Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
226
अध्याय 226 / 232

Adhyaya 226

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अध्याय २२६

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे रेवासागरसङ्गमे ऽलिकेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २२६ मार्कण्डेय उवाच: ततः क्रोशान्तरे पुण्यं तीर्थं तद्विमलेश्वरम् ।यत्र स्नानेन दानेन जपहोमार्चनादिभिः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe revāsāgarasaṅgame 'likeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcaviṃśatyadhikadviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 226 mārkaṇḍeya uvāca: tataḥ krośāntare puṇyaṃ tīrthaṃ tadvimaleśvaram / yatra snānena dānena japahomārcanādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

वे अपनी शय्या पर से उठ बैठे, धमंत्रता को देखा कि वह पर नहीं दबा रही है। उसके इस व्यवहार से विप्र वर मरीचि को महान् क्रोध हुआ, ओर उन्होंने श्ञाप दे दिया कि मेरी आज्ञा के बिना पैर का दबाना छोड़- कर तू अन्यत्र चली गई अतः इस पाप कम के कारण मैं तुझे श्ञाप दे रहा हूँ कि तू शिला हो जा ।३६:२७। पति के शाप देने पर धर्मत्रता को भी अमर्ष हुआ, उसने कहा, तुमको निद्रा लग गई थी, उसी समय तुम्दारे पृज्य पिताजी यहाँ पधारे ।२५। तुमको स्वंदा अपने गुद का उठकर पूजन-वन्दनादि करना चाहिए। अतः मैंने धर्म विचार कर तुम्हारे ही कर्त्तव्य का पालन किया था ।३६। इसमें मैं बिल्कुल निर्दोष हूं, तुमने तो नाहक मुझे शाप दिया है, अतः मैं भी तुम्हें शाप दे रही हूँ कि तुम्हें महादेवजी शाप देंगे, इश्रमें कोई संशय की बात नहीं है। अपने पति को शाप के भय से व्याकुल देखकर धर्मंत्रता को और भी व्याकुलता हुई, वह प्रजा:

English

The sage sported in her company like Vi§nu with Sri or Sambhu with Parvatl or Brahma with Sarasvatl.

अध्याय २२६

श्लोक 2

विमलेश्वरमाराध्य यो यदिच्छेत्स तल्लभेत् ।स्वर्गलाभादिकं वापि पार्थिवं वा यथेप्सितम्

vimaleśvaramārādhya yo yadicchetsa tallabhet / svargalābhādikaṃ vāpi pārthivaṃ vā yathepsitam

हिन्दी अर्थ

पति ब्रह्मा के पास गई । उस समय संयोगतः ब्रह्माजी निद्रा ले रहे थे। उन्हें प्रणाम कर इन्धनों द्वारा अग्नि को प्रज्वलित किया और उसी गाहंपत्याग्नि में स्थित होकर परम दारुण तप में लीन हो गई उधर अभिशप्त मरीचि भी तपस्या में दतचित्त होकर जुट गये ।३०-३२। उस परम तपस्व्रिनी धर्मत्रता एवं मरीचि के परम कठोर

English

Marici begot of her a hundred sons comparable even

अध्याय २२६

श्लोक 3

पुरा त्रिशिरसं हत्वा त्वष्टुः पुत्रं शतक्रतुः ।यस्य तीर्थस्य माहात्म्याद्वैमल्यं परमं गतः

purā triśirasaṃ hatvā tvaṣṭuḥ putraṃ śatakratuḥ / yasya tīrthasya māhātmyādvaimalyaṃ paramaṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

+ एतच्छलोकस्थाने5यं श्लोक॥ क. पुस्तके--तं व्याकुल॑ पति दुष्ट्वा व्याकुला सा पतित्रता । पतिब्रतात्व- (१०८८ वायुपुराणम्

English

As he was tired, he told thus to his chaste wife, "After taking food massage my feet, even as I lie down on the couch".

अध्याय २२६

श्लोक 4

यत्र वेदनिधिर्विप्रो महत्तप्त्वा तपः पुरा ।नानाकर्ममलैः क्षीणैर् विमलो ऽभवद् अर्कवत्

yatra vedanidhirvipro mahattaptvā tapaḥ purā / nānākarmamalaiḥ kṣīṇair vimalo 'bhavad arkavat

हिन्दी अर्थ

ऊचुः क्षीराम्बुधो सुप्तं संतप्तास्तपसा हरे । पतिब्रतायाश्च मुनेस्त्रलोक्यं रक्ष केशव

English

Dharmavrata said, "So be it". As the sage lay down on his bed, she rubbed his feet with ghee and began to massage them with eagerness.

