Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
46
अध्याय 46 / 232

Adhyaya 46

38 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ38 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय ४६

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे अन्धकवरप्रदानवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ४६ श्रीमार्कण्डेय उवाच: स दानवो वरं लब्ध्वा जगाम स्वपुरं प्रति ।ददर्श स्वपुरं राजञ्छोभितं चित्रचत्वरैः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe andhakavarapradānavarṇanaṃ nāma pañcacatvāriṃśo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 46 śrīmārkaṇḍeya uvāca: sa dānavo varaṃ labdhvā jagāma svapuraṃ prati / dadarśa svapuraṃ rājañchobhitaṃ citracatvaraiḥ

हिन्दी अर्थ

न च यक्षा: विशाचा वा न नागा न विनायका: । कुर्युविध्न॑ गृहे तस्य यत्र संस्तुयते भवः

English

On hearing this and desirous of hearing further, the delighted sages asked Lornaharsana:

अध्याय ४६

श्लोक 2

उद्यानैश्चैव विविधैः कदलीखण्डमण्डितैः ।पनसैर्बकुलैश्चैवाम्रातैराम्रैश्च चम्पकैः

udyānaiścaiva vividhaiḥ kadalīkhaṇḍamaṇḍitaiḥ / panasairbakulaiścaivāmrātairāmraiśca campakaiḥ

हिन्दी अर्थ

शुणुयाद्वा इदं नारी सुभक्तद्ा ब्रह्मचारिणी । पितृभिभंतृ पक्षाभ्यां पुज्या भवति देववत् ३१२ शुणुयाद्वा इदं सर्व कीतंयेद्वाउप्पभीक्षणशः । तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धि गच्छुन्त्यविध्नतः ७३१३ मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचाःप्युदाहतम् । सर्व संपद्यते तस्थ स्तवनस्यानुकीतेनात् ॥ रे १४ छल /+ हट ज--फैफप-भनकहैहफ-फः।/थ,-।/पडपहह है ियण।णएए

English

The sub-continent of Bharata has been described by you. Now describe the Kimpurusa 1 and Hari Varsas. 2 Thus requested by the Brahmanas, Lornaharsana replied suitably this question as follows (lit. in the manner indicated in this Purana).

अध्याय ४६

श्लोक 3

अशोकैर्नालिकेरैश्च मातुलिङ्गैः सदाडिमैः ।नानावृक्षैश्च शोभाढ्यं तडागैरुपशोभितम्

aśokairnālikeraiśca mātuliṅgaiḥ sadāḍimaiḥ / nānāvṛkṣaiśca śobhāḍhyaṃ taḍāgairupaśobhitam

हिन्दी अर्थ

विभिका ज्वर है एवं इसी प्रकार सिंहों के लिये भी परिश्रम ज्वर कहा गया है ।३०३। स वेज्ञ ! मनुष्यों के लिये वह ज्वर नाम से कहा गया है, जो जन्म-मरणकाल में और बीच में भी मनुष्यों के शरीर में प्रवेश करता है । यह जो अत्थन्त कठोर ज्वर हैं, वह महेश्वर का तेज है; अतएवं यह ईश्वर ज्वर सब प्राणियों हारा माननीय और वन्दनीय है ।३०४-३०५। जो मनुष्य सुप्रसन्नचित्त से एकाग्र होकर इस ज्वरोत्पत्ति को सदा पढ़ता है,

English

Please listen, O Brahmanas, to what you are pleased to hear. In the Kimpurusa country, there is a big grove of Plaksa trees comparable to the Nandana forest.

अध्याय ४६

श्लोक 4

देवतायतनैर् दिव्यैर् ध्वजमालासुशोभितैः ।वेदाध्ययननिर्घोषैर् मङ्गलाद्यैर् विनादितम्

devatāyatanair divyair dhvajamālāsuśobhitaiḥ / vedādhyayananirghoṣair maṅgalādyair vināditam

हिन्दी अर्थ

वह रोग से छटकारा पाकर आनन्द लाभ करता है और अपनी अभिलषित कामना को प्राप्त करता है दक्ष द्वारा कहे गये स्तव को भी जो सुनता है या कहता है, उसका कोई अनिष्ट नहीं होता और वह दीर्घायु प्राप्त करता है। जैसे सब देवों में योगी महादेव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सतवों के बीच यह ब्रह्मानिर्मित स्तव श्रेष्ठ है ।३०७-३०८५। यश, राज्य, सुख, ऐश्वयं, धन, आयु, वित्त और विद्या की कामना करने वाले यत्नपूर्वक, भक्ति पूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करें । जो पीड़ित, ढुंःखी, दीन, चोर से डरे हुए और राजकायं में नियुक्त हैं,

English

The span of life in the Kimpurusa land is said to be ten thousand years. The men are gold-complexioned and the women resemble Apsaras-s.

