructed by rows of crows or by a dust storm, lives only for four or five months.

अध्याय १९

श्लोक 4

सुरैः प्रवालकमयैर्लाङ्गुलध्वजशोभिताम् ।प्रलम्बघोणां नर्दन्तीं खुरैर् अर्णवगाहिनीम्

suraiḥ pravālakamayairlāṅguladhvajaśobhitām / pralambaghoṇāṃ nardantīṃ khurair arṇavagāhinīm

हिन्दी अर्थ

पुनः मूर्डा में घारणा करनी चाहिए ।४६-५१। रोगी को स्निग्ध और थोड़ा भोजन करावे इससे वह सुख पाता है । योगी जब अमानुष तत्त्वों का अनुभव करने में समथे हो जाय, तब आकाश, वायु, अग्नि और पृथ्वी की धारणा करे । वैसी दशा में प्राणायाम के द्वारा सब तत्त्व दग्ध होकर वश्यीभूत हो जाते हैं ।६२-५३॥ फिर भी अगर कोई दोष दारीर में प्रवेश कर जाय, तो उसका निराकरण यह है कि, मस्तक में संस्तम्भन करके

English

He who sees lightning without clouds, in the southern direction, or water or the rainbow (without the existence of clouds) lives only for two or three months.

अध्याय १९

श्लोक 5

गां ददर्शाहमुद्विग्नो मामेवाभिमुखीं स्थिताम् ।किंकिणीजालमुक्ताभिः स्वर्णघण्टासमावृताम्

gāṃ dadarśāhamudvigno māmevābhimukhīṃ sthitām / kiṃkiṇījālamuktābhiḥ svarṇaghaṇṭāsamāvṛtām

हिन्दी अर्थ

धारणा करे और प्राणायाम रूप अग्नि में सब को जला डाते । ऐसा करने से सभी दोष नष्ट होते हैं । अगर नाग ने डंस लिया हो, तो हृदय ओर उदर में धारणा करे ।५४-५५। महः, जन, तप, सत्य लोक की भी हृदय में धारणा करे । अगर विष पी लिया गया हो, तो हृदय में विशल्या धारण करे ।५६। मन में पव॑तमय पृथ्वी की धारणा कर हुदय में देवता और समुद्र की धारणा करे ।५७। योगी हजार घड़े जल से भी

English

He who does not see his reflection either in water or in a mirror or who sees his reflection without the head does not survive a month.

अध्याय १९

श्लोक 6

तस्याश्चरणविक्षेपैः सर्वमेकार्णवं जलम् ।विक्षिप्तफेनपुञ्जौघैर्नृत्यन्तीव समं ततः

tasyāścaraṇavikṣepaiḥ sarvamekārṇavaṃ jalam / vikṣiptaphenapuñjaughairnṛtyantīva samaṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

सहस्नण घटानां च युक्तः स्नायीत योगवित् । उदके कण्ठमात्रे तु धारणां मृध्नि धारयेत्

English

If the body smells like a corpse or like burning fat, death is imminent. He lives only for a fortnight.

अध्याय १९

श्लोक 7

ररास सलिलोत्क्षेपैः क्षोभयन्ती महार्णवम् ।सा मामाह महाभाग श्लक्ष्णगम्भीरया गिरा

rarāsa salilotkṣepaiḥ kṣobhayantī mahārṇavam / sā māmāha mahābhāga ślakṣṇagambhīrayā girā

हिन्दी अर्थ

प्रतिस्नोतोविषाविष्टो धारयेत्सवंगात्रिकीम् । शीर्णोइकंपत्रपुटक: पिबेहल्मीकमृत्तिकाम् ५६ चिकित्सितविधिहां ष विश्वुतो योगनिर्मित: । व्याख्यातस्तु समासेन योगदृष्टेन हेतुना ३६० ब्रवतो लक्षणं विद्धि विप्रस्य कथयेत्क्वचित् । अथापि कथयेन्मोहात्तद्चिज्ञानं प्रलोयते.. .

English

If a biting wind seems to pierce the vulnerable points of one's body or if no sensation is experienced after touching water, death is imminent for him.

अध्याय १९

श्लोक 8

मा भैषीर् वत्स वत्सेति मृत्युस्तव न विद्यते ।महादेवप्रसादेन न मृत्युस् ते ममापि च

mā bhaiṣīr vatsa vatseti mṛtyustava na vidyate / mahādevaprasādena na mṛtyus te mamāpi ca

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते पाशुपतयोगो नामैकादशोध्ध्यायः ।

English

If he dreams that he is singing and proceeding to the south on a chariot to which bears and monkeys are yoked, it shall be known as a sign of imminent death.

अध्याय १९

श्लोक 9

ममाश्रयस्व लाङ्गूलं त्वामतस्तारयाम्यहम् ।घोराद् अस्माद् भयाद् विप्र यावत् संप्लवते जगत्

mamāśrayasva lāṅgūlaṃ tvāmatastārayāmyaham / ghorād asmād bhayād vipra yāvat saṃplavate jagat

हिन्दी अर्थ

स्नान करे। कण्ठमात्र जल में बंठकर मस्तक में घारणा करे, नदी की विपरीत दिशा में रहकर, सम्पूर्ण शरीर में धारणा का अवलम्बन करे। अकवन के सूखे पत्ते की दोनिया बनाकर दीमक की मिट्टी भी पी सकता है । योगज रोग होने पर इस प्रकार की चिक्रित्सा करनी चाहिए। विख्यात योग निर्माता ने योग द्वारा प्राप्त ज्ञान के द्वारा संक्षेप में इस प्रकार की विधि कही है ।५८-६०। योग सम्बन्धी बातों को किसी से नहीं कहना

English

If he dreams that he is being led to southern direction by a dark singing woman wearing black garment, he does not survive long.