अध्याय २२६

श्लोक 5

महादेवप्रसादेन सोमवत् प्रियदर्शनः ।पुरा भानुमतीं भानुः सुतां स्मरशरार्दितः

mahādevaprasādena somavat priyadarśanaḥ / purā bhānumatīṃ bhānuḥ sutāṃ smaraśarārditaḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्रादीनां वचः श्रुत्वा विष्णुधसन्नतो ययो । एतस्मिन्नेब काले तु प्रबुद्धो भगवानजः ॥। ह ऊचर्धमत्रतां देवा अग्निस्थां तां सकेशवा: द .

English

Even as the sage was becoming sleepy Brahma came to that place. She was placed in a dilemma, "Shall I continue to massage the feet or honour the Jagadguru (the pre¬ ceptor of the world)." Then deciding to honour him, as he was Guru of Gurus, she stood up.

अध्याय २२६

श्लोक 6

चकमे तेन दोषेण कुष्ठरोगार्दितो ऽभवत् ।स चाप्यत्र तपस्तप्त्वा विमलत्वम् उपागतः

cakame tena doṣeṇa kuṣṭharogārdito 'bhavat / sa cāpyatra tapastaptvā vimalatvam upāgataḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निमध्ये तपः कु कस्य शक्ति: पतिन्नते त्वया कृत॑ तत्यरमं सर्वलोकभयंक रस्

English

She offered Arghya, Padya etc. and worshipped Brahma. Brahma took rest on a couch after due worship.

अध्याय २२६

श्लोक 7

महादेवेन तुष्टेन स्वस्थानं मुदितो ऽभजत् ।तथैव च पुरा पार्थ विभाण्डकसुतो मुनिः

mahādevena tuṣṭena svasthānaṃ mudito 'bhajat / tathaiva ca purā pārtha vibhāṇḍakasuto muniḥ

हिन्दी अर्थ

बरं वरय धर्मज्ञे अस्मत्तो यदभीप्सितम् । विष्ण्वादीनां वच:ः श्रुत्वा देवान्धमंत्रताइन्नवीत् घमंत्रतावच: श्रुत्वा प्रोचरेतां सुरा: पुनः ध्मंत्नते धर्मपुत्रि शापोष्यं परमर्षिणा

English

In the meantime, the husband got up from his bed. Unable to see Dharmavrata, the Brahmana became infuriated and cursed her.

अध्याय २२६

श्लोक 8

योगिसङ्गं वने प्राप्य पुरे च नृपतेस् तथा ।राजसंसर्गदोषाद्वै मालिन्यं परमात्मनः

yogisaṅgaṃ vane prāpya pure ca nṛpates tathā / rājasaṃsargadoṣādvai mālinyaṃ paramātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

दत्तस्ते न निराकतु शकक्‍यों देवद्विजातिभिः । तस्मादन्यं बरं बृहि यतो धर्मस्य संस्थितिः) .

English

"Abandoning the massage of my feet and thereby dis¬ obeying my behest, you have gone elsewhere. Hence you will be consumed by this fire of curse. Be a slab of stone."

अध्याय २२६

श्लोक 9

विचारयन्नभ्युपेत्य रेवासागरसङ्गमम् ।शान्तया भार्यया सार्द्धं तप्त्वा द्वादशवत्सरान्

vicārayannabhyupetya revāsāgarasaṅgamam / śāntayā bhāryayā sārddhaṃ taptvā dvādaśavatsarān

हिन्दी अर्थ

भवेद्व त्रिषु लोकेषु वेदोक्तस्य शुभन्नते । देवानां वचन श्र॒ुत्वा देवान्धमंब्रताउब्रवीत्. तपस्या से इन्द्र प्रभति देवगण परम सन्तप्त होकर विष्णु भगवान् की शरण में गये । उस समय भगवान् विष्णु क्षी रसागर में शयव कर रहे थे, उक्त दम्पति की कठोर तपस्या से सन्तप्च देवताओं ने वहाँ जाकर प्रार्थना की कि देव परम तपस्विनी प्रतित्रता धर्मंत्रता एवं मुनिवर मरीचि के दारुण तप को देखकर हम लोग बहुत दुखी हैं, त्रैलोक्य की रक्षा कीजिये ।३३-३४। इन्द्रादि प्रमुख देवगणों का आर्त्तनिवेदन सुनकर भगवान् विष्णु

English

On being cursed by her husband, she spoke to Marici in a great fury, "While you were sleeping, Brahma, your father and preceptor, arrived here.

