Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
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अध्याय 72 / 232

Adhyaya 72

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अध्याय ७२

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कामेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकसप्ततितमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ७२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र मणिनागेश्वरं शुभम् ।उत्तरे नर्मदाकूले सर्वपापक्षयंकरम् ।स्थापितं मणिनागेन लोकानां हितकाम्यया

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe kāmeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikasaptatitamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 72 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra maṇināgeśvaraṃ śubham / uttare narmadākūle sarvapāpakṣayaṃkaram / sthāpitaṃ maṇināgena lokānāṃ hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

पतन्द्रह दिन पिये गये चन्द्र को मुयं एक सुषुम्न किरण द्वारा दिवसक्रम से प्रतिदिन एक-एक भाग करके पूर्ण

English

Then I became delighted with Brahma, the great and noble Atman. After that I spoke to him in subtle words.

अध्याय ७२

श्लोक 2

युधिष्ठिर उवाच: आशीविषेण सर्पेण ईश्वरस्तोषितः कथम् ।क्षुद्राः सर्वस्य लोकस्य भयदा विषशालिनः

yudhiṣṭhira uvāca: āśīviṣeṇa sarpeṇa īśvarastoṣitaḥ katham / kṣudrāḥ sarvasya lokasya bhayadā viṣaśālinaḥ

हिन्दी अर्थ

पिबन्त्यस्बुमयं देवा मधु सौम्यं सुधासयम् संभृतं चार्धभासेन असृतं सर्यतेजसा । भक्षार्थमम्ृतं सोम्यं पोर्णमास्यामुपासते

English

"Olord, lord of past and future, lord of the worlds, lord of the Universe, O Brahma of good rites, what shall I do for you?"

अध्याय ७२

श्लोक 3

कथ्यतां तात मे सर्वं पातकस्योपशान्तिदम् ।मम सन्तापजं दुःखं दुर्योधनसमुद्भवम्

kathyatāṃ tāta me sarvaṃ pātakasyopaśāntidam / mama santāpajaṃ duḥkhaṃ duryodhanasamudbhavam

हिन्दी अर्थ

एकराद्र सुरेः सर्वे: पितुभिश्य महषिभिः सोमस्य छृष्णपक्षादों भास्कराभिसुखस्यथ च ॥

English

Purarias try to synthesize Vaisnavism and Saivism by identifying Siva with Vi|nu.

अध्याय ७२

श्लोक 4

कर्णभीष्मोद्भवं रौद्रं दुःखं पाञ्चालिसम्भवम् ।तव वक्त्राम्बुजौघेन प्लावितं निर्वृतिं गतः

karṇabhīṣmodbhavaṃ raudraṃ duḥkhaṃ pāñcālisambhavam / tava vaktrāmbujaughena plāvitaṃ nirvṛtiṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

(+त्रयभ्र त्रिशतं चेव श्रयस्रिशसयेव च । श्रयरलिशत्सहस्राश्व देवा: सोम पिबन्ति व पितरश्रोपतिष्ठन्ति अमाबास्थां निशाकरम्ू. ६४५

English

On hearing my words, the lotus-eyed Brahma replied: «q Is vara, O lord of the past, present and future, may this be listened.

अध्याय ७२

श्लोक 5

श्रुत्वा तव मुखोद्गीतां कथां वै पापनाशिनीम् ।अयुक्तमिदमस्माकं द्विज क्लेशो न शाम्यति

śrutvā tava mukhodgītāṃ kathāṃ vai pāpanāśinīm / ayuktamidamasmākaṃ dvija kleśo na śāmyati

हिन्दी अर्थ

करते हैं। तब सुषुम्त किरण द्वारा परिपूर्ण चन्द्रमा की कला उज्ज्वलतर हो जाती है। अतः क्ृष्णपक्ष में चन्द्र का हास होता है और शुक्ल पक्ष में वे परिपूर्ण होते हैं । इस प्रकार सूर्य के सामथ्यें से चन्द्रमा का शरीर घटता-बढ़ता है । शुक्लपक्ष में दिन क्रम से चन्द्रदेव परिपुष्ट हो जाते हैं और वे पूणिमा को उज्ज्वल परिपूर्ण मण्डल से प्रकाशित होने लगते हैं ।(६-५६। फिर क्रृष्णपक्ष की द्वितीया से लेकर चतुदंशी पर्यक्त देवगण जल

English

O lotus-eyed lord, when the ocean was being churned by Devas and Asuras, the terrible poison, resembling a cloud, shining like a blue cloud, having the lustre of the Samvarta fire, refulgent like the sun at the end of the Yugas, appeared in front like the Black Death.

अध्याय ७२

श्लोक 6

अथवा प्राप्स्यते तात विद्यादानस्य यत्फलम् ।तत्फलं प्राप्यते नित्यं कथाश्रवणतो हरेः

athavā prāpsyate tāta vidyādānasya yatphalam / tatphalaṃ prāpyate nityaṃ kathāśravaṇato hareḥ

हिन्दी अर्थ

के सार स्वरूप और रसमय चन्द्र के जल प्रधान और सुधामय सुन्दर मधु का पान करते हैं वह अमृत सूर्य के तेज से आधे मास में संचित होकर पूर्णमासी में देवों के भोजन के लिये कल्पित होता है। कृष्णपक्ष के आदि में एक रात देवता, पितर और मह॒षिगण भास्कराभिमुखवर्ती चन्द्र का पान करते हैं। पीने पर उनकी कला फिर धीरे-धीरे क्षीण होने लगती हैं।६०-६२। तेंतीस हजार तैतीस सौ तीन देवता चन्द्र के मधु का पान करते हैं। इसके द्वारा पी जाने पर चन्द्रमा की क्ृष्णपक्ष की कला फिर बढ़ने लगती है। इसीलिये कृष्णपक्ष में इनकी कला क्षीण होती है और शुक्ल पक्ष में बढ़ने लगती है। इसी प्रकार देवगण प्रतिदिनक्रम से आधे मास तक चन्द्रमा को पीकर अमावास्या को प्रस्थान करते हैं। पुनः अमावास्था आते ही पितर लोग चन्द्रमा के निकट आ जाते हैं ।६३-६५। चम्द्रमा की पन्द्रहवीं कला का जो अवशेष रह जाता है, उसे पितर

English

It has the brilliance of the sun capable of destroying the three worlds. It sparkles all round. The poison having the lustre of deadly fire has risen in front.

अध्याय ७२

श्लोक 7

श्रीमार्कण्डेय उवाच: यथायथा त्वं नृप भाषसे च तथातथा मे सुखमेति भारती ।शैथिल्यता वा जरयान्वितस्य त्वत्सौहृदं नश्यति नैव तात ।शृणुष्व तस्मात्सह बान्धवैश्च कथामिमां पापहरां प्रशस्ताम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca: yathāyathā tvaṃ nṛpa bhāṣase ca tathātathā me sukhameti bhāratī / śaithilyatā vā jarayānvitasya tvatsauhṛdaṃ naśyati naiva tāta / śṛṇuṣva tasmātsaha bāndhavaiśca kathāmimāṃ pāpaharāṃ praśastām

हिन्दी अर्थ

धनुश्चिह्नान्तगंतग्रन्थः क, ग. पुस्तकेयोर्नास्ति ।-+: एतदरधस्थान इदमर्ध बतेते -- क्षीयन्ति तस्माच्छक्ला

English

On seeing it we are much frightened and agitated. O Mahadeva, desiring the welfare of the worlds, you will please drink it. O Sir, you are the enjoyer of the most splendid, you are the excellent lord.

अध्याय ७२

श्लोक 8

कथयामि यथावृत्तमितिहासं पुरातनम्

kathayāmi yathāvṛttamitihāsaṃ purātanam

हिन्दी अर्थ

ततः पतच्दशे भागे किचिच्छिष्टे कलात्मके । अपराह्हल पितृगणेजंघन्यः पर्युपास्यते पिबन्ति द्विकल काले शिष्टा तस्य तु या कला। निःसृतं तदसावास्यां गेभस्तिभ्यः स्वधामृतम् ॥

English

O Mahadeva, excepting you, there is no one to en¬ dure the poison. No other person is sung about (= glorified) as capable of it, in the three worlds".