अध्याय १९

श्लोक 10

क्षुत्तृषाप्रतिघातार्थं स्तनौ मे त्वं पिबस्व ह ।पयो ऽमृताश्रयं दिव्यं तत्पीत्वा निर्वृतो भव

kṣuttṛṣāpratighātārthaṃ stanau me tvaṃ pibasva ha / payo 'mṛtāśrayaṃ divyaṃ tatpītvā nirvṛto bhava

हिन्दी अर्थ

चाहिए। कहे भी तो ब्राह्मणों से ही। मोहबश अगर किसी से कह दिया जायगा, तो उसका विज्ञान लुप्त हो जायगा । इसलिये योग की प्रवत्ति किसी से नहीं कहनी चाहिए ।६१-६२। सत्त्व गुण की अधिकता, आरोग्य, लोभ का अभाव, कास्ति, सुन्दर स्वर, सुभगमूर्तति, उत्तम गन्ध, मृत्रपुरीष की अल्पता जब शरीर में हो जाय, तब समझना चाहिए कि योग की पहली प्रकृति सिद्ध हो गयी । अपने को और पृथ्वी को अगर जलता हुआ देखे और

English

If he dreams that he wears black rags or that his ear is broken, it shall be known as a sign of imminent death.

अध्याय १९

श्लोक 11

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा हर्षात्पीतो मया स्तनः ।न क्षुत्तृषा पीतमात्रे स्तने मह्यं तदाभवत्

tasyāstadvacanaṃ śrutvā harṣātpīto mayā stanaḥ / na kṣuttṛṣā pītamātre stane mahyaṃ tadābhavat

हिन्दी अर्थ

सृष्ट पदार्थ में प्रवेश कर सके, तो सिद्धि को उपस्थित समझे

English

If he dreams that he is immersed in a marshy sea upto the head, he does not survive long after seeing the dream.

अध्याय १९

श्लोक 12

दिव्यं प्राणबलं जज्ञे समुद्रप्लवनक्षमम् ।ततस्तां प्रत्युवाचेदं का त्वमेकार्णवीकृते

divyaṃ prāṇabalaṃ jajñe samudraplavanakṣamam / tatastāṃ pratyuvācedaṃ kā tvamekārṇavīkṛte

हिन्दी अर्थ

हादशो5ष्ष्याय: है७

English

He who sees (in. dream) ashes, burning coals, hair, dry river and serpents will not survive ten nights.

अध्याय १९

श्लोक 13

भ्रमसे ब्रूहि तत्त्वेन विस्मयो मे महान्हृदि ।भ्रमतो ऽत्र ममार्तस्य मुमूर्षोः प्रहतस्य

bhramase brūhi tattvena vismayo me mahānhṛdi / bhramato 'tra mamārtasya mumūrṣoḥ prahatasya

हिन्दी अर्थ

सानुष्यान्विविधान्कासान्कामयेत ऋतु स्त्रियः । विद्यादानफलं चेव अपसुष्टस्तु योगवित्

English

If he dreams that he is being beaten by hideous dark skinned men with weapons and stones in their hands, he dies soon.

अध्याय १९

श्लोक 14

त्वं हि मे शरणं जाता भाग्यशेषेण सुव्रते

tvaṃ hi me śaraṇaṃ jātā bhāgyaśeṣeṇa suvrate

हिन्दी अर्थ

अग्निहोत्रं ह॒वियंज्ञमेतत्प्रतपन तथा । सायाकम धर्न स्वर्गंमुपसृष्टस्तु काइक्षति

English

If a howling vixen rushes directly at him early in the morning at sunrise, his death is imminent.

अध्याय १९

श्लोक 15

गौरुवाच: किमहं विस्मृता तुभ्यं विश्वरूपा महेश्वरी ।नर्मदा धर्मदा न्ःणां स्वर्गशर्मबलप्रदा

gauruvāca: kimahaṃ vismṛtā tubhyaṃ viśvarūpā maheśvarī / narmadā dharmadā nḥṇāṃ svargaśarmabalapradā

हिन्दी अर्थ

नित्य ब्रह्मपरों युक्त उपसर्गात्प्रमुच्यते । जितप्रत्युपसर्गंस्थ जितश्वासस्य देहिनः प् उपसर्गाः प्रवर्तन्ते सात्वराजसतामसा:। प्रतिभा श्रवण चव देवानां चेव दर्शनम् ३६ अमावतंश्र इत्येते सिद्धिलक्षणसंज्ञिता: । विद्या काव्यं तथा शिल्पं सवंवाचाकृतानि तु ७ विद्यार्थाश्रोपतिष्ठस्ति प्रभावस्येव लक्षणम् । शूणोति शब्दार्श्रोतव्यान्योजनानां शतादपि.

English

If he feels acute pain in the chest and morbid sensiti¬ veness in the teeth immediately after taking bath, his death is immiment.

अध्याय १९

श्लोक 16

दृष्ट्वा त्वां सीदमानं तु रुद्रेणाहं विसर्जिता ।तं द्विजं तारयस्वार्ये मा प्राणांस्त्यजतां जले

dṛṣṭvā tvāṃ sīdamānaṃ tu rudreṇāhaṃ visarjitā / taṃ dvijaṃ tārayasvārye mā prāṇāṃstyajatāṃ jale

हिन्दी अर्थ

सूतजी बोले--तत्त्वदृष्टि-सम्पन्न योगियों को जो उपसर्ग (रोग) होता है, उसे अब हम यथायोग्य इसके आगे कहते हैं। मनुष्योचित विविध कामना, स्त्री प्रसद्भ॒ भिलाष, पुत्रोत्पादनेच्छा, विद्यादान, अग्निहोत्र, ह॒वियेज्ञ, अन्य तपस्या आदि, कपट, धनार्जत, स्वगंस्पहा आदि वस्तुओं में यदि योगी पुरुष आसक्त हो गये तो वे अविद्या के वशीभूत हो जाय॑गे इन्हे उपसर्ग या विध्व समझकर योगिजत इनका विवेचन कर सिराकरण करे ।

English

If he gasps for breath during night or day and is un¬ able to discern the smell of a oil lamp, know that his death is imminent.