अध्याय ४६

श्लोक 5

प्राविशद्भवने दिव्ये काञ्चने रुक्ममालिनि ।अपश्यत्स सुतान् भार्याम् अमात्यान् दासभृत्यकान्

prāviśadbhavane divye kāñcane rukmamālini / apaśyatsa sutān bhāryām amātyān dāsabhṛtyakān

हिन्दी अर्थ

वे बड़े भय से भी मुक्त हो जाते हैं ।३०६-३१०। इसी देह से वे गणों के बीच गणाधिप हो जाते हैं ओर इस लोक में सुख प्राप्त कर शिवगण हो जाते हैं। जिस घर में इस स्तव से महदेव की स्तुति होती है, वहाँ यक्ष, पिशाच, नाग और विनायक आदि कोई विन्न नहीं करते हैं, ब्रह्मचारिणी हो ऋर भक्ति श्रद्धा से जो स्त्री इस स्तबराज का श्रवण करती है, वह पितृकुल और भ्रातृकुल में देवता को तरह पूज्य होती हैं

English

They do not suffer from ailments; they are devoid of sorrows; they are pure in mind; they possess the lustre of molten gold.

अध्याय ४६

श्लोक 6

ततो जयप्रदान् सर्वान् इतश्चेतश्च धावतः ।हृच्छोभां च प्रकुर्वाणान् वै जयन्तीभिरुच्चकैः

tato jayapradān sarvān itaścetaśca dhāvataḥ / hṛcchobhāṃ ca prakurvāṇān vai jayantībhiruccakaiḥ

हिन्दी अर्थ

जो इस सम्पूर्ण स्तोत्र का श्रवण करता है या बार-बार पाठ करता है, उसके सभी कार्य निविन्न रूप से शस््ृषध. वायुपु राणम्

English

In this holy country Kimpurusa, there is a fig tree exuding honey. All the inhabitants of Kimpurusa Varsa drink its excellent juice.

अध्याय ४६

श्लोक 7

केचित् तोरणम् आबध्य केचित् पुष्पाण्यवाकिरन् ।मातुलिङ्गकराश्चान्ये धावन्ति ह्यन्धकं प्रति

kecit toraṇam ābadhya kecit puṣpāṇyavākiran / mātuliṅgakarāścānye dhāvanti hyandhakaṃ prati

हिन्दी अर्थ

देवस्प सगुहस्याथ देव्या नन्‍्दीश्वरस्य तु। बलि विभवतः क्ृत्वा दमेन नियमेन च

English

Adjoining Kimpurusa, there is Harivarsa where the people are yellow as gold in complexion.

अध्याय ४६

श्लोक 8

पुरे जनाश्च दृश्यन्ते भाजनैरन्नपूरितैः ।पूर्णहस्ताः प्रदृश्यन्ते तत्रैव बहवो जनाः

pure janāśca dṛśyante bhājanairannapūritaiḥ / pūrṇahastāḥ pradṛśyante tatraiva bahavo janāḥ

हिन्दी अर्थ

ततः स शुल्को गृह्लीयान्नामान्याशु यथाक्रमम् । ईप्सितॉल्लभतेध्त्यर्थ कामान्भोगांश्व मानवः॥ सर्वकमंसु युक्तो वा युक्तो वा सर्वंपातक: । पठन्दक्षकृतं स्तोत्र स्बपापेः प्रमुच्यते ॥ क्‍ मृतभ्न गणसालोक्य॑ पुज्यमानः सुरासुरे:

English

All the people there are descended from Devaloka and

अध्याय ४६

श्लोक 9

साक्षतैर् भाजनैस् तत्र शतसाहस्रयोषितः ।मन्त्रान् पठन्ति विप्राश्च मङ्गलान्यपि योषितः

sākṣatair bhājanais tatra śatasāhasrayoṣitaḥ / mantrān paṭhanti viprāśca maṅgalānyapi yoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

इत्याह भगवान्व्यासः पराशरसुतः प्रभु:ः। नतद्वेदयते कश्चिन्नेदं श्राव्यं तु कस्यचित्

English

Kimpuru§7 Var? a a mythical land-GAMI, ; Kimpurusa

अध्याय ४६

श्लोक 10

अमात्याश्चैव भृत्याश्च गजांश्चाढौकयन्ति च ।वर्धापयन्ति ते सर्वे ये केचित् पुरवासिनः

amātyāścaiva bhṛtyāśca gajāṃścāḍhaukayanti ca / vardhāpayanti te sarve ye kecit puravāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रुत्वेतत्परमं गुह्य येडपि स्थुः पापकारिण: । वेश्या स्त्रियश्व शूद्राश्व रुद्लोकसवाप्नुयुः श्रावयेच्स्तु विप्रेम्यः सदा परवं॑सु पव॑सु । रुद्रलोकमवाप्नोति द्विजो वे नात्र संशयः

English

In the central sub-continent Ilavrta 1 which I have mentioned before, the sun does not blaze fiercely and men do not get aged (pre-maturely).

