अध्याय २२६
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे रेवासागरसङ्गमे ऽलिकेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २२६ मार्कण्डेय उवाच: ततः क्रोशान्तरे पुण्यं तीर्थं तद्विमलेश्वरम् ।यत्र स्नानेन दानेन जपहोमार्चनादिभिः
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe revāsāgarasaṅgame 'likeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcaviṃśatyadhikadviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 226 mārkaṇḍeya uvāca: tataḥ krośāntare puṇyaṃ tīrthaṃ tadvimaleśvaram / yatra snānena dānena japahomārcanādibhiḥ
हिन्दी अर्थ
वे अपनी शय्या पर से उठ बैठे, धमंत्रता को देखा कि वह पर नहीं दबा रही है। उसके इस व्यवहार से विप्र वर मरीचि को महान् क्रोध हुआ, ओर उन्होंने श्ञाप दे दिया कि मेरी आज्ञा के बिना पैर का दबाना छोड़- कर तू अन्यत्र चली गई अतः इस पाप कम के कारण मैं तुझे श्ञाप दे रहा हूँ कि तू शिला हो जा ।३६:२७। पति के शाप देने पर धर्मत्रता को भी अमर्ष हुआ, उसने कहा, तुमको निद्रा लग गई थी, उसी समय तुम्दारे पृज्य पिताजी यहाँ पधारे ।२५। तुमको स्वंदा अपने गुद का उठकर पूजन-वन्दनादि करना चाहिए। अतः मैंने धर्म विचार कर तुम्हारे ही कर्त्तव्य का पालन किया था ।३६। इसमें मैं बिल्कुल निर्दोष हूं, तुमने तो नाहक मुझे शाप दिया है, अतः मैं भी तुम्हें शाप दे रही हूँ कि तुम्हें महादेवजी शाप देंगे, इश्रमें कोई संशय की बात नहीं है। अपने पति को शाप के भय से व्याकुल देखकर धर्मंत्रता को और भी व्याकुलता हुई, वह प्रजा:
English
The sage sported in her company like Vi§nu with Sri or Sambhu with Parvatl or Brahma with Sarasvatl.