अध्याय १९

श्लोक 17

गोरूपेण विभोर्वाक्यात्त्वत्सकाशमिहागता ।मा मृषावचनः शम्भुर्भवेदिति च सत्वरा

gorūpeṇa vibhorvākyāttvatsakāśamihāgatā / mā mṛṣāvacanaḥ śambhurbhavediti ca satvarā

हिन्दी अर्थ

प्रतिदिन ब्रह्मनिष्ठ होकर योगाम्यास करने से ये दोष नष्ट हो जाते हैं। इन उपसर्गों को और श्वास को जौतने वाले योगियों को साक्त्विक, राजस और तामस विघ्न उपस्थित होते हैं

English

If he were to see the rain-bow at night and the cluster

अध्याय १९

श्लोक 18

एवमुक्तस्तयाहं तु इन्द्रायुधनिभं शुभम् ।लाङ्गूलमव्ययं ज्ञात्वा भुजाभ्याम् अवलम्बितः

evamuktastayāhaṃ tu indrāyudhanibhaṃ śubham / lāṅgūlamavyayaṃ jñātvā bhujābhyām avalambitaḥ

हिन्दी अर्थ

दूर की ध्वनि सुनने की शक्ति, देवताओं का दर्शन और अश्नान्ति, सिद्ध का लक्षण कहा गया है। विद्या, कवित्व, शिल्पनैपुण्य, सब भाषाओं का बोध और विद्या का तत्त्वज्ञान, सुनने, योग्य शब्दों को सो योंजन दूर से भी सुन ले, सब्ज्ञ हो, विधिज्ञ हो और उन्‍्मत की तरह रहता हो यह योग प्रभाव का लक्षण

English

He, one of whose eyes begins to water, whose ears are dislodged from their places and whose nose becomes crooked (and curved) should be known as approaching death.

अध्याय १९

श्लोक 19

ततो ऽतरं तं जलधिं लाङ्गूलध्वजमाश्रितः ।असौ देवो महादेव इति मां प्रत्यभाषत

tato 'taraṃ taṃ jaladhiṃ lāṅgūladhvajamāśritaḥ / asau devo mahādeva iti māṃ pratyabhāṣata

हिन्दी अर्थ

रद ,. वायुपुराणम्

English

Death is imminent to him whose tongue is black and rough and whose face appears muddy and whose cheeks are ruddy and flattened.

अध्याय १९

श्लोक 20

ततो युगसहस्रान्तम् अहं कालं तया सह ।व्यचरं वै तमोभूते सर्वतः सलिलावृते

tato yugasahasrāntam ahaṃ kālaṃ tayā saha / vyacaraṃ vai tamobhūte sarvataḥ salilāvṛte

हिन्दी अर्थ

वेत्ति तांश्न महायोगी उपसर्गस्य लक्षणम् । देवदानवगन्धर्वानृषींश्रापि तथा पित॒न् १०

English

A man who (in dream) goes to the southern direction with hair dishevelled, laughing, singing and dancing, meets with the imminent end of life.

अध्याय १९

श्लोक 21

महार्णवे ततस् तस्मिन् भ्रमन्गोः पुच्छमाश्रितः ।निर्वाते चान्धकारे च निरालोके निरामये

mahārṇave tatas tasmin bhramangoḥ pucchamāśritaḥ / nirvāte cāndhakāre ca nirāloke nirāmaye

हिन्दी अर्थ

ततस्तु परम ब्रह्म क्षिप्रमेवानुचिन्तयेत् । तस्माच्चेवा55त्मनो दोषांस्तुपसर्गानृपस्थितान

English

He who perspires frequently, the sweat drops being like white mustard seeds, dies very soon.

अध्याय १९

श्लोक 22

अकस्मात् सलिले तस्मिन्नतसीपुष्पसन्निभम् ।विभिन्नांजनसङ्काशमाकाशमिव निर्मलम्

akasmāt salile tasminnatasīpuṣpasannibham / vibhinnāṃjanasaṅkāśamākāśamiva nirmalam

हिन्दी अर्थ

परित्यजेत मेधावी यदीच्छेत्सिद्धिमात्मनः ऋषयो देवगन्धर्वा यक्षो रगमहासुराः १४५

English

He who in dream, goes to the south in a chariot to which camels or donkeys are yoked does not live long. 1

अध्याय १९

श्लोक 23

नीलोत्पलदलश्यामं पीतवाससमव्ययम् ।किरीटेनार्कवर्णेन विद्युद्विद्योतकारिणा

nīlotpaladalaśyāmaṃ pītavāsasamavyayam / kirīṭenārkavarṇena vidyudvidyotakāriṇā

हिन्दी अर्थ

उपसर्गाः पुनश्चान्ये जायन्ते प्राणसंज्ञकाः। प्रथिवीं धारयेसर्त्वाँ ततभ्रापो हानन्तरम् १८ ततोरईग्न चेव सर्वेषामाकाश मन एवं च ततः परां पुनर्बृद्धि धारयेद्यत्नतो यती ९६९

English

These are two extermely ill omens, viz. he does not hear loud noise with his ears and does not see bright light with his eyes.

अध्याय १९

श्लोक 24

भ्राजमानेन शिरसा खमिवात्यन्तरूपिणम् ।कुण्डलोद्धष्टगल्लं तु हारोद्द्योतितवक्षसम्

bhrājamānena śirasā khamivātyantarūpiṇam / kuṇḍaloddhaṣṭagallaṃ tu hāroddyotitavakṣasam

हिन्दी अर्थ

है ।६-५१। यक्ष, राक्षस गन्धवं आदि दिव्य दर्शन योगियों के लिये विष्नस्वरूप हैं। योगी जब सब दिद्याओं में देव, दानव, गन्धव ऋषि और पितरों को देखने लगते हैं, तब वे उन्मत्त हो जाते हैं ।६-१०२। भ्रान्त योगी भ्रमवश् अन्तरात्मा द्वारा विविध विषय की ओर प्रेरित होने पर भूल जाते हैं। भ्रम से उनकी बुद्धि मारी जाती है और उनका ज्ञान नष्ट हो जाता है। अन्‍्तरात्मा द्वारा प्रेरित होते पर वार्ता (?) चित्त को नष्ट

English

If he sees in dream that he has fallen in a ditch and that there is no door to escape through and that he is unable to stand up from the ditch, that marks the end of his life.