अध्याय ७२

श्लोक 9

कथितं पूर्वतो वृत्तैः पारम्पर्येण भारत

kathitaṃ pūrvato vṛttaiḥ pāramparyeṇa bhārata

हिन्दी अर्थ

एवं सुयंनिमित्तषां क्षयवृद्धिनिशाकरे । ताराग्रहाणां वक्ष्यासि स्वर्भानोश्व रथं पुनः

English

On hearing these words of Brahma, O splendid¬ faced lady, I concurred and said "So be it". Then I began to drink the poison that resembled death. As I drank the terrible poison frightening even the gods, O lady of excellent comple¬ xion, my throat immediately turned black.

अध्याय ७२

श्लोक 10

द्वे भार्ये कश्यपस्यास्तां सर्वलोकेष्वनुत्तमे ।गरुत्मन्तं च विनतासूत कद्रूर् अहीनथ

dve bhārye kaśyapasyāstāṃ sarvalokeṣvanuttame / garutmantaṃ ca vinatāsūta kadrūr ahīnatha

हिन्दी अर्थ

तोयतेजोमयः शुश्रः सोमपुत्रस्य वे रथः । युक्तो हयेः पिशडगैस्तु अष्टाभि्वातरंहसे:ः सवरूथः सानुकर्ष: सुतो दिव्यों रथे महान् । सोपासडःगपताकस्तु सध्यजो मेघसंनिभः १७४

English

On seeing the poison that had the lustre of the petal of blue lotus and that had appeared like the king of Serpents, Taksaka, clinging to my throat and putting out its tongues, Brahma, the grandfather of the worlds, possessor of excessive splendour, spoke: "O Mahadeva, of good rites, really you shine due to this throat".

अध्याय ७२

श्लोक 11

संतोषेण च ते तात तिष्ठतः काश्यपे गृहे ।कद्रूश्च विनता नाम हृष्टे च वनिते सदा

saṃtoṣeṇa ca te tāta tiṣṭhataḥ kāśyape gṛhe / kadrūśca vinatā nāma hṛṣṭe ca vanite sadā

हिन्दी अर्थ

लोग मध्याह्न काल में पीते हैं। उस अवशिष्ट कला से जो स्वधा रूपी अमृत क्षरित होता है, उसको द्विकलात्मक कालमात्र में पान कर पितर लोग एक महोने तक तृप्त रहते हैं ।६६५। सोम्प, बहिषद्, अग्निष्वात्त और कब्य पितर ही हैं । विद्वानों ने जिसे पंचाब्द संवत्सर कहा है, वही कव्य है। ऋतु सोम्य, मास बहिषद और ऋतु अग्निष्वात्त हैं ब्राह्मणो ! पितृसर्ग यानी पितरों की व्यापार-वार्ता इसी प्रकार की है। अमावास्या में पितरों

English

O daughter of the king of mountains, on seeing the Kalakuta, that poison of fierce potency, being retained by me in the throat, Devas and Daityas were wonder-struck.

अध्याय ७२

श्लोक 12

ताभ्यां सार्द्धं क्रीडते च कश्यपो ऽपि प्रजापतिः ।ततस्त्वेकदिने प्राप्ते आश्रमस्था शुभानना

tābhyāṃ sārddhaṃ krīḍate ca kaśyapo 'pi prajāpatiḥ / tatastvekadine prāpte āśramasthā śubhānanā

हिन्दी अर्थ

द्वारा षीत चन्द्र की पन्द्रहवीं कला के परिपुण भाग का जब तक क्षय होता है, तब तक उनका अन्तिम भाग पूर्ण हो जाता है। अर्थात् सोलहवीं कला का नाश नहीं है पक्षादि में चन्द्रमा का वृद्धि क्षय इसी प्रकार होता रहता है चन्द्रमा की जो यह क्षय-वुद्धि होती है, उसका भुख्य कारण सूर्य ही है ।६७-७०३। अब हम तारकादि ग्रहों और राहु के रथ के सम्बन्ध में कहते हैं। बुध का रथ शुश्रवर्ण और जलीय तेज से युक्त अर्थात् उसमें जल का तेज वर्तमान है। वायु की तरह बेगवान् पिशंग वर्ण के आठ घोड़े उसमें जुते हुये हैं। वह रथ मैध की तरह है, जिस पर ध्वजा-पताका फहरा रही हैं, तरकस रखे हुये हैं। उस दिव्य रथ के नीचे काठ लगा हुआ है और ऊपर से फौलादी चादर कढ़ी हुई है । उस रथ का सारथी भी दिव्य है। शुक्र का रथ तेज में सूर्य की तरह और शोभा सम्पन्न है। इसमें पृथ्वी से उत्पन्न नाना वर्ण के मोदे-मोटे वायु की तरह वेगशाली दस घोड़े

English

Then, O fair lady with the gait of inebriated elephant,

अध्याय ७२

श्लोक 13

उच्चैःश्रवं हयं दृष्ट्वा मनोवेगसमन्वितम् ।पश्य पश्य हि तन्वङ्गी हयं सर्वत्र पाण्डुरम्

uccaiḥśravaṃ hayaṃ dṛṣṭvā manovegasamanvitam / paśya paśya hi tanvaṅgī hayaṃ sarvatra pāṇḍuram

हिन्दी अर्थ

जुते हुये हैं। ये घोड़ों में श्रेष्ठ महाभाग अइ्ब श्वेत, पिशज्भ, सारंग, नील, लोहित, पीत, कृष्ण, हरित, पृषत

English

"Wonderful is your strength, prowess and valour. Oh, wonderful is the strength of your Yoga. O lord of Devas', wondeiful is your lordship, O lord, whose dishevelled hair is flooded with Ganga water.

अध्याय ७२

श्लोक 14

धावमानमविश्रान्तं जवेन मनसोपमम् ।तं दृष्ट्वा सहसा चाश्वमीर्ष्याभावेन चाब्रवीत्

dhāvamānamaviśrāntaṃ javena manasopamam / taṃ dṛṣṭvā sahasā cāśvamīrṣyābhāvena cābravīt

हिन्दी अर्थ

अष्टाश्वः काउचनः श्रीमान्सो मस्यापि रथो5भवत् । असइगेलों हितेरश्वे: सर्वंगेरग्निसंभवे: ॥ तवस्त्वाडिगरसो विद्वान्देवाचार्यो ब्रहस्पति: । शोण रश्व:ः काञचनेन स्यन्दनेन प्रसपंति ७८

English

You alone are Visnu, the., four-faced Brahma and Yama, the god of death; you alone are the bestower of boons; you alone are the sun, the moon, the earth and the water.

अध्याय ७२

श्लोक 15

कद्रूर् उवाच: ब्रूहि भद्रे सहस्रांशोर् अश्वः किंवर्णको भवेत् ।अहं ब्रवीमि कृष्णो ऽयं त्वं किं वदसि तद्वद

kadrūr uvāca: brūhi bhadre sahasrāṃśor aśvaḥ kiṃvarṇako bhavet / ahaṃ bravīmi kṛṣṇo 'yaṃ tvaṃ kiṃ vadasi tadvada

हिन्दी अर्थ

तत: श्नेश्ररोध्प्यश्वः शवलेव्योमिसंभवे: । कार्ष्णायसं समारह्म स्पन्दनं याति वे शनेः

English

You alone are sacrifice, the rites and observances; you alone are the past and future. You alone are the origin and end; you alone are both gross and subtle Purusa.

अध्याय ७२

श्लोक 16

विनतोवाच: पश्यसे ननु नेत्रैश्च कृष्णं श्वेतं न पश्यसि ।असत्यभाषणाद्भद्रे यमलोकं गमिष्यसि

vinatovāca: paśyase nanu netraiśca kṛṣṇaṃ śvetaṃ na paśyasi / asatyabhāṣaṇādbhadre yamalokaṃ gamiṣyasi

हिन्दी अर्थ

स्वर्भानोस्तु तथवाश्वा: कृष्णा ह्ाष्टो मनोजवाः रथं तमोमयं तस्य सक्षद्यक्ता वहन्त्युत अथ केतुरथस्याश्वरा अष्टाष्टो बातरंहुस:। पलालध्मसंकाशा: शबला रासभारुणाः णरे एते वाह! ग्रहाणां वे मया प्रोक्ता रथः सह । सबवे श्रुवनिबद्धास्ते प्रबद्धा वातरश्मिभिः...