अध्याय ४६

श्लोक 11

हृष्टस्तुष्टो ऽवसत्तत्र सचिवैः सह सो ऽन्धकः ।ददर्श स जगत्सर्वं तुरङ्गांश्च पदातिकान्

hṛṣṭastuṣṭo 'vasattatra sacivaiḥ saha so 'ndhakaḥ / dadarśa sa jagatsarvaṃ turaṅgāṃśca padātikān

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोत्त दक्षप्रोक्तस्तवों नाम त्रिशोध्ध्याय: ॥

English

In Ilavrta the moon, the sun and the stars are dim. Men have the colour, lustre and fragrance of the lotus flower. Their eyes are as wide as the lotus leaf.

अध्याय ४६

श्लोक 12

तथैव विविधान् कोशांस् तत्र काञ्चनपूरितान् ।महिषीर्गा वृषांश्चैवापश्यच्छत्राण्यनेकधा

tathaiva vividhān kośāṃs tatra kāñcanapūritān / mahiṣīrgā vṛṣāṃścaivāpaśyacchatrāṇyanekadhā

हिन्दी अर्थ

सम्पन्न हो जाते हैं। जो इस स्तोत्र को जोर-जोर से पढ़ता है या मन-हौ-मन पढ़ता है, उसके सभी कार्य स्तोत्र पढ़ने के कारण सिद्ध हो जाते है।३१४ ३१५। कारतिकेय के साथ नन्दीश्वर मह.देव और देवी को धन के अनुरूप नैवेद्य चढ़ाकर यम-नियम पूव॑ंक दक्षिणा देकर स्तोत्र में आये हुए नामों का शीघ्रता से पाठ करे। इस विधि से जो मानव इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह अभिलषित कामनाओं को और सकल भोगों को प्राप्त करता है एवं मरने पर सहस्र स्त्रियों के साथ स्वर्ग को जाता द्वे।३१६-३१७। जो सप्ती प्रकार के

English

They feed on the juice of Jambu fruit. They neither grow aged nor decay. They have fragrance. They are cultured and polished. They enjoy pleasures as the fruit of their aus- pioious rites.

अध्याय ४६

श्लोक 13

स एवमन्धकस् तत्र कियन्तं कालमावसत् ।हृष्टस्तुष्टो वसन् मर्त्ये स सुरैर् नाभ्यभूयत

sa evamandhakas tatra kiyantaṃ kālamāvasat / hṛṣṭastuṣṭo vasan martye sa surair nābhyabhūyata

हिन्दी अर्थ

हो जाते हैं और मरने पर देव-दानवों से पूजित होकर गण-सालोक्य प्राप्त करते, सुसज्जित विमान पर वह इन्द्र की तरह शोभित होते और रुद्र के अनुचर होकर युगान्त पर्यन्‍्त वरतंमात रहते हैं, पराशरसुत भगवान् व्यास ने ऐसा कहा है ।३१८-३१६२। बिना विचारे सहसा किसी को बतलाना नहीं चाहिए और न तो सुनाना ही चाहिए। इस परम गुह्म स्तोत्र को सुनकर सभी पापात्मा वंश्य, स्त्री, शूद्र आदि रुद्रलोक

English

They are fallen from Devaloka. They are non-senile and deathless. These excellent men live for thirteen thousand years.

अध्याय ४६

श्लोक 14

वरं लब्धं तु तं ज्ञात्वा शङ्किताः स्वर्गवासिनः ।एकीभूताश्च ते सर्वे वासवं शरणं गताः

varaṃ labdhaṃ tu taṃ jñātvā śaṅkitāḥ svargavāsinaḥ / ekībhūtāśca te sarve vāsavaṃ śaraṇaṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्त करते हैं । जो ब्राह्मण प्रति पव में इसे विप्रों को सुनाता है, वह नि.सन्देह रुद्रलोक प्राप्त करता है इत्येषा समनुज्ञाता कथा पापप्रणाशिनी । दक्षमधिकृत्येह कथा शर्वादृपागता ११ पितृबंशप्रसहगेन कथा ह्य वा प्रकोतिता। पितुणामानृपृव्येण देवान्वक्ष्याम्पतः परम् २ त्रेतायुगमुखे पुर्वंमासन्स्वायंभुवेउन्तरे। देवा यामा इति ख्याताः पूर्व ये यज्ञसुनवः .

English

In the sub-continent Ilavfta, they live the full span of life. The sub-continent is twenty six thousand Yojanas in length and nine thousand Yojanas in breadth around Meru. It is fashioned like a saucer.

अध्याय ४६

श्लोक 15

शक्र उवाच: कथमागमनं वो ऽत्र सर्वेषाम् अपि नाकिनाम् ।कस्माद्वो भयमुत्पन्नमागताः शरणं कथम्

śakra uvāca: kathamāgamanaṃ vo 'tra sarveṣām api nākinām / kasmādvo bhayamutpannamāgatāḥ śaraṇaṃ katham

हिन्दी अर्थ

अजिता ब्रह्मण: पुत्रा जिता जिदजिताश् ये । पुत्राः स्वायंभुवस्येते शुक्रनाम्ता तु मानसाः. ॥

English

Nine thousand Yojanas to the west of Meru lies the mountain Gandhamadana, thirtyfour thousand Yojanas long.