अध्याय १९

श्लोक 25

जाम्बूनदमयैर् दिव्यैर् भूषणैर् उपशोभितम् ।नागोपधानशयनं सहस्रादित्यवर्चसम्

jāmbūnadamayair divyair bhūṣaṇair upaśobhitam / nāgopadhānaśayanaṃ sahasrādityavarcasam

हिन्दी अर्थ

कर देती है और उससे बुद्धि भ्रष्ट हो जाने पर सब ज्ञान नष्ट हो जाता है ।११-१०३। ऐसा होने पर शीक्र ही उज्ज्वल वस्त्र या कम्बल से शरीर को ढक कर मन ही मन परब्रह्म का ध्यान करे । इसलिये विद्ध चाहने वाला मेधावी योगी आत्मजनित दोष और उपस्थित उपसर्गों को दूर कर दे ।१३-१२४। ऋषि, देव, गन्धर्व, यज्ञ, उरग, मह।सुर आदि उपसर्ग के वशीभृत होकर बार-बार उसी में फँँसे रहते हैं; इसलिये योगी जिते-

English

One is definitely in difficult situation if the eye moves upward without steadiness, becomes red and begins to whirl round, if the mouth becomes hot, if the umbilicus is porous and the urine is very hot.

अध्याय १९

श्लोक 26

अनेकबाहूरुधरं नैकवक्त्रं मनोरमम् ।सुप्तमेकार्णवे वीरं सहस्राक्षशिरोधरम्

anekabāhūrudharaṃ naikavaktraṃ manoramam / suptamekārṇave vīraṃ sahasrākṣaśirodharam

हिन्दी अर्थ

न्द्रिय होकर थोड़ा खाय, निद्रा को जीते और मूर्धा में सूक्ष् की धारणा फरे। इन्द्रिय को जीतनेवाले जो योगयुक्त योगी हैं उन्हें फिर प्राणसं्रक उपसर्ग होता है। ऐसा होने पर पहले योगी सम्पूर्ण पृथ्वी की धारणा करे । अनन्तर अग्नि, सम्पूर्ण आकाश, मन और परा बुद्धि की यत्नपूवक धारणा करे। सिद्धि-लक्षण को . देखकर उनका फिर एक-एक कर त्याग करता जाय ।१६-१६:॥।

English

If a man is directly hit during the day or night and sees t e attacking man (in dream), the man so hit does not live long.

अध्याय १९

श्लोक 27

जटाजूटेन महता स्फुरद्विद्युत्समार्चिषा ।एकार्णवं जगत्सर्वं व्याप्य देवं व्यवस्थितम्

jaṭājūṭena mahatā sphuradvidyutsamārciṣā / ekārṇavaṃ jagatsarvaṃ vyāpya devaṃ vyavasthitam

हिन्दी अर्थ

धनुदिचह्वान्तगंतग्रत्थो घ. पुस्तके नास्ति।

English

If a man dreams that he is entering fire but does not

अध्याय १९

श्लोक 28

ग्रसित्वा शङ्करः सर्वं सदेवासुरमानवम् ।प्रपश्याम्यहमीशानं सुप्तमेकार्णवे प्रभुम्

grasitvā śaṅkaraḥ sarvaṃ sadevāsuramānavam / prapaśyāmyahamīśānaṃ suptamekārṇave prabhum

हिन्दी अर्थ

दांदशौष्ध्यार्य: है

English

Death is imminent to the man who sees his white covering cloth as red or black in dream.

अध्याय १९

श्लोक 29

सर्वव्यापिनमव्यक्तमनन्तं विश्वतोमुखम् ।तस्य पादतलाभ्याशे स्वर्णकेयूरमण्डिताम्

sarvavyāpinamavyaktamanantaṃ viśvatomukham / tasya pādatalābhyāśe svarṇakeyūramaṇḍitām

हिन्दी अर्थ

(»आत्मानं मन्यते तेजस्त:ड्रावसनृपश्यति + वायं धारयमाणस्य वायुः सुक्ष्म: प्रवतंते..

English

Cf. v. 12 above.

अध्याय १९

श्लोक 30

विश्वरूपां महाभागां विश्वमायावधारिणीम् ।श्रीमयीं ह्रीमयीं देवीं धीमयीं वाङ्मयीं शिवाम्

viśvarūpāṃ mahābhāgāṃ viśvamāyāvadhāriṇīm / śrīmayīṃ hrīmayīṃ devīṃ dhīmayīṃ vāṅmayīṃ śivām

हिन्दी अर्थ

आत्मानं मत्यते ब्राय वायुवन्मण्डलं भ्रमेत् । आकाश धारयमसाणस्य व्योम सुक्ष्मं प्रवतंते)

English

Verses 33-40 advise how

अध्याय १९

श्लोक 31

सिद्धिं कीर्तिं रतिं ब्राह्मीं कालरात्रिमयोनिजाम् ।ताम् एवाहं तदात्यन्तमीश्वरान्तिकमास्थिताम्

siddhiṃ kīrtiṃ ratiṃ brāhmīṃ kālarātrimayonijām / tām evāhaṃ tadātyantamīśvarāntikamāsthitām

हिन्दी अर्थ

पश्यते मण्डल सुक्ष्मं घोषश्रास्य प्रवर्बते । () आत्मान मन्यते नित्य वायुः सूक्ष्ः प्रवतते.

English

His posture is comparable to a lamp in a windless place where it is steady (not flickering) 1. He should practise Yoga in a spot sloping to the east or north.

अध्याय १९

श्लोक 32

अद्राक्षं चन्द्रवदनां धृतिं सर्वेश्वरीमुमाम्

adrākṣaṃ candravadanāṃ dhṛtiṃ sarveśvarīmumām

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी की धारणा करने से पृथ्वीतत्त्व सूक्ष्म रूप से उसमें प्रविष्ट हो जाता है। योगी उस समय अपने को नित्य पृथ्वी मय समझे । ऐसा करने से उसके शरीर से उत्तम गन्ध निकलने लगती है। जल की धारणा करने से जल का सूक्ष्म तत्त्व उसमें प्रवेश करता है ।२०-२१। और अमृततुल्य शीतल सूक्ष्म रस उसके शरीर से प्रवाहित होने लगता है । तेज की धारणा करने से तेज सृक्ष्म रूप से उसमें संक्रान्त हो जाता है।२२। योगी

English

He shall perform Dharand in the vital breath, eyes, skin, ears, mind, intellect and chest. He shall take particular delight in keeping Dharand in the vital breath.