English

You alone are the subtlest of the subtle; you alone are the fire and the wind; you alone are the creator, protector and annihilator of the world, both mobile and immobile.*'

अध्याय ७२

श्लोक 17

सत्यानृते तु वचने पणस्तव ममैव तु ।सहस्रं चैव वर्षाणां दास्यहं तव मन्दिरे

satyānṛte tu vacane paṇastava mamaiva tu / sahasraṃ caiva varṣāṇāṃ dāsyahaṃ tava mandire

हिन्दी अर्थ

और पृश्टिन रंग के हैं मंगल का रथ सोने का है, जिसमें आठ घोड़े जुते हुये हैँ। यह रथ अत्यन्त शोभा सम्पन्न है। इनके लोहित वर्ण के बेजोड़ घोड़े अग्नि से उत्पन्न हुये हैं और सबवंत्र गमन करने वाले हैं ।७१-७६। मंगल इन्हीं पर आरोहण कर सीधी और टेढ़ी गति से राशिचक्र का भ्रमण करते हैं। अंगिरातनय देवाचारय विद्वानू बृहस्पति सोने के रथ पर घूमा करते हैं। इनके दिव्य घोड़े लाल रंग के हैं और रथ सर्वत्र गमन करने वाला है,

English

After saying these words and bowing their heads, the leading Devas, the noble souls, went to Meru in their aerial chariots.

अध्याय ७२

श्लोक 18

असत्या यदि मे वाणी कृष्ण उच्चैःश्रवा यदि ।तदाहं त्वद्गृहे दासी भवामि सर्पमातृके

asatyā yadi me vāṇī kṛṣṇa uccaiḥśravā yadi / tadāhaṃ tvadgṛhe dāsī bhavāmi sarpamātṛke

हिन्दी अर्थ

जिसमें वायु की तरह वेगशाली आठ घोड़े जुते हुये हैं। ये एक राशि पर एक वर्ष निवास करते हैं शर्नरचर का रथ काले लोहे का बना है। इनके चितकबरे घोड़े आकाश से उत्पन्न हुये हैं। वे अपने रथ पर चढ़कर धीरे-धीरे चला करते हैं। राहु के तमोमय क्रंष्णवर्ण के रथ में मन की तरह वेगशाली काले रंग के आठ घोड़े एक ही बार जोत दिये गये हैं। ये रथ को सदा खींचा करते हैं। राहु पव॑ के दिन सूर्यमंडल से निकल कर चन्द्र मण्डल में प्रवेश करते हैं और फिर पर में ही चन्द्रमण्डल से निकलकर सूयेमण्डल में प्रवेश

English

Thus the greatest of secrets, the holiest of holy things, the story of what is famous as Nilakantha has been narrated to you.

अध्याय ७२

श्लोक 19

यदि उच्चैःश्रवाः श्वेतो ऽहं दासी च तवैव तु ।एवं परस्परं द्वाभ्यां संवादो ऽयं व्यवर्धत

yadi uccaiḥśravāḥ śveto 'haṃ dāsī ca tavaiva tu / evaṃ parasparaṃ dvābhyāṃ saṃvādo 'yaṃ vyavardhata

हिन्दी अर्थ

किया करते हैं। केतु के रथ के घोड़े बायु की तरह वेगशाली, गधे को तरह धूसर वर्ण, चितकबरे और धान के भूसे के धुएं को तरह हैं। ये गिनती में चौंसठ हैं। यह हमने ग्रहों के घोड़ों और रथों का वर्णन किया । ये सभी वायु किरणों द्वारा ध्रूव से संलग्न हैं ।७६-८३॥ अदृश्य वायुकिरणों द्वारा ये रथ-घोड़े या ग्रहगण घुमाये जाते हैं और यथावकाश भ्रमण करते हैं। वायुक्रिरणों द्वारा भाबद्ध चन्द्र सूर्यादि ग्रहगण आकाश्ष में घूमते है

English

This story has been narrated by the self-born deity. It is the sacred story that quells sins. I shall now mention the fruit ' accruing to that person who retains this story recounted by Brahma.

अध्याय ७२

श्लोक 20

आश्रमेषु गता बाला रात्रौ चिन्तापरा स्थिता ।बन्धुवर्गस्य कथितं समस्तं तद्विचेष्टितम्

āśrameṣu gatā bālā rātrau cintāparā sthitā / bandhuvargasya kathitaṃ samastaṃ tadviceṣṭitam

हिन्दी अर्थ

और घूमते हुये. ध्रूव का अनुगसन करते हैं। नदी-जल में जैसे नौका जल पर स्थित रहती है, उसी श्रकार ये देवालय वायुकिरणों के आधार पर रुके रहते हैं। इसी कारण आकाश में देवगण का दर्शन सभी कर सकते हैं ॥ यथा नद्य॒दके नौस्तु सलिलेन सहोह्यते । तथा देवालया होते उह्ान्ते वातरश्मिभिः ॥

English

O fair lady of good loins, on reaching his body, poison from mobile and immobile things becomes ineffective immediately.

अध्याय ७२

श्लोक 21

पुत्राणां कथितं पार्थ पणं चैव मया कृतम् ।हाहाकारः कृतः सर्पैः श्रुत्वा मात्रा पणं कृतम्

putrāṇāṃ kathitaṃ pārtha paṇaṃ caiva mayā kṛtam / hāhākāraḥ kṛtaḥ sarpaiḥ śrutvā mātrā paṇaṃ kṛtam

हिन्दी अर्थ

तस्मात्सवेंण दृश्यन्ते व्योम्नि देवगणास्तु ते ८७

English

It quells inauspiciousness and removes (the effect of) bad dreams. The person attains the love of women and leader¬ ship in royal assembly.

अध्याय ७२

श्लोक 22

जाता दासी न सन्देहः श्वेतो भास्करवाहनः ।उच्चैःश्रवा हयः श्वेतो न कृष्णो विद्यते क्वचित्

jātā dāsī na sandehaḥ śveto bhāskaravāhanaḥ / uccaiḥśravā hayaḥ śveto na kṛṣṇo vidyate kvacit

हिन्दी अर्थ

तेलपीडाकरं चक्र अ्रमदत्रामयते यथा। तथा म्रमन्ति ज्योतोंषि वातबद्धानि सर्वशः ८६ अलातचक्वद्यान्ति वातचक़ेरितानि तु। यस्माज्ज्योतींषि वहते प्रवहुस्तेन स स्मृतः १९० एवंश्रुवनिबद्धोइसोौ सपंते ज्योतिषां गण: । सेष तारामयो ज्ञेयः शिशुमारो ध्रुवो दिवि ॥ द यदद्वा कुरुते पाप॑ दृष्ट्वा तं निशि मुच्यते द ॥€ १ यावत्यश्वेव तारास्ता: शिशुमाराश्चिता दिवि । तावन्त्येव तु वर्षाणि जीवन्त्यभ्यधिकानि तु ॥€२ शाश्वत: शिशुमारोइसौ विज्ञेयः प्रविभागश: । उत्तानपादस्तस्याथ विज्ञेयों हाय त्तरो हनुः ॥६€ रे यज्ञो5धरस्तु विज्ञेयों धर्मों मूर्धानमाश्रितः। हृदि नारायणः साध्य(ध्या) अश्विनों पूर्वपादयों: हेड द

English

In disputes he becomes victorious; in battle he attains valour; on expedition he attains welfare; he has perpetual riches in his house.

अध्याय ७२

श्लोक 23

कद्रूर् उवाच: यथाहं न भवे दासी तत्कार्यं च विचिन्त्यताम् ।विशध्वं रोमकूपेषु ह्युच्चैःश्रवहयस्य तु

kadrūr uvāca: yathāhaṃ na bhave dāsī tatkāryaṃ ca vicintyatām / viśadhvaṃ romakūpeṣu hyuccaiḥśravahayasya tu

हिन्दी अर्थ

पुच्छेडरिनश् महेन्द्रश्न मरीचि: कश्यपो श्रुवः तारकाः शिशुमारश्च नास्तमेति चतुष्टयमू

English

I shall tell his goal at the dissolution of his body, O excellent-faced lady. He becomes blue-throated, green-mous¬ tached and moon-crested; he attains three eyes; he holds the tri¬ dent in his hand, and has bull as his vehicle; he holds the Pinaka

अध्याय ७२

श्लोक 24

एकं मुहूर्तमात्रं तु यावत् कृष्णः स दृश्यते ।क्षणमात्रेण चैकेन दासी सा भवते मम

ekaṃ muhūrtamātraṃ tu yāvat kṛṣṇaḥ sa dṛśyate / kṣaṇamātreṇa caikena dāsī sā bhavate mama

हिन्दी अर्थ

नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहस्तारागणः सह । उन्मुखाभिसुखाः सर्वे चक्की भृताश्रिता दिवि ३६७ जितने तारे हैं, उतनी ही वायु की किरणें हैं। ये सभी ध्रूव से संलग्न हैं, स्वयं घूमते और श्र्ब को घुमाते हैं ।+४-८७। कोल्ह का चक्‍का जेंसे स्वयं घूमता हुआ दूसरे को घुमाता है उसी प्रकार वायु द्वारा आबद्ध ज्योति- मंण्डल सर्वत्र घूमता है। वायुचक्र द्वारा चालित होकर ज्योतिमंडल अलातचक्र की तरह घूमता है यतः वायुचक्र ज्योतिमंण्डल का वहन करता है, इसोसे वह प्रवहनु कहलाता है ।८८-८९। इस प्रकार प्र से मिलकर ज्योतिः

English

O beautiful lady, I shall now mention the goal both here and hereafter of those persons who are my devotees and who hear this story.

