अध्याय २२४
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे वासवेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २२४ मार्कण्डेय उवाच: ततः क्रोशान्तरे पार्थ तीर्थं कोटीश्वरं परम् ।यत्र स्नानं च दानं च जपहोमार्चनादिकम् ।भक्त्या कृतं नरैस्तत्र सर्वं कोटिगुणं भवेत्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe vāsaveśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma trayoviṃśatyadhikadviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 224 mārkaṇḍeya uvāca: tataḥ krośāntare pārtha tīrthaṃ koṭīśvaraṃ param / yatra snānaṃ ca dānaṃ ca japahomārcanādikam / bhaktyā kṛtaṃ naraistatra sarvaṃ koṭiguṇaṃ bhavet
हिन्दी अर्थ
कृतबन्तो यतो लोभं महृत्तेष्वखिलेष्वपि । तस्मादुणाधिका यूयें भविष्यन्ति (थ) सदा द्विजाः भी देवता इस शिला पर न रहेंगे तो मैं भी स्थित न रह सकगा। यही प्रतिज्ञा है, इसका प्रतिपालन करते जाइयेगा ।६७-७०। गयासुर के वचन सुनकर विष्णु प्रभृति देवताओं ने कहा, गयासुर ! तुमने जो कुछ कहा है; वह सव सम्पन्न होगा इसमें सन्देह नहीं है । इस पवित्र तीर्थ में आनेवाले मनुष्य गण हम लोगों की पूजा करके परम गति प्राप्त करेंगे । देवगणों के इस प्रकार वरदान देने पर देत्य परम हर्षित हौकर सिश्चलता को प्राप्त
English
Why have I been harassed by Suras and Hari by means of the club? May Devas be delighted for ever now that I have been tortured."