अध्याय १९

श्लोक 33

शान्तं प्रसुप्तं नवहेमवर्णमुमासहायं भगवन्तमीशम् ।तमोवृतं पुण्यतमं वीरष्ठं प्रदक्षिणीकृत्य नमस्करोमि

śāntaṃ prasuptaṃ navahemavarṇamumāsahāyaṃ bhagavantamīśam / tamovṛtaṃ puṇyatamaṃ vīraṣṭhaṃ pradakṣiṇīkṛtya namaskaromi

हिन्दी अर्थ

अपने को तेजोमय समझने लगता है और उसी भाव को देखता भी है। वायु की धारणा से वायु सूक्ष्म भाव से संक्रान्त हो जाता है। योगी अपने को वायु समझता है और वायु की तरह वायुमण्डल में भ्रमण करने लगता है। आकाश की धारणा करने से सूक्ष आकाश संक्रान्त होता है ।१३-२४। और योगी नादसम्पन्न होकर उसके सूर्क्म मण्डल को देखने लगता है वायु की धारणा करने वाला योगी अपने को वायुमय, नित्य

English

After realizing the advent of death and the groups (of ill omens) he shall perform Yoga-Dharanas in the parts of the bodies twelve times.

अध्याय १९

श्लोक 34

ततः प्रसुप्तः सहसा विबुद्धो रात्रिक्षये देववरः स्वभावात् ।विक्षोभयन् बाहुभिर् अर्णवाम्भो जगत्प्रणष्टं सलिले विमृश्य

tataḥ prasuptaḥ sahasā vibuddho rātrikṣaye devavaraḥ svabhāvāt / vikṣobhayan bāhubhir arṇavāmbho jagatpraṇaṣṭaṃ salile vimṛśya

हिन्दी अर्थ

समझने लगता है और वायु सूक्ष्म रूव से उसमें संक्रांत हो जाता है ।२५। मन की धारणा करने से मन सुक्ष्म होकर संक्रान्त होता हैं और योगी अपने मन से सब के मन में प्रवेश कर जाता है। बुद्धि द्वारा जब बुद्धि की धारणा की जाती है तब योगी समस्त तत्त्वबोध में स मर्थ होते हैं। इन सप्त सूक्ष्मों को जानकर भी: जो योगवित् मेधावी इनका परित्याग कर देते हैं, वे बुद्धिगुण से परम तत्त्व को प्राप्त करते हैं ।२९-२७३। योगी

English

He shall perform hundred or hundred and eight Dhdrands on the head. Without Dharanas in the Yoga, the breath does not function properly (goes anywhere).

अध्याय १९

श्लोक 35

किं कार्यमित्येव विचिन्तयित्वा वाराहरूपो ऽभवदद्भुताङ्गः ।महाघनाम्भोधरतुल्यवर्चाः प्रलम्बमालाम्बरनिष्कमाली

kiṃ kāryamityeva vicintayitvā vārāharūpo 'bhavadadbhutāṅgaḥ / mahāghanāmbhodharatulyavarcāḥ pralambamālāmbaraniṣkamālī

हिन्दी अर्थ

जिस किसी ऐश्वर्यजनक भूत से आसक्त होते हैं और उसका सेवन करते हैं, उसी के साथ उनका विनाश हो जाता है। ।२८१। जो ब्राह्मण परस्पर संय्क्त सूक्ष्म भूत समूह का परित्याग करते हैं, वे परम तत्त्व को प्राप्त

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 36

सशङ्खचक्रासिधरः किरीटी सवेदवेदाङ्गमयो महात्मा ।त्रैलोक्यनिर्माणकरः पुराणो देवत्रयीरूपधरश्च कार्ये

saśaṅkhacakrāsidharaḥ kirīṭī savedavedāṅgamayo mahātmā / trailokyanirmāṇakaraḥ purāṇo devatrayīrūpadharaśca kārye

हिन्दी अर्थ

+ इदमर्ध नास्ति क पुस्तके । » धनुदिचद्वान्तगंतग्रन्थो घ. पुस्तके नास्ति। 5 इदमर्घ तास्ति क. पुस्तके । () इदमर्ध ख. ग. घ. ड. पुस्तकेषु नास्ति । द

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 37

स एव रुद्रः स जगज्जहार सृष्ट्यर्थमीशः प्रपितामहो ऽभूत् ।संरक्षणार्थं जगतः स एव हरिः सुचक्रासिगदाब्जपाणिः

sa eva rudraḥ sa jagajjahāra sṛṣṭyarthamīśaḥ prapitāmaho 'bhūt / saṃrakṣaṇārthaṃ jagataḥ sa eva hariḥ sucakrāsigadābjapāṇiḥ

हिन्दी अर्थ

१५० द वायुपुराणम्र्

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 38

तेषां विभागो न हि कर्तुमर्हो महात्मनाम् एकशरीरभाजाम् ।मीमांसाहेत्वर्थविशेषतर्कैर् यस्तेषु कुर्यात् प्रविभेदम् अज्ञः

teṣāṃ vibhāgo na hi kartumarho mahātmanām ekaśarīrabhājām / mīmāṃsāhetvarthaviśeṣatarkair yasteṣu kuryāt pravibhedam ajñaḥ

हिन्दी अर्थ

संसक्ताः सुक्ष्मभावेषु ते दोषास्तेषु संज्ञिता:। तस्मान्न निश्चय: कार्य: सुक्ष्मे ष्विह कदाचन.