अध्याय २२६

श्लोक 10

कृच्छ्रचान्द्रायणैर् देवं तोषयंस्त्र्यम्बकं मुनिः ।महादेवेन तुष्टेन सो ऽपि वैमल्यमाप्तवान्

kṛcchracāndrāyaṇair devaṃ toṣayaṃstryambakaṃ muniḥ / mahādevena tuṣṭena so 'pi vaimalyamāptavān

हिन्दी अर्थ

धर्मत्रता के समीप गये, उधर इसी अबधि में स्वयम् भगवान् ब्रह्मा को भी नींद समाप्त हो गयी थी । अग्नि में अवस्थित होकर परम दारुण तपस्या में तत्पर धमंत्रता को देखकर विष्णु समेत समस्त देवगण बोले, पतिक्नते ! अग्नि में स्थित होकर तपस्या करने की शक्ति किसमें है ? तुमने समस्त संसार को भयभीत करः देने वाले उस परम दारुण तप का अनुष्ठान किया है, जिसे कोई नहीं कर सकता । धर्म के मर्म को तुम समझने वाली

English

It was your duty to have got up and worshipped your father. O sage, strictly adhering to pious activities (as a wife), I carried out your duty. Hence I am guiltless. Still I have been cursed by you. So I too curse you. O husband, you will have that curse undoubtedly from Mahadeva."

अध्याय २२६

श्लोक 11

शर्वाण्या प्रेरितः शर्वः पुरा दारुवने नृप ।मोहनान्मुनिपत्नीनां स्वं दीक्ष्य विमलं किल

śarvāṇyā preritaḥ śarvaḥ purā dāruvane nṛpa / mohanānmunipatnīnāṃ svaṃ dīkṣya vimalaṃ kila

हिन्दी अर्थ

हो । अपनी इच्छा के अनुरूप वरदान हम से माँग लो विष्णु प्रभ्नति देवताओं का वचन सुनकर धर्मंत्रता ने कहा, देववश्द पति के शाप का निराकरण मैं अपने स्वभाविक तेज से नहीं कर सकती थी, अतः उसी को निराकृत करने के लिये तपस्या कर रही है । पतिदेव मुनिवर मरीचि ने मुझे शाप दे दिया है, वह दूर हो जाय--यही मेरी कामना है ।३५-३५। धर्मंत्रता की बातें सुनकर देवताओं ने पुनः कहा; धर्म-पुत्रि धर्मत्रते यह शाप परम ऋषि मरीबि का दिया हुआ है, देवताओं एवं ब्राह्मणों में इसे बिष्फल करने की शक्ति नहीं है । इसलिए किसी अन्य वरदान की प्रार्थना करो, जिससे धर्म की मर्यादा विचलित न हो। शुभव्रते ! वेदों में वर्णित धर्म की जिस प्रकार मर्यादा न बिगड़े उसका विचार कर तीनों लोकों में चाहे परम दुलंभ क्‍यों न हो

English

On seeing her husband agitated, she too became distressed. She went to Prajapati and bowed to him, as he was lying down. She kindled the fire Gdrhapatya with fuel and stood in its middle. There she performed a very terrible penance. Similarly Marici who too had been cursed, performed a terrible penance.

अध्याय २२६

श्लोक 12

विचार्य परमस्थानं नर्मदोदधिसङ्गमम् ।तत्र स्थित्वा महाराज तपस्तप्त्वा सहोमया

vicārya paramasthānaṃ narmadodadhisaṅgamam / tatra sthitvā mahārāja tapastaptvā sahomayā

हिन्दी अर्थ

घनश्चिह्वान्तगंतग्रन्थः ख. पुस्तके नास्ति ।

English

Indra and others who were distressed due to the penance of Marici sought refuge in Hari.