अध्याय ४६

श्लोक 16

ततस्ते ह्यमराः सर्वे शक्रम् एतद् वचो ऽब्रुवन्

tataste hyamarāḥ sarve śakram etad vaco 'bruvan

हिन्दी अर्थ

तृप्तिमन्तो गणा हाय ते देवानां तु त्रयः स्मृताः । छन्दोगास्तु त्रयस्त्रिशत्सवें स्वायंभुवस्य ह ३५ यदुयंयातिद्वों देवी दीधयः ख़बसो सतिः विभासश्र क्तुश्चेव प्रजातिविशतो द्युतिः ६ वायसो मड्भलश्चेव यामा द्वादश कीतिता: । अभिमस्युरुग्रदृष्टि: समयोडथ शुचिश्रवाः ॥ कवलो विश्वरूवश्न सुपक्षो मधुपस्तथा सूत जी बोले-यह पापनाशिनी कथा आप लोगों को अब ज्ञात हो गई । यह दक्ष से सम्बन्ध रखने

English

To the north and south, it stretches upto Nila and Nisadha mountains. Its height is forty thousand Yojanas. It penetrated downwards to a thousand Yojanas.

अध्याय ४६

श्लोक 17

देवा ऊचुः ।सुरनाथान्धको नाम दैत्यः शम्भुवरोर्जितः ।अजेयः सर्वदेवानां किं नु कार्यमतः परम्

devā ūcuḥ / suranāthāndhako nāma daityaḥ śambhuvarorjitaḥ / ajeyaḥ sarvadevānāṃ kiṃ nu kāryamataḥ param

हिन्दी अर्थ

वाली कथा महादेव से प्राप्त हुई है, जो पितरों के बंश-वर्णन के प्रसंग में कह दी गई है। पितृबंश वर्णन की ही तरह अब आगे हम देव वंश का वर्णन करते हैं ।१-२। पहले स्वायम्भुव मनु के अधिकार काल में त्रेता युग के आदि में याम नाम के विख्यात देव थे, जो पहले यज्ञ-्तनय थे । उनमें अजित ब्रह्मा कै पुत्र थे ओर जित, जित् तथा अजित स्वायम्भुव के पुत्र थे। ये शुक्र नामक मानस पुत्र कहलाते थे ।३-४। देवों के तोन

English

The mountain Malyavan lies in the east. Its magnitude has already been mentioned. It is to the south of Nila and to the north of Nisadha. The great mountain Meru of extensive magnitude lies in the centre of these mountains, which seem to penetrate it.

अध्याय ४६

श्लोक 18

तत्त्वं चिन्तय देवेश क उपायो विधीयताम् ।इत्थं वदन्ति ते देवाः शक्राग्रे मन्त्रणोद्यताः

tattvaṃ cintaya deveśa ka upāyo vidhīyatām / itthaṃ vadanti te devāḥ śakrāgre mantraṇodyatāḥ

हिन्दी अर्थ

गण कहे गये हैं, जिनमें ये तृप्तिमान् गण कहलाते हैं। स्वायम्भूव मनु के तेतीस पुत्र छनन्‍्दोग कहलाते हैं यदू, ययाति नामक दो देव एवं दीध्रयः. स्वत, मति, विभास, कतु, प्रजापति, विशत, युति, वायस और मज्भल नामक बारह देव याम कहलाते हैं ।६-६३। अभिमन्यु, उम्रदृष्टि, समय, शुचिश्रवा, केवल विश्वरूप,

English

A river of Jambu juice resembling liquified collyrium flows from the south of Meru to the north of Nisadha.

अध्याय ४६

श्लोक 19

मन्त्रयन्ति च यावद् वै तावच्चारमुखेरितम् ।ज्ञात्वा तत्र स देवौघं दानवो निर्गतो गृहात्

mantrayanti ca yāvad vai tāvaccāramukheritam / jñātvā tatra sa devaughaṃ dānavo nirgato gṛhāt

हिन्दी अर्थ

+घनुद्चित्वान्तगंतग्रन्थ: ख. ग. ध. पुस्तकेषु नास्ति ।

English

IJavrja The country surrounding the Pamirs (AGP, , fig 2).