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 39

स याति घोरं नरकं क्रमेण विभागकृद्द्वेषमतिर्दुरात्मा ।या यस्य भक्तिः स तयैव नूनं देहं त्यजन् स्वं ह्यमृतत्वमेति

sa yāti ghoraṃ narakaṃ krameṇa vibhāgakṛddveṣamatirdurātmā / yā yasya bhaktiḥ sa tayaiva nūnaṃ dehaṃ tyajan svaṃ hyamṛtatvameti

हिन्दी अर्थ

ऐश्वर्याज्जायते रागे बिरागं ब्रह्म चोच्यते । विदित्वा सप्त सुक्ष्माणि घडडगं च महेश्वरम् प्रधानं विनियोगज्ञः परं ब्रह्माधिगच्छति क्‍ ..-

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 40

संमोहयन् मूर्तिभिर् अत्र लोकं स्रष्टा च गोप्ता क्षयकृत्स देवः ।तस्मान् न मोहात्मकमाविशेत द्वेषं न कुर्यात् प्रविभिन्नमूर्तिः

saṃmohayan mūrtibhir atra lokaṃ sraṣṭā ca goptā kṣayakṛtsa devaḥ / tasmān na mohātmakamāviśeta dveṣaṃ na kuryāt pravibhinnamūrtiḥ

हिन्दी अर्थ

नित्य॑ ब्रह्मधनों युक्त उपसगें: प्रमुच्यते । जितश्वासोपसर्गस्य जितरागस्य योगिनः

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 41

वाराहमीशानवरो ऽप्यतो ऽसौ रूपं समास्थाय जगद्विधाता ।नष्टे त्रिलोके ऽर्णवतोयमग्ने विमार्गितोयौघमये ऽन्तरात्मा

vārāhamīśānavaro 'pyato 'sau rūpaṃ samāsthāya jagadvidhātā / naṣṭe triloke 'rṇavatoyamagne vimārgitoyaughamaye 'ntarātmā

हिन्दी अर्थ

एका बहिः शरोरे5स्मिन्धारणा सार्वकामिकी । विशेद्यदा द्विजो युक्तों यत्र यत्रापंयेन्मन:ः

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 42

भित्त्वार्णवं तोयमथान्तरस्थं विवेश पातालतलं क्षणेन ।जले निमग्नां धरणीं समस्तां समस्पृशत्पङ्कजपत्रनेत्राम्

bhittvārṇavaṃ toyamathāntarasthaṃ viveśa pātālatalaṃ kṣaṇena / jale nimagnāṃ dharaṇīṃ samastāṃ samaspṛśatpaṅkajapatranetrām

हिन्दी अर्थ

मूतान्याबविशते वा5पि त्रलोक्‍्यं चापि कम्पयेत् । एतया प्रविशेद्देहं हित्वा देहं पुनस्त्विह

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 43

विशीर्णशैलोपलशृङ्गकूटां वसुंधरां तां प्रलये प्रलीनाम् ।दंष्ट्रैकया विष्णुरतुल्यसाहसः समुद्दधार स्वयमेव देवः

viśīrṇaśailopalaśṛṅgakūṭāṃ vasuṃdharāṃ tāṃ pralaye pralīnām / daṃṣṭraikayā viṣṇuratulyasāhasaḥ samuddadhāra svayameva devaḥ

हिन्दी अर्थ

एतेन विधिना योगी विरक्तः सुक्ष्मवजित: प्रकृति समतिक्रम्य राद्रलोके महीयते (३८ ('ऐश्वयंगुणसंप्राप्तं ब्रह्ममृतं तु तं प्रभुम् । देवस्थानेषु सर्वेषु सबंतस्तु निवर्तते) ३३६

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 44

सा तस्य दंष्ट्राग्रविलम्बिताङ्गी कैलासशृङ्गाग्रगतेव ज्योत्स्ना ।विभ्राजते साप्यसमानमूर्तिः शशाङ्कशृङ्गे च तडिद्विलग्ना

sā tasya daṃṣṭrāgravilambitāṅgī kailāsaśṛṅgāgragateva jyotsnā / vibhrājate sāpyasamānamūrtiḥ śaśāṅkaśṛṅge ca taḍidvilagnā

हिन्दी अर्थ

करते हैं। ऐसा देखा गया है कि, दिव्य चक्षु महात्मा ऋषिगण भी सूक्ष्म भाव-समूह में लिप्त होने के कारण दोष-दुष्ट हो गये हैं। इसलिये सूक्ष्म भावसमूह में एकान्त निष्ठावान् नहीं होना चाहिए । ऐश्व्य से राग उत्पन्न होता है और विराग का ही नाम ब्रह्म है । इन सप्त सूक्ष्म तत्त्वों को और षडंग महेश्वर को जान कर जो योगी क्रिया-कलाप में पटु होते हैं, वे ही परत्रह्म को प्राप्त करते हैं।२६९-३२। विधि तत्व को जानने वाले

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 45

तामुज्जहारार्णवतोयमग्नां करी निमग्नामिव हस्तिनीं हठात् ।नावं विशीर्णामिव तोयमध्याद् उदीर्णसत्त्वो ऽनुपमप्रभावः

tāmujjahārārṇavatoyamagnāṃ karī nimagnāmiva hastinīṃ haṭhāt / nāvaṃ viśīrṇāmiva toyamadhyād udīrṇasattvo 'nupamaprabhāvaḥ

हिन्दी अर्थ

व्यक्तियों ने प्रभु महेश्वर के षडज् तत्त्व को इस प्रकार बताया है, सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि बुद्धि, स्वतन्त्रता, नियत अविनश्वर शक्ति और अनन्त शक्ति ।३३। जो योगो परब्रह्म को ही नित्य धन समझने लगते हैं, उनके सभी उपसर्ग ब्वान्त हो जाते हैं। जिसने राग और प्राणायाम जनित उपसर्गों को जीत लिया है, उसके लिये वहिः शरीर में सर्वेकायं-साधिका एकमात्र धारणा ही विहित है । योंगी जहां-जहाँ जिस भूत विद्येष में मन को

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 46

स तां समुत्तार्य महाजलौघात् समुद्रमार्यो व्यभजत्समस्तम् ।महार्णवेष्वेव महार्णवाम्भो निक्षेपयामास पुनर्नदीषु

sa tāṃ samuttārya mahājalaughāt samudramāryo vyabhajatsamastam / mahārṇaveṣveva mahārṇavāmbho nikṣepayāmāsa punarnadīṣu

हिन्दी अर्थ

लगाते हैं, वहाँ वे प्रवेश कर जाते हैं ।२४-३५। वे तीनों लोकों को भी कपा सकते हैं। वे देह छोड़ कर दूसरी देह में भी प्रवेश कर सकते हैं। सब योगों का द्वार मत है। आदित्य को भी योग का द्वार कहते हैं। ये इन्द्रियों का आदान करते हैं भर्थात् इन्द्रिय-वुत्ति समूह का आकर्षण करते हैं, इससे वे भादित्य कहलाते हैं

