अध्याय ३५
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे रवितीर्थवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ३५ युधिष्ठिर उवाच: जलमध्ये महादेवः केन तिष्ठति हेतुना ।उत्तरं दक्षिणं कूलं वर्जयित्वा द्विजोत्तम
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe ravitīrthavarṇanaṃ nāma catustriṃśo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 35 yudhiṣṭhira uvāca: jalamadhye mahādevaḥ kena tiṣṭhati hetunā / uttaraṃ dakṣiṇaṃ kūlaṃ varjayitvā dvijottama
हिन्दी अर्थ
भोगों का परित्याग कर देते हैं। जो मत्यं आपका साक्षात्कार करके विशुद्ध होते हैं, वे अपने कमंफल के अनुसार दिव्य भोगों का उपभोग करते हैं ।!६६। आप अप्रमेय तत्त्व हैं। अपनी शक्ति से जसे हमने आपको समझा वसा ही आपके अपार माहात्म्य का कीर्तन किया। आप हमारे लिये सवंत्र कल्याण-कारक हों। आप जो हैं, वही हैं अर्थात् आप अज्ञेय और अप्राप्य हैं आपको नमस्कार है!
English
What is described as the root of the pericarp 1 is seventy thousand Yojanas beneath.