अध्याय २२६

श्लोक 13

विमलो ऽसौ यतो जातस्तेनासौ विमलेश्वरः ।तेन नाम्ना स्वयं तस्थौ लोकानां हितकाम्यया

vimalo 'sau yato jātastenāsau vimaleśvaraḥ / tena nāmnā svayaṃ tasthau lokānāṃ hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

शिला5हं हि भविष्यासि ब्रह्माण्ड पावनी शुभा । नदीनदसरस्तीर्थंदेवादिभ्योइतिपावनी (३४३ ऋष्यादिश्यों मुनिम्यश्र मुख्यदेवेस्य एवं च । त्रेलोक्ये यानि लिड्भगनि व्यक्ताव्यक्तात्मकान्यपि ॥ तोर्थान्यपि च सर्वाणि नक्षत्रप्रमुखास्तथा । तिष्ठन्तु देवा: सकला देव्यश्न मुनयस्तथा १४५ शिलास्थितेषु तोथ्थेंषु स्नात्वा कृत्वाइ्थ तपंणम्। श्राद्ध सपिण्डक येषां ब्रह्मलोक॑ प्रयान्तु ते.

English

They spoke to Hari who was sleeping in the ocean of milk:' c O Hari, we are extremely distressed due to the penance

अध्याय २२६

श्लोक 14

ततस्तिलोत्तमां सृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ।प्रजानाथो ऽपि तां सृष्ट्वा दृष्ट्वाग्रे सुमनोहराम्

tatastilottamāṃ sṛṣṭvā brahmā lokapitāmahaḥ / prajānātho 'pi tāṃ sṛṣṭvā dṛṣṭvāgre sumanoharām

हिन्दी अर्थ

जरायुजाण्डजा वा5पि स्वेदजा वाइपि चोज्िदः । त्यक्त्वा देहं शिलायां ते यास्तु विष्णुस्वरूपताम् ॥। यथाचिते हरो सर्वे यज्ञा: पूर्णा भवन्ति हि। तथा श्राद्ध तपंणं च स्नान चाक्षयमस्त्विह ॥४ €

English

On hearing the words of Indra and others, Visnu went up to Dharmavrata. In the meantime, Aja (Brahma) woke up. The Devas including Kesava, spoke to Dharmavrata who was in the middle cf the fire:

अध्याय २२६

श्लोक 15

भावियोगबलाक्रान्तः स तस्यामभिको ऽभवत् ।तेन वीक्ष्य सदोषत्वं रेवातीरद्वयं श्रितः

bhāviyogabalākrāntaḥ sa tasyāmabhiko 'bhavat / tena vīkṣya sadoṣatvaṃ revātīradvayaṃ śritaḥ

हिन्दी अर्थ

पित्॒णा कुलसाहस्नरमात्मना सहिते नर: । श्राद्धादिना समुद्धत्य विष्णुलोक नयेद्श्ुवम् १५१ वरदान तुम माँग सकती हो । देवताओं की बातें सुनकर धर्मत्रता ने कह, देववुन्द यदि आप लोग पति के शाप को निराकृत करने में असमर्थ हैं तो मुझे इस प्रकार का वरदान दीजिए कि मैं निखिल ब्रह्माण्ड में परम पावत शिला रूप में प्रादुभूत होऊं। जितने भी नंद, नदी, सरोवर, तीथ्थ एवं देवादि हैं, उन सब से भधिक पबित्रता का मुझमें निवास हो ।३६-४३। वही नहीं जितने भी ऋषि मुनि एवं प्रमुख देवगण हैं, उन सबसे

English

"O chaste lady, who has the capacity to perform penance in the middle of the fire? But that has been achieved by you. It is really a thing that terrifies all worlds.

अध्याय २२६

श्लोक 16

तीर्थान्यनुसरन्मौनी त्रिस्नायी संस्मरञ्छिवम् ।रेवार्णवसमायोगे स्नात्वा सम्पूज्य शङ्करम् ।कालेनाल्पेन राजर्षे ब्रह्माप्यमलतां गतः

tīrthānyanusaranmaunī trisnāyī saṃsmarañchivam / revārṇavasamāyoge snātvā sampūjya śaṅkaram / kālenālpena rājarṣe brahmāpyamalatāṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

भी अधिक पविन्नता मुझमें हो । समस्त त्रलोक्य में जितने व्यक्ताण्यक्त लिझड्भादि हैं, वे सब तीर्थ रूप धारण कर हमारे शरीर में निवास करें ।४४। भूमण्डल के समस्त तीथे, नक्षत्रप्रमुख, समस्त देवगण, देवियाँ एवं मुनिगण-- सभी निवास करें। छिला पर स्थित उन तीथों में स्वान एवं तपंण कर जो पिण्डादि समेत श्राद्ध कम करें वे ब्रह्मलोक को प्राप्त करें ।४५-४६। उस शिला पर दृश्यतीर्थ गदाघर सभी तीर्थों में श्रेष्ठ हों,