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 47

शीर्णांश्च शैलान्स चकार भूयो द्वीपान्समस्तांश्च तथार्णवांश्च ।शैलोपलैर्ये विचिताः समन्ताच्छिलोच्चयांस्तान्स चकार कल्पे

śīrṇāṃśca śailānsa cakāra bhūyo dvīpānsamastāṃśca tathārṇavāṃśca / śailopalairye vicitāḥ samantācchiloccayāṃstānsa cakāra kalpe

हिन्दी अर्थ

इस विधि से योगी विषय से विरक्त होकर, सूक्ष्म तत्त्वों को त्याग कर और प्रकृति का अतिक्रमण करके रुद्र- लोक में निवास पाता है ।३५। ऐश्वर्य ग्रुण से संयुक्त होने पर योगी ब्रह्मत्व प्राप्त करता है। तब वे संपूर्ण

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 48

अनेकरूपं प्रविभज्य देहं चकार देवेन्द्रगणान्समस्तान् ।मुखाच्च वह्निर्मनसश्च चन्द्रश्चक्षोश्च सूर्यः सहसा बभूव

anekarūpaṃ pravibhajya dehaṃ cakāra devendragaṇānsamastān / mukhācca vahnirmanasaśca candraścakṣośca sūryaḥ sahasā babhūva

हिन्दी अर्थ

धनुश्चिद्वातगंतग्रन्थो घ. पुस्तके नास्ति ।

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 49

जज्ञे ऽथ तस्येश्वरयोगमूर्तेः प्रध्यायमानस्य सुरेन्द्रसङ्घः ।वेदाश्च यज्ञाश्च तथैव वर्णास् तथा हि सर्वौषधयो रसाश्च

jajñe 'tha tasyeśvarayogamūrteḥ pradhyāyamānasya surendrasaṅghaḥ / vedāśca yajñāśca tathaiva varṇās tathā hi sarvauṣadhayo rasāśca

हिन्दी अर्थ

वेशाचेन पिशाचांश्रव राक्षसेन च राक्षसान् । गान्धर्वेण च गन्धर्वास्कौबेरेण कुबेरजान ४० इन्द्रमैन्द्रेण स्थानेन सौम्यं सौस्येन चेव हि। प्रजापति तथा चेव प्राजापत्येन साधयेत् ॥४ १

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 50

जगत्समस्तं मनसा बभूव यत्स्थावरं किंचिदिहाण्डजं वा ।जरायुजं स्वेदजम् उद्भिज्जं वा यत् किंचिद् आ कीटपिपीलकाद्यम्

jagatsamastaṃ manasā babhūva yatsthāvaraṃ kiṃcidihāṇḍajaṃ vā / jarāyujaṃ svedajam udbhijjaṃ vā yat kiṃcid ā kīṭapipīlakādyam

हिन्दी अर्थ

नित्य॑ ब्रह्मपरों युक्तः स्थानान्येतानि वे त्यजेत्ू । असज्जमानः स्थानेषु द्विजः सर्वंगतो भवेत्. ४४३

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 51

ततो विजज्ञे मनसा क्षणेन अनेकरूपाः सहसा महेशा ।चकार यन्मूर्तिभिर् अव्ययात्मा अष्टाभिर् आविश्य पुनः स तत्र

tato vijajñe manasā kṣaṇena anekarūpāḥ sahasā maheśā / cakāra yanmūrtibhir avyayātmā aṣṭābhir āviśya punaḥ sa tatra

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ती योगोपसर्गनिरूप्ण नाम द्वादशोध्ध्याय:

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 52

लीलां चकाराथ समृद्धतेजा अतो ऽत्र मे पश्यत एव विप्राः ।तेषां मया दर्शनमेव सर्वं यावन्मुहूर्तात्समकारि भूप

līlāṃ cakārātha samṛddhatejā ato 'tra me paśyata eva viprāḥ / teṣāṃ mayā darśanameva sarvaṃ yāvanmuhūrtātsamakāri bhūpa

हिन्दी अर्थ

देवस्थानों से हो जायें यानी देवस्थानों में धारणा नहीं करें ।३६। तब वे अपने पिशाचगुण से पिशाचादि को, राक्षस गुण से राक्षसों को, गान्धवे गुण से गन्धरवों को, कौवेर गुण से कुबेर को, ऐन्द्र गुण से इन्द्र को, सोम्य गुण से सोम को, प्राजापत्य से प्रजापति को साथे ।४०-४१। ब्राह्म गुण से ब्रह्मै२ की साधना भी योगी करे । वे ही प्रभु सब कार्यों के प्रवतंक हैं। उनमें आसक्त होने से योगी उन्मत्त अर्थात् सिद्ध हो जाता है। उन्हीं से सब का

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 53

कृत्वा त्वशेषं किल लीलयैव स देवदेवो जगतां विधाता ।सर्वत्रदृक्सर्वग एव देवो जगाम चादर्शनमादिकर्ता

kṛtvā tvaśeṣaṃ kila līlayaiva sa devadevo jagatāṃ vidhātā / sarvatradṛksarvaga eva devo jagāma cādarśanamādikartā

हिन्दी अर्थ

प्रवर्तन होता है। इसलिये इन गुण स्थानों का त्यागकर योगी नित्य ब्रद्मा में रत हो जाय। इन स्थानों में अनासक्त योगी सकंत्रगामी हो जाता है

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 54

यत्तन्मुहूर्तादिह नामरूपं तावत् प्रपश्यामि जगत्तथैव ।द्वीपैः समुद्रैर् अभिसंवृतं हि नक्षत्रतारादिविमानकीर्णम्

yattanmuhūrtādiha nāmarūpaṃ tāvat prapaśyāmi jagattathaiva / dvīpaiḥ samudrair abhisaṃvṛtaṃ hi nakṣatratārādivimānakīrṇam

हिन्दी अर्थ

अत ऊध्वें प्रवक्ष्यामि ऐश्वरयंगुणविस्तरम् । येन योगविशेषेण सर्वलोकानतिक़़मेत् ३१ तत्राष्टग्रुणमैश्वर्य योगिनां समुदाहृतम् । तत्सवें क्रमयोगेन(ण )उच्यमानं निबोधत