अध्याय ७२

श्लोक 25

दासीं कृत्वा तु तां तन्वीं विनतां सत्यगर्विताम् ।ततः स्वस्थानगाः सर्वे भविष्यथ यथासुखम्

dāsīṃ kṛtvā tu tāṃ tanvīṃ vinatāṃ satyagarvitām / tataḥ svasthānagāḥ sarve bhaviṣyatha yathāsukham

हिन्दी अर्थ

समूह चला करता है। वह तारामय ध्व शिकशुमार (ज्योतिर्मण्डल) की तरह आकाझ में प्रतिष्ठित है। रात में ध्रुव को देखने से दिनभर का किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है। आकाश में जितने तारे उस ज्योतिमंष्डल में हैं, उतने बरसों तक श्रूव को देखने वाला जीवित रहता है। यह शिशुमार सब काल में रहने वाला है, नित्य है। इस प्रकार विभाग द्वारा इसे जानना चाहिए ।६०-६१३। उत्तानपाद इसकी निचली ठंड्डी, यज्ञ, अधर,

English

ABrahmanasecures (attains mastery over) Vedas; a Ksattriya conquers the earth; a Vaifya derives profit; and a Sudra attains happiness.

अध्याय ७२

श्लोक 26

सर्पा ऊचुः ।यथा त्वं जननी चाम्ब सर्वेषां भुवि पूजिता ।तथा सापि विशेषेण वञ्चितव्या न मातरः

sarpā ūcuḥ / yathā tvaṃ jananī cāmba sarveṣāṃ bhuvi pūjitā / tathā sāpi viśeṣeṇa vañcitavyā na mātaraḥ

हिन्दी अर्थ

पूँछ अग्नि, महेन्द्र, मरीचि, कश्यप, तथा श्र्व हैं। इस संवत्सरात्मक शिशुमार का अस्तोदय नहीं होता है । ग्रहताराओं के साथ चद्ध-सूर्यादि नक्षत्र आकाश में नीचे या ऊपर मुंहकर मंडलाकार स्थित हैं ।९२०६६। ये सभी ध्र्व के द्वारा धारण किये गये हैं और सभी मेघधिस्तम्भ (दौँनी का ख्म्भा) स्वरूप श्रेष्ठ ध्रुव की ही प्रदक्षिणा करते हैं । प्रूव, अग्नि और करश्यपों में प्र्व ही श्रेष्ठ हैं। यही एक ध्रव ही मेरु पर्वत के मस्तक ज्योतिषां चक्रमेतद्धि सदा कर्षत्यवाइसुखः । मेरुमालोकयत्येष प्रयातीह प्रदक्षिणम्

English

A sick man is freed from ailments; a man in bondage attains release; a pregnant woman gets a son; and a virgin gets a good husband. Everyone regains everything he loses in this world as in the other.

अध्याय ७२

श्लोक 27

माता च पितृभार्या च मातृमाता पितामही ।कर्मणा मनसा वाचा हितं तासां समाचरेत्

mātā ca pitṛbhāryā ca mātṛmātā pitāmahī / karmaṇā manasā vācā hitaṃ tāsāṃ samācaret

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते श्षुवचर्या नाम द्विपचाशोडष्याय:

English

On hearing this divine story of the Lord, one obtains the same fruit as is obtained when one hundred thousand cows are duly gifted away.

अध्याय ७२

श्लोक 28

सा ततस्तेन वाक्येन क्रुद्धा कालानलोपमा ।मम वाक्यम् अकुर्वाणा ये केचिद्भुवि पन्नगाः

sā tatastena vākyena kruddhā kālānalopamā / mama vākyam akurvāṇā ye kecidbhuvi pannagāḥ

हिन्दी अर्थ

यदेतदुक्तं भवता गृहाण्येतानि विश्वुतम् । कथं देवगृहाणि स्युः कर्थ ज्योतीषि वर्णय पर अधोमुख होकर भेरु को देखते हुये भ्रमण करते हैं ओर साथ-ही-साथ सदा ज्योतिमंण्डल का भी आकर्षण

English

He who commits to memory one verse or half of it, one quarter of a verse or even half of it, attains Rudra's Loka.

अध्याय ७२

श्लोक 29

हव्यवाहमुखे सर्वे ते यास्यन्त्य् अविचारितम् ।मातुस्तद्वचनं श्रुत्वा सर्वे चैव भुजङ्गमाः

havyavāhamukhe sarve te yāsyanty avicāritam / mātustadvacanaṃ śrutvā sarve caiva bhujaṅgamāḥ

हिन्दी अर्थ

शांशपायन बोले--यहं सुनकर मुप्तियों ने संशय युक्त होकर फिर लोमहर्षण सूत से कहा

English

After recounting this story of pious fruits to the God¬ dess, the Lord with the moon embellishing his crest, the Lord be¬ loved of Guha, went along with Uma to the cave of Kiskindha seated on his bull.

अध्याय ७२

श्लोक 30

केचित्प्रविष्टा रोमेषु उच्चैःश्रवहयस्य च ।नष्टाः केचिद् दशदिशं कद्रूशापभयात् ततः

kecitpraviṣṭā romeṣu uccaiḥśravahayasya ca / naṣṭāḥ kecid daśadiśaṃ kadrūśāpabhayāt tataḥ

हिन्दी अर्थ

ऋष्िगण बोले--आपने जो देवों के विख्यात गृहों का वर्णन किया है, वे घर र्कसे ४०४ द वायूपुराणस्

English

After recounting this story of great length quelling sins, Vayu went away. After studying everything, the excellent Brah- marias went to the auspicious path of Aditya.

अध्याय ७२

श्लोक 31

केचिद्गङ्गाजले नष्टाः केचिन् नष्टाः सरस्वतीम् ।केचिन्महोदधौ लीनाः प्रविष्टा विन्ध्यकन्दरे

kecidgaṅgājale naṣṭāḥ kecin naṣṭāḥ sarasvatīm / kecinmahodadhau līnāḥ praviṣṭā vindhyakandare

हिन्दी अर्थ

एतत्सवं समाचक्षव ज्योतिषां चेव निश्चयम् । श्रुत्वा तु बचन तेषां तदा सूतः समाहितः

English

This type of liberation is called SirUpya, 'similarity of appearance'.

अध्याय ७२

श्लोक 32

आश्रित्य नर्मदातोये मणिनागोत्तमो नृप ।तपश्चचार विपुलमुत्तरे नर्मदातटे

āśritya narmadātoye maṇināgottamo nṛpa / tapaścacāra vipulamuttare narmadātaṭe

हिन्दी अर्थ

यथा देवगृहाणीह सूर्याचन्द्रमसोग हम चतुर्भूतावशिष्टेइस्मिन्पाथिवः सोग्निरच्यते । यश्चा55दौ तपते सूर्ये शुचिरग्निस्तु स स्मृत:..

English

O eloquent one, who is the greatest in regard to attri¬ butes, activities and power? We wish to hear clearly the descrip¬ tion of his good, wonderful qualities in detail.

अध्याय ७२

श्लोक 33

मातृशापभयात्पार्थ ध्यायते कामनाशनम् ।अच्छेद्यमप्रतर्क्यं च विनाशोत्पत्तिवर्जितम्

mātṛśāpabhayātpārtha dhyāyate kāmanāśanam / acchedyamapratarkyaṃ ca vināśotpattivarjitam

हिन्दी अर्थ

अचिष्मान्परमः सोडग्निः प्रभवो जाठरः स्मृतः । यश्चायं सण्डली शुक्रो निरूष्मा संप्रकाशते.