English

O knower of Dharmas, choose any boon that you desire from us". On hearing the words of Visnu and others, Dharma¬ vrata spoke to the Devas:

अध्याय २२६

श्लोक 17

एवमन्ये ऽपि बहुशो देवर्षिनृपसत्तमाः ।त्यक्त्वा दोषमलं तत्र विमला बहवो ऽभवन्

evamanye 'pi bahuśo devarṣinṛpasattamāḥ / tyaktvā doṣamalaṃ tatra vimalā bahavo 'bhavan

हिन्दी अर्थ

वहाँ श्राद्धकर्म सम्पन्न करने से अनेक पितरों को मुक्ति प्राप्त हो । जरायुज, अण्डज, स्वेदब एवं उद्भिद्ू-सभी प्रकार के जीवनिकाय पविन्न शिला पर प्राण त्याय कर विष्णु की स्वरूपता प्राप्त करें। जिस प्रकार भगवान् विष्णु को पूजा कर देने पर सभी प्रकार यज्ञ पूर्ण हो जाते हैं, उसी प्रकार श्राद्ध, तपंण एवं स्नान करने से यहाँ अक्षय फल की प्राप्ति हो मेरे शरीर पर देवेशों के मंत्रों का जो जाप करे, वे थोड़े ही समय में सिद्धि प्राप्त करें ।४७-५०। अपने समेत पितरों एवं सहस्रों कुलों का वह मनुष्य उद्धार करनेवाला हो। उस पविन्न शिला पर श्राद्धादि सम्पन्न कर पितरों को प्रसन्न करनेवाला विष्णु लोक को भ्राप्त करे ॥५१। गज्जा प्रभृति

English

"I am unable to turn back the curse of my husband even with all my power. Let that curse given by Marlci to me recede."

अध्याय २२६

श्लोक 18

तथा त्वमपि राजेन्द्र तत्र स्नात्वा शिवार्चनात् ।अमलो ऽपि विशेषेण वैमल्यं प्राप्स्यसे परम्

tathā tvamapi rājendra tatra snātvā śivārcanāt / amalo 'pi viśeṣeṇa vaimalyaṃ prāpsyase param

हिन्दी अर्थ

१०६० वायुंपुरांण/

English

On hearing the words of Dharmavrata, the Devas spoke to her again, "O daughter of Dharma, of pious rites, this curse has been given to you by a great sage. It cannot be nullified by Devas and Brahmanas. Hence choose any other boon, so that the Dharma proclaimed by the Vedas will be established in the three worlds, O lady of auspicious vows". On hearing the words of Devas, Dhamavrata spoke to the Devas:

अध्याय २२६

श्लोक 19

तत्र स्नात्वा नरो नारी पूजयित्वा महेश्वरम् ।पापदोषविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते

tatra snātvā naro nārī pūjayitvā maheśvaram / pāpadoṣavinirmukto brahmaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

नुणा श्राद्ध विदधतो मुक्तये निवसन्‍्तु से ५२ +शरीरेण सामायास्तु क्वचिच्नो यान्तु देवताः । एको विष्णुस्त्रिधामृर्तियावित्संकीत्य॑ते बुघे:. तावच्छिलायां सर्वाणि तोर्थानि सह देवतेः सदा तिष्ठन्तु मुनयो गन्धर्वाणां गणाश्न ये

English

<c O immortal gods, if you are not able to redeem me from the curse of my husband, please grant me an excellent boon like this.

अध्याय २२६

श्लोक 20

तत्रोपवासं यः कृत्वा पश्येत विमलेश्वरम् ।अष्टम्यां च चतुर्दश्यां सर्वपर्वसु पार्थिव

tatropavāsaṃ yaḥ kṛtvā paśyeta vimaleśvaram / aṣṭamyāṃ ca caturdaśyāṃ sarvaparvasu pārthiva

हिन्दी अर्थ

यावत्तिष्ठति ब्रह्माण्ड तावत्तिष्ठतु वे शिला। मम वेहेडश्मरूपे च ये जपन्ति तपन्ति च

English

I shall then become a slab of stone which will be the most auspicious and the holiest in the whole of the Cosmic Egg. I shall be more sanctifying than rivers, lakes, Devas etc.