अध्याय ४६

श्लोक 20

एकाकी स्यन्दनारूढ आयुर्धैबहुभिर् वृतः ।दुर्गमं मेरुपृष्ठं स लीलयैव गतो नृप

ekākī syandanārūḍha āyurdhaibahubhir vṛtaḥ / durgamaṃ merupṛṣṭhaṃ sa līlayaiva gato nṛpa

हिन्दी अर्थ

तुरीयो निह॑युश्चेव युक्तो ग्रावाजिनस्तु ते । यमिनो विश्वदेववा्य यविष्ठो5 वृतवानपि ८ अजिरो विभुविभावश्न मृलिको5थ दिदेहक: । श्रुतिशुणों बृहच्छुक्रो देवा द्वादश कीतिताः ६ आसन्‍्त्वायंभुवस्येते अन्तरे सोमपायिनः । स्विषिमस्तो गणा हा ते दीयंबन्तो महाबला: सुपर्णयक्षगन्धर्वा: पिशाचोरगराक्षसा:। अष्टो ते पितृभ्निः सार्थ नासत्या देवयोनयः १२

English

There is an everlasting Jambu tree called Sudarsana. It blooms and bears fruits perpetually. It 13 resorted lo by Siddhas and Caranas. It is the biggest tree in Jambudvlpa, a hundred thousand Yojanas high. This lordly tree touches heaven. The length of the fruit is eight hundred and sixty one Aratnis. This is determined by sage r. who know the truth.

अध्याय ४६

श्लोक 21

स्वर्णप्राकारसंयुक्तं शोभितं विविधाश्रमैः ।दुर्गमं शत्रुवर्गस्य तदा पार्थिवसत्तम

svarṇaprākārasaṃyuktaṃ śobhitaṃ vividhāśramaiḥ / durgamaṃ śatruvargasya tadā pārthivasattama

हिन्दी अर्थ

अतीते वर्तमाने न दृष्टो वेवस्वतेन सः। प्रजाभिदेंबताभिश्व ऋषिभिः पितृनिः सह ३१५

English

When the fruits fall on the ground, they make a loud noise. The juice of the Jambu fruits develops into a flowing river.

अध्याय ४६

श्लोक 22

प्रविवेशासुरस्तत्र लीलया स्वगृहे यथा ।वृत्रहा भयमापन्नः स्वकीयं चासनं ददौ

praviveśāsurastatra līlayā svagṛhe yathā / vṛtrahā bhayamāpannaḥ svakīyaṃ cāsanaṃ dadau

हिन्दी अर्थ

वायुप्रोक्ता महासत्त्वा राजानः प्रथमेबन्तरे । सासुरं तत्सगन्धर्व सयक्षोरगराक्षसम् ॥ सुयक्ष, ( सुरक्ष ) मधुप, तुरीय, निहयुं युक्त, ग्रावाजिन, यमी, विश्वेदेवादि, यविष्ठ, मृतवानू, अजिर, विशभु, मुलिक, दिदेहक, श्रुतिशुण, बृहच्छुक और ऊःर कहे गये बारह देव स्वायम्भव मन्वन्तर के काल में वर्तमान ये ।७०३४। ये सोम-पीने वाले महाबली और वीयेशाली थे। ये त्विषिमान गण के कहलाते थे । विश्वभुक् प्रथम विभु उन लोगों के इन्द्र थे । उस समय जो असुर गण थे, वे भी इनके जाति-भाई थे । सुपर्ण, यक्ष, गन्धव,

English

The river passes around Meru and then enters Jambu inula and the people there drink of it. They are delighted and surrounded by the tasty Jambu fruits.

अध्याय ४६

श्लोक 23

उपविष्टो ऽन्धकस्तत्र शक्रस्यैवासने शुभे ।आस्थानं कलयामास सर्वतस्त्रिदशावृतम्

upaviṣṭo 'ndhakastatra śakrasyaivāsane śubhe / āsthānaṃ kalayāmāsa sarvatastridaśāvṛtam

हिन्दी अर्थ

पिजश्ञाच, उरग, राक्षस और पितरों के साथ नासत्य ये आठों देवयोनि कहलाते थे । इनके प्रभाव और रूप से संयुक्त एवं आयुष्मान् तथा बलवान् सन्‍्तानें हजारों की संख्या में स्वायम्भुव मन्वन्तर में बीत चुके हैं (०-१ ३। उसको विस्तार पूर्बक नहीं कहा जा रहा है; क्योंकि उसका प्रसंग भी यहाँ नहीं है । स्वायम्भुव मनु के काल का सृष्टि विस्तार वतंमान मनु की ही तरह समझना चाहिए । अतीत मन्वन्तर में प्रजा सृष्ठि या स्वभावादि

English

Imbibing the juice they conquer old age. Certainly they never fall sick or die.