English

In this connection they cite this ancient anecdote about the greatness and omnipotence of the great Atman, Mahadeva.

अध्याय ७२

श्लोक 34

वायुभक्षः शतं साग्रं तदर्धं रविवीक्षकः ।एवं ध्यानरतस्यैव प्रत्यक्षस्त्रिपुरान्तकः

vāyubhakṣaḥ śataṃ sāgraṃ tadardhaṃ ravivīkṣakaḥ / evaṃ dhyānaratasyaiva pratyakṣastripurāntakaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभा हि सोरी पादेन ह्यस्तं याति दिवाकरे । अग्निमाविशते रात्रौ तस्माद्दूरात्प्रकाशते ११ ा/"”७।/हैिण,:/:प5?)03”:थ:प:खआयथ:थ:७०/+-++हन-न्‍जन्‍.हकहईॉजह/्/॒॒॒/॒ ॒॒/ ख/ ॥॥र्र्रज्-यञपख़ख़ख़ख़ख़््

English

Formerly this was narrated by Visnu when he had con¬ quered the three worlds after binding Bali. The deity of great prowess became the lord of the three worlds formerly.

अध्याय ७२

श्लोक 35

साधु साधु महाभाग सत्त्ववांस्तु भुजंगम ।त्वया भक्त्या गृहीतो ऽहं प्रीतस्ते ह्युरगेश्वर ।वरं याचय मे क्षिप्रं यस्ते मनसि वर्तते

sādhu sādhu mahābhāga sattvavāṃstu bhujaṃgama / tvayā bhaktyā gṛhīto 'haṃ prītaste hyurageśvara / varaṃ yācaya me kṣipraṃ yaste manasi vartate

हिन्दी अर्थ

कान्ति कसी है? यह सब और ज्योतिमण्डल का वृत्तान्त हमें कहिये। ऋषियों के वचन को सुनकर सुस्थिर होकर सूतजी बोले--“इस विषय में ज्ञान-बुद्धि वाले महापण्डितों ने जेसा कहा है, तदनुसार हम आप लोगों से कहते हैं। देवों का और चन्द्र-सूये का जेसा घर है एवं चन्द्र- सूर्थ का जेसा संस्थान है, सब कुछ आप लोगों को सुना रहे हैं ।२-४। किन्तु इसके पहले हम त्रिविध अग्नि की उत्पत्ति बताते हैं। अग्नि तीन तरह

English

When the Daityas were destroyed, when the Lord of Sac! was delighted, all the Devas including Indra came to see the Lord. They came near the ocean of milk where Visnu, the Atman of cosmic form, stayed. After approaching the noble-souled, the Purusa, Visnu, all the Siddhas, Brahmanas, Yaksas, Gandhar- vas, Apsaras-s, Nagas, celestial sages, rivers and mountains eulo¬ gised him.

अध्याय ७२

श्लोक 36

मणिनाग उवाच: मातृशापभयान्नाथ क्लिष्टो ऽहं नर्मदातटे ।त्वत्प्रसादेन मे नाथ मातृशापो भवेद्वृथा

maṇināga uvāca: mātṛśāpabhayānnātha kliṣṭo 'haṃ narmadātaṭe / tvatprasādena me nātha mātṛśāpo bhavedvṛthā

हिन्दी अर्थ

के हैं--दिव्य, भौतिक और पाथिव । अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा की रात्रि के बीत जाने पर, जब नैश अन्धकार से सब आच्छन्न था, कहीं कुछ सृष्टि नहीं हुई थी, केवल चार भूत ही अवशिष्ट थे, उस समय जो सर्वप्रथम अग्नि हुए वे पार्थिव कहलाये । जो अग्नि सूर्य में रहकर तपते हैंया ताप दान करते हैं, वे शुत्चि अग्नि कहलाते हैं ।५-७। वैद्युत अग्नि भी इन्हीं का नाम है। इनका अब लक्षण कहते हैं। वद्चत जाठर और सौर अग्नि जल से उत्पन्न हुए हैं; इसीलिये जब किरणों द्वारा सूयं जल का पान करते हैं तब ये आकाश में अधिक प्रकाशमान हो जाते हैं। वैद्यात अग्ति अगर वृक्ष में चले जाते हैं, तो पानी से नहीं बुझते हैं । उसी प्रकार मनुष्यों के पेट में अग्नि देव हैं, वे भी पानी से नहीं बुझते हैं । पेट में रहने वाले जो जाठर अग्नि हैं, वे अतिशय ज्योतिष्मान् हैं, और जो यह मण्डलाकार बिता गर्मी बाला गुक्त नामक अग्नि प्रकाशित

English

"O Lord, you are the creatorandsustainer of theworlds. By your grace the three worlds attain imperishable welfare. The Asuras have been conquered and Bali has been bound by you".

अध्याय ७२

श्लोक 37

ईश्वर उवाच: हव्यवाहमुखं वत्स न प्राप्स्यसि ममाज्ञया ।मम लोके निवासश्च तव पुत्र भविष्यति

īśvara uvāca: havyavāhamukhaṃ vatsa na prāpsyasi mamājñayā / mama loke nivāsaśca tava putra bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

होता है, वह दिन की अपेक्षा रात में दूर से हो प्रकाशित होता है, इसलिये कि सूयं की किरण अस्तकाल में एक एक चरण से उसमें प्रवेश कर जातौ है ।८-१ १। फिर सूर्योदय होने पर पाथिव अग्नि की उष्णता

English

On being thus addressed by Devas, Siddhas and the sages, Visnu, the excellent of Purusas, replied to them.

अध्याय ७२

श्लोक 38

मणिनाग उवाच: अत्र स्थाने महादेव स्थीयतामंशभागतः ।सहस्रांशेन भागेन स्थीयतां नर्मदाजले ।उपकाराय लोकानां मम नाम्नैव शङ्कर

maṇināga uvāca: atra sthāne mahādeva sthīyatāmaṃśabhāgataḥ / sahasrāṃśena bhāgena sthīyatāṃ narmadājale / upakārāya lokānāṃ mama nāmnaiva śaṅkara

हिन्दी अर्थ

प्रकाशश्च तथोष्ण्यं च सौराग्नेये तु तेजसी । परस्परानृप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम् अस्तें याति पुनः सूर्य अहें प्रविशत्यपः । तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला आपो विशन्ति भास्करे

English

"May this be heard, O excellent Devas, I shall mention the cause; the achievement has come at the very outset, thanks to the grace of that Lord alone who is the creator of all living beings, who is Time ( Kala ), the creator of Time, and by whom the worlds have been created along with Brahma by means of his Maya power.

अध्याय ७२

श्लोक 39

ईश्वर उवाच: स्थापयस्व परं लिङ्गम् आज्ञया मम पन्नग ।इत्युक्त्वान्तर्हितो देवो जगाम ह्युमया सह

īśvara uvāca: sthāpayasva paraṃ liṅgam ājñayā mama pannaga / ityuktvāntarhito devo jagāma hyumayā saha

हिन्दी अर्थ

एक चरण से सूर्य में प्रवेश कर जाती है इस कारण सथ तृप्त होते हैं। प्रकाश और उष्णता गुण सम्पन्न सूर्य ओर अग्ति का तेज परस्पर प्रवेश करके एक दूसरे को दिन-रात तृप्त करते हैं। उत्तरीय भूगोलाड॑ं में अथवा दक्षिणीय भूमोलार्द्ध में जब सूर्य उदित होते हैं, तब रात्रि जल में प्रवेश कर जाती है; इस कारण दिन में रात्रि के प्रवेश कर जाने से जल ताम्र वर्ण का हो जाता है ।१२०१४ फिर सूर्य के अस्त होने पर

English

Rudra and Agni (Fire-god) have been identified in Vedic times. Lihga worship is not Phallus-worship but the Puranic transformation of Vedic fire worship. The origin of or manifestation of the Lihga of Siva is told in different Puranas, e.g. Lihga 17, KP II. 38, Bd. 26.