अध्याय २२६

श्लोक 21

सप्तजन्मकृतं पापं हित्वा याति शिवालयम् ।श्राद्धं कृत्वा विधानेन पित्ःणाम् अनृणी भवेत् ।ब्राह्मणान् भोजयेच्छक्त्या तेभ्यो दद्याच्च दक्षिणाम्

saptajanmakṛtaṃ pāpaṃ hitvā yāti śivālayam / śrāddhaṃ kṛtvā vidhānena pitḥṇām anṛṇī bhavet / brāhmaṇān bhojayecchaktyā tebhyo dadyācca dakṣiṇām

हिन्दी अर्थ

पतिब्रतावच: श्र॒त्वा देवाः प्रोचः पतिन्नताम् । त्वया यत्प्राथितं सर्व तख्भू विष्यत्यसंशयम् ५७ इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते गयामाहात्म्यं नाम सप्ताधिकशततमोः्ध्याय: ।

English

I shall be holier than the sages, ascetics, the chief of Devas and others. Let all those Lingas in the three worlds, whether manifest or unmanifest, abide for ever on my body in the form of a holy place.

अध्याय २२६

श्लोक 22

यद्यदिष्टतमं लोके यच्चैवात्महितं गृहे ।तत्तद्गुणवते देयं तत्रैवाक्षयमिच्छता ।स्वर्णधान्यानि वासांसि छत्रोपानत्कमण्डलुम्

yadyadiṣṭatamaṃ loke yaccaivātmahitaṃ gṛhe / tattadguṇavate deyaṃ tatraivākṣayamicchatā / svarṇadhānyāni vāsāṃsi chatropānatkamaṇḍalum

हिन्दी अर्थ

जितनी श्रेष्ठ नदियाँ, मनोहर सरोवर, समुद्रादि पवित्र मानसादि तीर्थ, इस्द्रादि देवगण हों बे श्राद्धकर्तता को मुक्ति प्रदान करने के लिये मेरे शरीर पर निवास करें ।५२। देवगण, आप लोग अपने मूर्त रूप से यहाँ बने रहें, कहीं अन्यत्र न जाय । पण्डित लोग तीन स्वरूपों में व्यक्त होनेवाले एक मात्र भगवान् विष्णु का जब तक संकीतंन करें तब तक शिला पर सभी तीर्थ एवं देवगणण निवास करते रहें। मुनियों एवं गन्धवों का भी

English

Let all the holy centres, the chiefs of the constellations, all the Devas and the Devls (goddesses) and the sages stand by (on me). Brahma, Visnu and Rudra shall mark theirfootprints on me. The five fires andKumara and others be stationed in their multiforms. The Devas are stationed in their embodied and

अध्याय २२६

श्लोक 23

गृहं देवस्य वै शक्त्या कृत्वा स्याद् भुवि भूपतिः ।गीतनृत्यकथाभिश्च तोषयेत् परमेश्वरम्

gṛhaṃ devasya vai śaktyā kṛtvā syād bhuvi bhūpatiḥ / gītanṛtyakathābhiśca toṣayet parameśvaram

हिन्दी अर्थ

सर्वदा उस पर निवास रहे ! जब तक ब्रह्माण्ड का अस्तित्व रहे तब तक इस शिला का अस्तित्व रहे। पत्थर रूपी मेरे शरीर पर स्थित होंकर जो लोग जप, तपस्या एवं हवनादि करें, वे अक्षय फल प्राप्त करें। इस पर किया गया श्राद्ध जप, हवन एवं तप--सभी अक्षय फलदायी हों देवगण ! आप लोग शिलाओं एवं पर्वत- शिक्षरों का स्वरूप धारण कर मेरे शरीर पर सवंदा स्थित रहें ।१३-४६। पतिप्रायण धर्मनत्रता के बचनों को सुनकर देवताओं ने कहा, धर्मत्रते ! बुम्हारी अभिलाषाएं पूर्ण होंगी--इसमें सन्देह मत करना । गयासुर के शिर पर जब तुम स्थिर होगी तब चरणादि स्वरूप से हम लोग तुम्हारे शरीर पर स्थिण होंगे इस प्रकार धर्मत्रता को बरदान देने के उपरान्त देवगण अन्तर्धान हो गये

English

All the people will become purified on seeing that slab which is the destroyer of all great sins. The performer of Sradd- has becoming pure, will be authorised in the holy rites and will attain Brahmaloka.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 226
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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