अध्याय ४६

श्लोक 24

शक्र उवाच: किं तवागमनं चात्र किं कार्यं कथयस्व मे ।यदस्मदीयं वित्तं हि तत्ते दास्यामि दानव

śakra uvāca: kiṃ tavāgamanaṃ cātra kiṃ kāryaṃ kathayasva me / yadasmadīyaṃ vittaṃ hi tatte dāsyāmi dānava

हिन्दी अर्थ

वर्तमान बैवस्वत मनु के काल की ही तरह देखा जाता है । प्रजाओं, देवताओं, ऋषियों और पितरों के साथ पहले जो उनमें सप्तर्ि थे, उनको सुनिये -भूगु. अंगिरा, मरीचि, पुलस्त्य, पुलह, ठु, अनञ्रि और बसिष्ठ ।१४-१६३। स्वायम्भुव मन्वन्तर में अग्नी प्र, अतिबाहु, मेघा, मेधातिथि, वसु, ज्योतिष्मान्, द्यतिमान, हव्य और सवन आदि ये महाबल शाली दस पुत्र स्वायम्भु मनु के थे वायु ने कहा है कि, प्रथम मन्वन्तर में ये ही मह.बलशाली राजा थे !१७-१५६३। असुर, गन्धवे, यज्ञ, उरग, राक्षस, पिशाच और मनुष्यों के साथ सुपर्ण

English

The gold called Jambunada which Devas wear as ornaments is found there. It appears as splendid as the glow¬ worm.

अध्याय ४६

श्लोक 25

अन्धक उवाच: नाहं वै कामये कोशं न गजांश्च सुरेश्वर ।स्वकीयं दर्शयस्वाद्य स्वर्गशृङ्गारभूषितम्

andhaka uvāca: nāhaṃ vai kāmaye kośaṃ na gajāṃśca sureśvara / svakīyaṃ darśayasvādya svargaśṛṅgārabhūṣitam

हिन्दी अर्थ

या बे ब्रजकुलास्पास्तु आसन्स्वायंभुवेउन्तरे । कालेन बहुनाइतोता अयनाब्दयुगक्त नेः (३२१

English

The splendid juice of the fruits of all Varsa -trees (Jariibu) strengthens the people (of the continent). It is the gold that is used for ornaments of Devas.

अध्याय ४६

श्लोक 26

ऐरावतं महानागं तं चैवोच्चैःश्रवोहयम् ।उर्वश्यादीनि रत्नानि मम दर्शय गोपते

airāvataṃ mahānāgaṃ taṃ caivoccaiḥśravohayam / urvaśyādīni ratnāni mama darśaya gopate

हिन्दी अर्थ

क एव भगवान्कालः सर्वभुतापहारकः । कस्य योनिः किमादिश्व कि तत्त्वं स क्रिमात्मज: किमस्य चल्लुः का सूर्तिः के चास्यावयवा: स्मपृुता: । किनामधेयः को5स्यात्मा एतत्प्रत्रहि पृ-छताम् ॥

English

Their excretions (faeces and urine) are scattered all round. Thanks to the blessings of the Lord, the earth absorbs the refuge and the dead bodies.

अध्याय ४६

श्लोक 27

पारिजातकपुष्पाणि वृक्षजातीननेकशः ।वादित्राणि च सर्वाणि दर्शयस्व शचीपते

pārijātakapuṣpāṇi vṛkṣajātīnanekaśaḥ / vāditrāṇi ca sarvāṇi darśayasva śacīpate

हिन्दी अर्थ

श्रयतां कालस:्भाव: श्रुट्वा चेवावधायंताम् । सूर्ययोनिरनिभेषादिः संख्याचक्षु: स उच्यते ३२४ मृतिरस्य त्वहोरात्रे निमिषावयवश्च सः। संवत्सरशतं त्वस्थ नाम चास्य कलात्मकस् ॥

English

The Raksasas, Pisacas and Yaksas reside on Himavat. The Gandharvas and Apsaras-s live on mountain Hemakuta.

अध्याय ४६

श्लोक 28

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शक्रश् चिन्तितवान् इदम् ।यो ऽमुं निहन्ति पाप्मानं न तं पश्यामि कर्हिचित्

tasya tadvacanaṃ śrutvā śakraś cintitavān idam / yo 'muṃ nihanti pāpmānaṃ na taṃ paśyāmi karhicit

हिन्दी अर्थ

सांप्रतानागतातीतकालात्मा स प्रजापति: २५ पच्आानां प्रविभक्तानां कालावस्थां निबोधत । दिनाधंमासमासस्तु ऋतुभिस्त्वयनेस्तथा २६ व॒त्सरः पत्चमस्तेषां कालः स युगसंज्ञित: तेषां तु तत्त्वं वक्ष्यामि कीत्यंसानं निबोधत

English

The Nagas including Sesa, Vasuki and Taksaka live on Nisadha. The thirtythree groups of Devas, the Yajnikas, wander over the great Meru. On the Nila, full of lapis lazuli, Siddhas and Brahmarsis live.