अध्याय ७२

श्लोक 40

मार्कण्डेय उवाच: तत्र तीर्थे तु ये गत्वा शुचिप्रयतमानसाः ।पञ्चम्यां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां शुक्लकृष्णयोः

mārkaṇḍeya uvāca: tatra tīrthe tu ye gatvā śuciprayatamānasāḥ / pañcamyāṃ vā caturdaśyāmaṣṭamyāṃ śuklakṛṣṇayoḥ

हिन्दी अर्थ

दिन जल में प्रवेश कर जाता है, इस कारण रात को जल उज्ज्बल हो जाता है। इसी तरह दक्षिणोत्तर भूगोलार्द्ध में सूये के उदय-अस्त होने पर क्रमपृवंक रात और दिन जल में प्रवेश किया करते हैं। ताप वितरण करने वाले सूथं की किरणों से जो जल पिया करते हैं, वे विमिश्न पाथिव अग्नि हैं। ये ही दिव्य शुति अग्नि भी कहलाते हैं ।१५-१७। ये हजार किरण वाले और घड़े की तरह गौल हैं। ये हमार किरणों से चारों ओर का जल खींचा करते हैं। नदी, समुद्र, कूप, बिल, स्थावर ज॑गम आदि के जल को ये खींच लिया करते हैं। हिरण्मय सूर्थ गर्मी, शीत और वर्षा बरसाने वाली हजार किरणों से युक्त है। उनमें विचित्र रूप वाली चार सौ किरणें वृष्टि किया करती हैं। वृष्टि करने वाली वें सभी किरणें वन्दन, वन्ध, ऋतन,

English

Formerly, when the three worlds were plunged in un¬ manifest darkness and when the living beings had been retained inside my belly, I lay myself down.

अध्याय ७२

श्लोक 41

अर्चयन्ति सदा पार्थ नोपसर्पन्ति ते यमम् ।दध्ना च मधुना चैव घृतेन क्षीरयोगतः

arcayanti sadā pārtha nopasarpanti te yamam / dadhnā ca madhunā caiva ghṛtena kṣīrayogataḥ

हिन्दी अर्थ

नूतन और अमृत नाम से प्रसिद्ध हैं।१८-२०। उनके बाद तीन सौ दूसरी शीतल किरणें हैं, जो पीले रंग की हैं। इन्हों से शीत उत्पन्न होता है। इनके नाम दृश्य मेध्य, बाह्य, ह्वादिनी और चन्द्र हैं। फिर

English

Assuming the form of the thousand-headed, thousand- eyed thousand-legged deity, holding the conch, discus and mace in the hands, I lay down in the pure limpid waters.

अध्याय ७२

श्लोक 42

स्नापयन्ति विरूपाक्षमुमादेहार्धधारिणम् ।कामाङ्गदहनं देवमघासुरनिषूदनम्

snāpayanti virūpākṣamumādehārdhadhāriṇam / kāmāṅgadahanaṃ devamaghāsuraniṣūdanam

हिन्दी अर्थ

शुक्लास्ता नामतः सर्वास्त्रिशता धर्मंसर्जनाः । सम॑ बिभति नाभिस्तु मनुष्यपितृदेवताः बसन्ते चेव ग्रीष्से जे स तेः सुतपते त्रिभिः । वर्षास्वथों शरदि च चतुर्भिः संप्रकर्षति २५

English

In the meantime, from a distance I espied a person of unmeasured splendour who blazed with his brilliance resembl¬ ing a hundred suns.

अध्याय ७२

श्लोक 43

स्नाप्यमानं च ये भक्त्वा पश्यन्ति परमेश्वरम् ।ते यान्ति च परे लोके सर्वपापविवर्जितैः

snāpyamānaṃ ca ye bhaktvā paśyanti parameśvaram / te yānti ca pare loke sarvapāpavivarjitaiḥ

हिन्दी अर्थ

एवं रश्मिसहत्न' तत्सोरं॑ लोकार्थशाधकम् । भिद्यते ऋतुमासाद्य जलशीतोष्णनिद्नवम् २७ इत्येतन्मण्डलं शुक्ल भास्कर सूर्यंसंज्ञितम् । ( तक्षत्रप्रहसोमानां प्रतिष्ठा योनिरेव च ॥

English

Then he who was Brahma, who was bowed to by the worlds, spoke to me—"O lord, who arc you? Whence have you come? Why do you stay here. Tell me. I am the maker of the worlds. I am self-born. I have faces all round". Thus addressed by Brahma, I spoke to him.

अध्याय ७२

श्लोक 44

श्राद्धं प्रेतेषु ये पार्थ चाष्टम्यां पञ्चमीषु च ।ब्राह्मणैश्च सदा योग्यैर् वेदपाठकचिन्तकैः

śrāddhaṃ preteṣu ye pārtha cāṣṭamyāṃ pañcamīṣu ca / brāhmaṇaiśca sadā yogyair vedapāṭhakacintakaiḥ

हिन्दी अर्थ

नक्षत्राधिपतिः सोमों ग्रहराजों दिवाकरः। शेषाः प्च ग्रहा ज्ञेया ईश्वराः कामरूपिण:ः २६ सुरसेनापतिः स्कन्दः पठचते5ज्भारको ग्रहः । नारायण बुधं प्राहुर्देवे ज्ञानविदो बिदुः ३३१

English

"I am the creator and destroyer of the worlds again and

अध्याय ७२

श्लोक 45

स्वदारनिरतैः श्लक्ष्णैः परदारविवर्जितैः ।षट्कर्मनिरतैस् तात शूद्रप्रेषणवर्जितैः

svadāranirataiḥ ślakṣṇaiḥ paradāravivarjitaiḥ / ṣaṭkarmaniratais tāta śūdrapreṣaṇavarjitaiḥ

हिन्दी अर्थ

शुक्ल, ककुम, विश्वभृत् आदि शुक्ल वर्ण का ताप बरसाने वाली तीन सौ किरणें हैं। सूर्य इन किरणों से मनुष्य, देवता और पितरों का समान भाव से पोषण करते हैं ।२१०२३। औषधों से मनुष्यों को, स्वधा से पितरों को और अमृत द्वारा देवों को इस प्रकार त्रिविध किरणों से सब को तृप्त करते हैं। वे हैमन्त और शिशिर में तीन सौ किरणों द्वारा शीत बरसाते हैं, वसनन्‍्त और ग्रीष्म में तीन सौ किरणों द्वारा ताप

English

On seeing that flame we two were surprised. By that splendour all the waters sparkled.

अध्याय ७२

श्लोक 46

खञ्जाश्च दर्दुराः षण्ढा वार्द्धुष्याश्च कृषीवलाः ।भिन्नवृत्तिकराः पुत्र नियोज्या न कदाचन

khañjāśca dardurāḥ ṣaṇḍhā vārddhuṣyāśca kṛṣīvalāḥ / bhinnavṛttikarāḥ putra niyojyā na kadācana

हिन्दी अर्थ

वितरण करते हैं और बरसात तथा शरद में चार सौं किरणों द्वारा वृष्टि संपादन करते हैं। वे औषधियों को बल देते, स्वधा द्वारा पितरों को तृप्त करते ओर अमृत द्वारा अमरत्व का विधान करते हैं। इस प्रकार वे तीनों किरणों से तीनों को तृप्त करते हैं।२४-२६। इस तरह सूयं की हजारों किरणों से केवल लोकों का उपकार ही होता है। वे किरणें ऋतुक्रम से उत्ताप, शीतलता और जल प्रदान किया करती हैं। शुक्ल और प्रभावान् सूर्य मण्डल नक्षत्र, ग्रह और चन्द्रमा का प्रतिष्ठा-स्थान तथा उद्भव-स्थान है । नक्षत्र, ग्रह और चन्द्र सभी सूर्य से ही उत्पन्न हुए हैं। चन्द्रमा नक्षत्राधिपति हैं। और सूर्थ ग्रहराज हैं। शेष पाँचों ग्रह इच्छाधीन शरीर वाले ओर सर्वंसमर्थ हैं। ऐसा कहा जाता है कि अग्नि आदित्य हैँ और जल चन्द्रमा हैं। शेष ग्रहों की प्रकृति का भी वर्णन करते हैं, सुनिये ।२७-३०। देव सेनापति

English

When that excessively surprising and mysterious flame began to increase in size, Brahma and I hastened towards that

अध्याय ७२

श्लोक 47

वृषलीमन्दिरे यस्य महिषीं यस्तु पालयेत् ।स विप्रो दूरतस्त्याज्यो व्रते श्राद्धे नराधिप

vṛṣalīmandire yasya mahiṣīṃ yastu pālayet / sa vipro dūratastyājyo vrate śrāddhe narādhipa

हिन्दी अर्थ

कारतिकेय मज़ल॒ ग्रह कहे जाते हैं । ज्ञानवात् लोग नारायण को बुध कहते हैं।३१। लोक में रुद्र

English

The massive column of flame stood touchim

अध्याय ७२

श्लोक 48

काणाष्टुंटाश्च मण्टाश्च वेदपाठविवर्जिताः ।न ते पूज्या द्विजाः पार्थ मणिनागेश्वरे शुभे

kāṇāṣṭuṃṭāśca maṇṭāśca vedapāṭhavivarjitāḥ / na te pūjyā dvijāḥ pārtha maṇināgeśvare śubhe

हिन्दी अर्थ

धनुध्चिह्नास्तर्गतग्रन्थ: ख. पुस्तके नास्ति । रुद्रो ववस्वतः साक्षाद्धमों लोके प्रभु: स्वयम् । महाग्रहो द्विजश्रेष्ठो मन्दगासी शनेश्ररः

English

Who can reach the limits of this terrible looking Linga, the cause of Mantra (Vedas), which was piercing through the heaven and the earth?