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 55

वियत्पयोदग्रहचक्रचित्रं नानाविधैः प्राणिगणैर् वृतं च ।तां वै न पश्यामि महानुभावां गोरूपिणीं सर्वसुरेश्वरीं च

viyatpayodagrahacakracitraṃ nānāvidhaiḥ prāṇigaṇair vṛtaṃ ca / tāṃ vai na paśyāmi mahānubhāvāṃ gorūpiṇīṃ sarvasureśvarīṃ ca

हिन्दी अर्थ

अणिमा लघिमा चेव महिमा प्राप्तिरेव च्। प्राकाम्यं चव सबंत्र ईशित्यं चेव सर्वतः ४३ वशित्वमथ सर्वत्र यत्र कामावसायिता । तच्चापि विविध ज्ञेयमे श्वर्थ सावकासिकम्

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 56

क्व सांप्रतं सेति विचिन्त्य राजन्विभ्रान्तचित्तस्त्वभवं तदैव ।दिशो विभागानवलोकयान् ऋते पुनस्तां कथमीश्वराङ्गीम्

kva sāṃprataṃ seti vicintya rājanvibhrāntacittastvabhavaṃ tadaiva / diśo vibhāgānavalokayān ṛte punastāṃ kathamīśvarāṅgīm

हिन्दी अर्थ

तन्न सुक्ष्मप्रवत्तस्तु पञ्चभूतात्मक पुनः । इन्द्रियाणि मनश्चव बुद्धयहंकारसंज्ञितः ७... तथा सर्वेस्यं चेब आत्मस्था ख्यातिरेव च। संयोग एवं त्रिविधः सुक्ष्मेष्वेब प्रवर्तते

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 57

पश्यामि तामत्र पुनश्च शुभ्रां महाभ्रनीलां शुचिशुभ्रतोयाम् ।वृक्षैरनेकैरुपशोभिताङ्गीं गजैस्तुरङ्गैर्विहगैर्वृतां च

paśyāmi tāmatra punaśca śubhrāṃ mahābhranīlāṃ śuciśubhratoyām / vṛkṣairanekairupaśobhitāṅgīṃ gajaisturaṅgairvihagairvṛtāṃ ca

हिन्दी अर्थ

पुनरष्टगुणस्थापि तेष्वेवाथ प्रवर्तते । तस्य रूप॑ प्रवक्ष्यासि यथा55ह भगवान्प्रभुः

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 58

यथा पुरातीरमुपेत्य देव्याः समास्थितश्चाप्यमरकण्टके तु ।तथैव पश्यामि सुखोपविष्ट आत्मानम् अव्यग्रमवाप्तसौख्यम्

yathā purātīramupetya devyāḥ samāsthitaścāpyamarakaṇṭake tu / tathaiva paśyāmi sukhopaviṣṭa ātmānam avyagramavāptasaukhyam

हिन्दी अर्थ

वायु ब/ले---इससे आगे अब हम योग के ऐश्वयं-विस्तार को कहते हैं, जिस योगविशेष से तीनों लोक जीते जा सकते हैं ।१। योगियों के लिये आठ प्रकार के ऐद्वर्यं कहे गये हैं । उन्हें हम क्रम से कहते हैं, सुनिये--अणिमा, लघधिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामावसायिता। यह सा्वकामिक ऐश्वयं भी विविध प्रकार का है। जैसे सावद्य, निरवद्य और सूक्ष्म । सावद्य नाम का जो तत्त्व है, वहपंचभूता-

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 59

तथैव पुण्या मलतोयवाहां दृष्ट्वा पुनः कल्पपरिक्षये ऽपि ।अम्बाम् इवार्याम् अनुकम्पमानाम् अक्षीणतोयां विरुजां विशोकः

tathaiva puṇyā malatoyavāhāṃ dṛṣṭvā punaḥ kalpaparikṣaye 'pi / ambām ivāryām anukampamānām akṣīṇatoyāṃ virujāṃ viśokaḥ

हिन्दी अर्थ

त्मक है। निरवद्य भी पंचभूतात्मक है। स्थूल इन्द्रिय, मन और अहल्भार एवं सूक्ष्म इन्द्रिय मन और अहद्लार तथा सम्पूर्ण आत्मख्याति--अष्ठ ऐश्वर्यों की यह त्रिविध प्रवृत्ति है। स्थूल और सूक्ष्म सवंभूतों में यह अष्ट ऐश्व्यं जिस भाव से प्रवत्त होता है, उसे हम ठीक वैसा ही कहते हैं जैसा कि

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 60

एवं महत्पुण्यतमं च कल्पं पठन्ति शृण्वन्ति च ये द्विजेन्द्राः ।महावराहस्य महेश्वरस्य दिने दिने ते विमला भवन्ति

evaṃ mahatpuṇyatamaṃ ca kalpaṃ paṭhanti śṛṇvanti ca ye dvijendrāḥ / mahāvarāhasya maheśvarasya dine dine te vimalā bhavanti

हिन्दी अर्थ

त्रलोक्ये स्वभूतेषु जोवस्थानियतः स्मृतः। अणिमा च यथाव्यक्तं सर्व तत्र प्रतिष्ठितम् १० त्लोक्ये सवंभतानां दुष्प्राप्यं समुदाहृतम् । तच्चापि भवति प्राप्यं प्रथमं योगिनां बलात् ११

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

अध्याय १९

श्लोक 61

अशुभशतसहस्रं ते विधूय प्रपन्नास्त्रिदिवममरजुष्टं सिद्धगन्धर्वयुक्तम् ।विमलशशिनिभाभिः सर्व एवाप्सरोभिः सह विविधविलासैः स्वर्गसौख्यं लभन्ते

aśubhaśatasahasraṃ te vidhūya prapannāstridivamamarajuṣṭaṃ siddhagandharvayuktam / vimalaśaśinibhābhiḥ sarva evāpsarobhiḥ saha vividhavilāsaiḥ svargasaukhyaṃ labhante

हिन्दी अर्थ

त्रलोक्ये सर्व भुतानां प्राप्ति: प्राकाम्यमेव च । सहिसा चापि यो यस्मिस्तृतीयो योग उच्यते.

English

Then with a purity of mind, he should fill the body with Omkdra. Thus full of Omkdra, he does not perish.He becomes imperishable.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 19
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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