अध्याय ४६

श्लोक 29

नास्ति रक्षाप्रदः कश्चित्स्वर्गलोकस्य दुःखिनः ।भयत्रस्तो ददावन्यद्वादित्राद्यप्सरोगणैः

nāsti rakṣāpradaḥ kaścitsvargalokasya duḥkhinaḥ / bhayatrasto dadāvanyadvāditrādyapsarogaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

तथा अप्सराओं का जो गण था, उसका अनुक्रम से कहा जाता सौ वर्षों में भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उन राजकुलीनों के नामों की संख्या बहुत अधिक थी। स्वायम्भुव मन्वस्तर में जो ब्रजकुलनामक प्रजाजन थे, वे अयन, वर्ष और युगक्रम से बहुत दिन व्यतीत हो चुके हैं ।१ ६-२१।

English

The mountain Sveta is the abode of. Daityas and Danavas. The mountain Srngavan is the place which the Pitrs

अध्याय ४६

श्लोक 30

रङ्गभूमावुपाविश्य कारयामास ताण्डवम् ।उपविष्टाः सुराः सर्वे यममारुतकिन्नराः

raṅgabhūmāvupāviśya kārayāmāsa tāṇḍavam / upaviṣṭāḥ surāḥ sarve yamamārutakinnarāḥ

हिन्दी अर्थ

ऋषिगण बोले--सब जीवों का हरण करने वाले ये भगवान् काल कौन है? किसके पृत्र और किसके पिता हैं ? तत्व, स्वरूप, चक्षु, मूति, अवयव आदि इनके कौन से हैं? इनका क्या नाम है ? कौन इनकी आत्मा है? इन प्रश्नों को हम पूछ रहे हैं, कहिये २२-२३। सुतजी बीले--आप लोग काल के सम्बन्ध में विशेष ध्यान पूर्वक सुनिये और सुनकर हृदय में रखिये इनके ( काल के ) उत्पन्न करने वाले सूर्य हैं, इनका आदि निमेष है और ये संख्या-चक्ष कहलाते हैं । दिन-रात इनकी मूर्ति हैं, निमेष अवयव हैं और कलास्व॒रूप संबत्सरशत इनका नाम है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालस्वरूप वे प्रजापति हैं ।२४-२५। दिन, पक्ष, मास, ऋतु और अयन नामक पाँच भागों

English

Thus the mobile and immboile beings have settled m

अध्याय ४६

श्लोक 31

उर्वश्याद्या अप्सरसो गीतवादित्रयोगतः ।ननृतुः पुरतस्तस्य सर्वा एकैकशो नृप

urvaśyādyā apsaraso gītavāditrayogataḥ / nanṛtuḥ puratastasya sarvā ekaikaśo nṛpa

हिन्दी अर्थ

में विभक्त काल के अवस्था-भेद को सुनिये । पहला संवत्सर, द्वितीय परिवत्सर, तृतीय इद्वत्सर, चतुर्थ अनुवत्सर और पंचम युग नामक वत्सर कहलाता है। इनके तत्त्व को मैं कहता हूँ सुनिये ।२६-२८। ऋतु नामक जिस

English

The population of Devas and human Beings is too enormous to be enumerated. It should be accepted with faith by those who wish to know it (by experience).

अध्याय ४६

श्लोक 32

न व्यश्राम्यत तच्चित्तं दृष्ट्वा चाप्सरसस्तदा ।शचीं प्रति मनस्तस्य सकाममभवन्नृप

na vyaśrāmyata taccittaṃ dṛṣṭvā cāpsarasastadā / śacīṃ prati manastasya sakāmamabhavannṛpa

हिन्दी अर्थ

ऋतुरग्निस्तु यः प्रोक्तः स तु संवत्सरों मतः । आदित्येयर्त्वसों सार: कालाग्निः परिवत्सरः शुक्लकृष्णा गतिभ्रापि अपां सारसयः खगः । स इदावत्सरः सोमः पुराण निश्चयों मतः

English

The population of Devas and human Beings is too enormous to be enumerated. It should be accepted with faith by those who wish to know it (by experience).

अध्याय ४६

श्लोक 33

गृहीत्वा शक्रभार्यां स प्रस्थितः स्वपुरं प्रति ।ततः प्रववृते युद्धमन्धकस्य सुरैः सह

gṛhītvā śakrabhāryāṃ sa prasthitaḥ svapuraṃ prati / tataḥ pravavṛte yuddhamandhakasya suraiḥ saha

हिन्दी अर्थ

यश्यायं तपते लोकांस्तनुभिः सप्तसप्तभिः । आशु कर्ता च लोकस्य स वायुरिति बत्सरः ३ १ अहंकारादुदत्रुद्र: सद्भुतो ब्रह्मणस्त्रयः स रुद्रो वत्सरस्तेषां विजज्ञे नोललोहितः ॥

English

The population of Devas and human Beings is too enormous to be enumerated. It should be accepted with faith by those who wish to know it (by experience).

अध्याय ४६

श्लोक 34

तेन देवगणाः सर्वे ध्वस्ताः पार्थिवसत्तम ।संग्रामे विविधैः शस्त्रैश् चक्रवज्रादिभिर्घनैः

tena devagaṇāḥ sarve dhvastāḥ pārthivasattama / saṃgrāme vividhaiḥ śastraiś cakravajrādibhirghanaiḥ

हिन्दी अर्थ

तेषां हि तत्त्वं वक्ष्यामि कीत्यंमानं निबोधत ३२ अद्भअत्य ड्राप्तंपोगात्कालात्मप्रपितामहः । ऋक्‍सामसयजुषां योनिः पचानां पतिरीश्वरः ३३ पस्मात्कालविभागानां मासत्वेयनयोरपि ग्रहनक्षत्रशीतोष्णवर्षायुःकर्मणां तथा ॥

English

The population of Devas and human Beings is too enormous to be enumerated. It should be accepted with faith by those who wish to know it (by experience).