अध्याय ७२

श्लोक 49

यदीच्छेदूर्ध्वगमनमात्मनः पितृभिः सह ।सर्वाङ्गरुचिरां धेनुं यो दद्यादग्रजन्मने

yadīcchedūrdhvagamanamātmanaḥ pitṛbhiḥ saha / sarvāṅgarucirāṃ dhenuṃ yo dadyādagrajanmane

हिन्दी अर्थ

देवासुरगुरू दो तु भानुमन्तो महाग्रहां। प्रजापतिसुतावेताबुभौ शुक्रबुहस्पती ॥।

English

Then Brahma told me 3 "You go down cautiously. Let us know the limits of this Linga, the great Atman.

अध्याय ७२

श्लोक 50

स याति परमं लोकं यावदाभूतसम्प्लवम् ।ततः स्वर्गाच्च्युतः सो ऽपि जायते विमले कुले

sa yāti paramaṃ lokaṃ yāvadābhūtasamplavam / tataḥ svargāccyutaḥ so 'pi jāyate vimale kule

हिन्दी अर्थ

आदित्यमूलमखिलं त्रिलोक नात्र संशय: । भवत्यस्य जगत्कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम् सर्वात्मा स्वबलोकेशों मूलं परमदेबतम् । ततः संजायते सर्व तत्र चेव प्रलोयते

English

I shall go up as far as the limit is reached". Thus we came to an agreement and went up and down.

अध्याय ७२

श्लोक 51

ये पश्यन्ति परं भक्त्या मणिनागेश्वरं नृप ।न तेषां जायते वंशे पन्नगानां भयं नृप

ye paśyanti paraṃ bhaktyā maṇināgeśvaraṃ nṛpa / na teṣāṃ jāyate vaṃśe pannagānāṃ bhayaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

भावाभावों हि लोकानामादित्यान्निःसृतौ पुरा । जगज्ज्ञेयों ग्रहो विप्रा दीप्तिमांसुग्रहो रचिः.

English

Similarly Brahma too was exhausted. He could not see the limit. There itself in that great expanse of water, Brahma met me again.

अध्याय ७२

श्लोक 52

पन्नगः शङ्कते तेषां मणिनागप्रदर्शनात् ।सौपर्णरूपिणस्ते वै दृश्यन्ते नागमण्डले

pannagaḥ śaṅkate teṣāṃ maṇināgapradarśanāt / sauparṇarūpiṇaste vai dṛśyante nāgamaṇḍale

हिन्दी अर्थ

तदादित्यादृते तेषां कालसंख्या न विद्यते । कालादूते न निगमो न दीक्षा नाह्लिकक्नमः ३६ अभावो व्यवहाराणां देवानां दिवि चेह च् जगत्प्रतापनमृते भास्करं बारितस्करम् १४ १ स एवं कालश्राग्निश्व द्वादशात्मा प्रजापति: । तपत्येष द्विजश्रेष्ठास्त्रेलोक्यं सचराचरम् ॥४ २

English

Both of us were surprised. We were deluded by the Maya of that great Atman. We stood there (as if) we had lost our consciousness.

अध्याय ७२

श्लोक 53

फलानि चैव दानानां शृणुष्वाथ नृपोत्तम ।अन्नं संस्कारसंयुक्तं ये ददन्ते नरोत्तमाः

phalāni caiva dānānāṃ śṛṇuṣvātha nṛpottama / annaṃ saṃskārasaṃyuktaṃ ye dadante narottamāḥ

हिन्दी अर्थ

देवगुरु और असूरगुरु दोनों ही प्रकाशवान् महाग्रह हैं । ये दोनों ही शुक्र बृहस्पति प्रजापति के पृत्र हैं। इन दोनों के प्रभाव से ही हैत्यपति और सुरपति प्रतापवान् हैं । तीनों लोकों का मूलकारण सूर्य ही हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। देवता, असुर और मनुष्यों से पूर्ण यह सम्पूर्ण जगत् सूथे का ही है ।३२-३४। विप्रों ! रुद्र, हरद्र, उपेन्द्र और चन्द्रादि देवों का जो तेज है, वह से का ही तेज है। ये ही सर्वात्मा, सर्बलोकेश और

English

We bowed to the Lord engaged in meditation—the Lord who is the source of origin and the cause of (destruction) of all the worlds.

अध्याय ७२

श्लोक 54

तोयं शय्यां तथा छत्रं कन्यां दासीं सुभाषिणीम् ।पात्रे देयं यतो राजन् यदीच्छेच्छ्रेय आत्मनः

toyaṃ śayyāṃ tathā chatraṃ kanyāṃ dāsīṃ subhāṣiṇīm / pātre deyaṃ yato rājan yadīcchecchreya ātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रलभूत परम देवता हैं। सूर्य से ही सब उत्पन्न हुए हैं और सूय॑ में ही सब लीन होते हैं । पूर्वकाल में लोकों की उत्पत्ति और विनाश सूर्य से ही हुआ है। विप्रो ! इमलिये यह जगत् ही ग्रहमय है और सूर्य दीप्तिमान् सुन्दर ग्रह हैं। ३५-३७। जहाँ से बारम्बार क्षण, मुह॒र्त, दिन, रात, पक्ष मास, संवत्सर ऋतु, वर्ष और युग आदि उत्पन्न होकर जिसमें लय प्राप्त करते हैँ, वह सूर्य ही हैं। सू्ं को छोड़कर दूसरे से काल की संख्या नहीं की जाती है । और बिना काल और समय के न शास्त्र, न दीक्षा और न हैविक कृत्य हो सकते हैं ।३८-२९। तब न ऋतुओं का विभाग होगा, न पुष्प खिलेंगे, न फलन्मूल की उत्पत्ति होगी, न ससय होगा, न ओषधियाँ बढ़ेगी । संसार को प्रतप्त करने वाले और जल का अपहरण करने वाले सूर्य के बिना यहाँ क्या, स्वगें में भी देवों का व्यावहारिक कार्य रुक जायगा। विप्रो ! सर्य ही काल हैं, अग्नि हैं और

English

With palms joined in reverence Brahma (and I) paid obeisance to the trident-bearing Sarva (Siva), the unmanifest, the mighty god of terrible roar and a frightening form having curved fangs.

अध्याय ७२

श्लोक 55

सुरभीणि च पुष्पाणि गन्धवस्त्राणि दापयेत् ।दीपं धान्यं गृहं शुभ्रं सर्वोपस्करसंयुतम्

surabhīṇi ca puṣpāṇi gandhavastrāṇi dāpayet / dīpaṃ dhānyaṃ gṛhaṃ śubhraṃ sarvopaskarasaṃyutam

हिन्दी अर्थ

प्ण्द वायुपुराणम्

English

"O lord of the worlds and Devas, obeisance be to you. O great lord of Bhutas, obeisance be to you. Hail to you, O external one, the cause of origin of the Siddhas. O lord, the support of the universe, obeisance be to you.

अध्याय ७२

श्लोक 56

ये ददन्ते परं भक्त्या ते व्रजन्ति त्रिविष्टपम् ।मणिनागे नृपश्रेष्ठ यच्च दानं प्रदीयते

ye dadante paraṃ bhaktyā te vrajanti triviṣṭapam / maṇināge nṛpaśreṣṭha yacca dānaṃ pradīyate

हिन्दी अर्थ

सुधुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथव च। विश्वश्षवाः पुनश्चान्यः संयसुद्वरतं परम् । अर्बाग्वसु: पुनश्चान्यों मया चात्र प्रकीतितः ३४४५ सुषुम्तः सूर्य रश्सिस्तु क्षीणं शशिनमेधयन् । तियंगुध्ब॑प्रचारोसो सुषुम्नः परिकीत्यंत ४६ हरिकेश: पुरस्त्वाद ऋक्षयोनि: प्रकीत्य॑ते । दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिवेधंयते बुधम्

English

You are the great Brahman, the Supreme Lord and the imperishable. You are the great region and the excellent Vamadeva. You are Lord Rudra, Siva and Skanda.