अध्याय ४६

श्लोक 35

संतापिताः सुराः सर्वे क्षयं नीता ह्यनेकशः ।सर्वे ऽपि मरुतस्तेन भग्नाः संग्राममूर्धनि

saṃtāpitāḥ surāḥ sarve kṣayaṃ nītā hyanekaśaḥ / sarve 'pi marutastena bhagnāḥ saṃgrāmamūrdhani

हिन्दी अर्थ

योजित:ः प्रविभागानां दिवसानां च भास्करः द

English

The population of Devas and human Beings is too enormous to be enumerated. It should be accepted with faith by those who wish to know it (by experience).

अध्याय ४६

श्लोक 36

यथा सिंहोगजान् सर्वान् विचित्य विचरेद् वनम् ।तद्वद् एकेन ते देवा जिताः सर्वे पराङ्मुखाः

yathā siṃhogajān sarvān vicitya vicared vanam / tadvad ekena te devā jitāḥ sarve parāṅmukhāḥ

हिन्दी अर्थ

बैकारिकः प्रसन्नात्मा अह्यपृत्र: प्रजापति: एकेनेफो5थ दिवसो मासो5्थतुं: पितामहः आदित्य: सविता भानुजविनो ब्रह्मसत्कृत: । प्रभवश्राव्ययश्चेव भूतानां तेन भास्कर:

English

The population of Devas and human Beings is too enormous to be enumerated. It should be accepted with faith by those who wish to know it (by experience).

अध्याय ४६

श्लोक 37

बालो ऽधिपो यथा ग्रामे स्वेच्छया पीडयेज्जनान् ।स्वैरमाक्रम्य गृह्णाति कोशवासांसि चासकृत्

bālo 'dhipo yathā grāme svecchayā pīḍayejjanān / svairamākramya gṛhṇāti kośavāsāṃsi cāsakṛt

हिन्दी अर्थ

अग्नि को मैंने पहले कहा है, वही संवत्सर है और यह परिवत्सर काल-अग्नि स्वरूप है जो सूय से उत्पन्न तत्त्व है। पुराण में यह निशवथ किया गया है कि, इद्वत्सर सोम है जो आकाश में चलने वाला, जलों का सार भूत और सतत शुक्ल-करष्ण गति वाला है । जो उनचापत शरीरों से लोफ़ों को संतप्त करते हैं और अनृप्राणित करते हैं वही वायु वत्सर हैं। अहंकारवश रोदन करने वाले रुद्र ब्रह्म द्वारा तीन भागों में विभक्त हुए, बही

English

The population of Devas and human Beings is too enormous to be enumerated. It should be accepted with faith by those who wish to know it (by experience).

अध्याय ४६

श्लोक 38

गतं न पश्यत्य् आत्मानं प्रजासंतापनेन च ।गृहीत्वा शक्रभार्यां स गतो वै दानवोत्तमः

gataṃ na paśyaty ātmānaṃ prajāsaṃtāpanena ca / gṛhītvā śakrabhāryāṃ sa gato vai dānavottamaḥ

हिन्दी अर्थ

नीललोहित रुद्र रुद्रों के वत्सर कहे गये हैं। उनके तत्त्व को भी मैं कहता हूं सुनिये ।२९-३२। कालात्मा प्रपितामह अज्भ प्रत्यदड्र के संघोग से ऋक, साम और यजुः के उत्पत्ति-स्थान एवं पाँचों कालों के स्वामी हैं । वे ही अग्ति यजु:, सोम, भूत और प्रजापति हैं। विद्वानों ने सूर्य को ही अग्नि और संवत्सर कहा है । इन्हीं सूर्य से कालों का विभाग अर्थात् मास, ऋतु, अयन, ग्रह, नक्षत्र शीत, ग्रीष्म, वर्षा, आयु, कर्म तथा दिवसों का विभाग होता है ।३३-३५। विकारावस्था में ये ही प्रसन्नात्मा ब्रह्मपुत्र प्रजापति एक-एक कर दिवस, मास और ऋतु के प्रवर्तक हैं और ये ही पितामह हैं । ये ही आदित्य, सविता, भानु, जीवन और ब्रह्मसत्क्षत कहे जाते हैं, भूतों के उत्पादक और अविताशी होने के कारण ये भास्कर हैँ ।३६-२७। तृतीय परिवत्सर ताराभि- मानी है, जो सोम और निखिल ओषधियों का पति है, इसलिये यह भी प्रपितामह है। ये सभी जीवों के जीवन

English

The population of Devas and human Beings is too enormous to be enumerated. It should be accepted with faith by those who wish to know it (by experience).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 46
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.