अध्याय ७२

श्लोक 57

तस्य दानस्य भावेन स्वर्गे वासो भवेद्ध्रुवम् ।पातकानि प्रलीयन्ते आमपात्रे यथा जलम्

tasya dānasya bhāvena svarge vāso bhaveddhruvam / pātakāni pralīyante āmapātre yathā jalam

हिन्दी अर्थ

एवं सूर्यप्रभावेण ग्रहनक्षत्रतारका: । वर्धन्ते विदिताः सर्वा विश्व॑ चेदं पुनर्जगत्॥

English

You are Yajna (Sacrifice), Vasatkara, Omkara, the great goal. You are Svahakara and Namaskara. You are the purifier of all sacred rites.

अध्याय ७२

श्लोक 58

नर्मदातोयसंसिद्धं भोज्यं विप्रे ददाति यः ।सो ऽपि पापैर्विनिर्मुक्तः क्रीडते दैवतैः सह

narmadātoyasaṃsiddhaṃ bhojyaṃ vipre dadāti yaḥ / so 'pi pāpairvinirmuktaḥ krīḍate daivataiḥ saha

हिन्दी अर्थ

तोर्णानां सुकतेनेह सुकृतान्ते प्रहाक्यांत्। ताराणां तारका हाय ताः शुक्लत्वाच्चेब तारकाः ३५२ द्वादशात्मा प्रजापति हैं।ये ही तीनों लोकों के चराचर को प्राप्त किया करते हैं। सूययदेव परमतेजस्वी हैं और समस्त लोकों के आत्मा हैं । ये उत्तम वायुमागं का अवलम्बन करके किरणों द्वारा ऊपर-नीौचे पाइवे भाग और सभी जगहों में ताप दान करते हैं ।४०-४३॥ हमने पहले सुये की जिन हजार किरणों को बताया है, उनमें ग्रहों को उत्वन्न करने वाली सात किरणें प्रधान हैं। सातों किरणें ये हैं -सुषुम्तन, हरिकेश, विश्वकर्मा,

English

You alone are Svadhakara. You are the Mantra for repetition. You are the sacred rites, observances, the Vedas, the worlds and all the Devas. You are the sound (the quality) of Akasa; you are the eternal source of living beings. You are the attribute of smell in

अध्याय ७२

श्लोक 59

ततः स्वर्गच्युतानां हि लक्षणं प्रवदाम्यहम् ।दीर्घायुषो जीवपुत्रा धनवन्तः सुशोभनाः

tataḥ svargacyutānāṃ hi lakṣaṇaṃ pravadāmyaham / dīrghāyuṣo jīvaputrā dhanavantaḥ suśobhanāḥ

हिन्दी अर्थ

विद्वश्रवा, संयद्वसु, अर्वाग्वसु और स्वराड् सूर्य की सुषुम्न किरण क्षीण हुए चन्द्रमा को बढ़ाती है। यह् सुषुम्न किरण वक्र होकर ऊपर की ओर जाती हैं। हरिकेश किरण आगे की ओर रहती है। ये नक्ष त्रों की उत्पत्ति स्थान कहलाती हैं। दक्षिण ओर रहकर विश्वकर्मा किरण बुध को परिपुष्ट करती करती है

English

You arc the attribute of touch in vayu. You arc the lord Moon in the embodied form. You are the perfect knowl¬ edge in Budha. O lord of Devas, you are the seed in the Prakrti.

अध्याय ७२

श्लोक 60

सर्वव्याधिविनिर्मुक्ताः सुतभृत्यैः समन्विताः ।त्यागिनो भोगसंयुक्ता धर्माख्यानरताः सदा

sarvavyādhivinirmuktāḥ sutabhṛtyaiḥ samanvitāḥ / tyāgino bhogasaṃyuktā dharmākhyānaratāḥ sadā

हिन्दी अर्थ

पश्चाउड्भाग में रहने वाली विश्वक्षवा किरण शुक्र का उद्धवस्थान है। संयद्वसु किरण मंगल को उत्पन्न करने वाली है। छठी अर्वाग्वसु किरण से बृहस्पति उत्पन्न हुए हैं और स्वराद् किरण शर्नेश्चर को तृप्त करने बाली है। इस प्रकार सूर्य के प्रभाव से ही ग्रह-नक्षत्र तारा आदि वृद्धि प्राप्त करते हैं, यह सर्वविदित है। यह सम्पूर्ण संसार ही सर्य के द्वारा प्रकट हुआ है। यतः ये क्षीण नहीं होते हैं, उसीसे इनका नाम नक्षत्र पड़ा हैं पहले किरणों द्वारा इन क्षेत्रों में पतित होते हैं, और उनके क्षेत्रों को ग्रहण करते हैं; अतः सूर्य भी नक्षत्र कहलाते हैं । ये तारागण सुकर्म द्वारा विस्तृत हैं ओर सुकर्म द्वारा ही ग्रहों का आश्रय लेते हैं, इसी से ये तारका

English

O lord, you arc the maker of living beings. You are Kala, Mrtyu, Yam a, the destroyer. You support the three worlds. You alone create them. By means of your eastern face, you manifest Indra-hood. O lord, by means of your southern face you annihilate the worlds (as Yama).

अध्याय ७२

श्लोक 61

देवद्विजगुरोर्भक्तास् तीर्थसेवापरायणाः ।मातापितृवशा नित्यं द्रोहक्रोधविवर्जिताः

devadvijagurorbhaktās tīrthasevāparāyaṇāḥ / mātāpitṛvaśā nityaṃ drohakrodhavivarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

सुबति स्पनदना्थे चर धातुरेष विभाव्यते । सबनासेजसो5पां च तेनासो सविता मत:

English

By means of the western face you exhibit your Varuna- hood. Your Moon-hood is established by means of your northern face.

अध्याय ७२

श्लोक 62

एभिरेव गुणैर् युक्ता ये नराः पाण्डुनन्दन ।सत्यं ते स्वर्गादायाताः स्वर्गे वासं व्रजन्ति ते

ebhireva guṇair yuktā ye narāḥ pāṇḍunandana / satyaṃ te svargādāyātāḥ svarge vāsaṃ vrajanti te

हिन्दी अर्थ

घनतोयात्मक तत्र मण्डलं शशिनः स्मृतम् । घनतेजोमयं शुक्ल मण्डल भास्करस्य तु ३५७ विशन्ति सर्वदेवास्तु स्थानान्येतानि सर्वशः । सन्बन्तरेषु सर्वेषु ऋक्षसूर्यग्रहाश्याः ५८ तानि देवगृहाण्येब तदाख्यास्ते भवन्ति च। सोरं सूर्यो विशः स्थान सोम्यं सोमस्तथंव च शानश्चरं तथा स्थान देवश्चेव शनेश्चरः १६० आवित्यरश्मिसंयोगात्संप्रकाशात्मिकाः स्थ॒ता: । नवयोजनसाहस््री विष्कम्भः सवितुः स्मृतः:.

English

OLord having the lustre of ten thousand suns, obeis¬ ance be to you. Bow to you, O Lord having the lustre of thou¬ sand moons. Hail to you, O Lord assuming the form of a moun- tam. Obeisance to you, O reservoir of all good qualities Obeisance be to you, O gold-complexioned Lord. Hail to vou, O gold-wombed Lord. Obeisance be to you, O Lord with gold bark-garments. Obeisance be to you, O lord, the bestower of gold.

अध्याय ७२

श्लोक 63

सर्वतीर्थवरं तीर्थं मणिनागं नृपोत्तम ।तीर्थाख्यानमिदं पुण्यं यः पठेच्छृणुयाद् अपि

sarvatīrthavaraṃ tīrthaṃ maṇināgaṃ nṛpottama / tīrthākhyānamidaṃ puṇyaṃ yaḥ paṭhecchṛṇuyād api

हिन्दी अर्थ

कहल'ते है और शुक्ल होने के कारण भी इनका नाम तारका पड़ा है। दिव्य, पाथिव और निशा सम्बन्धी अन्धकार का सब प्रकार से विनाश करने के कारण महान् तेजोराशि का नाम आदित्य हुआ है ।५१-५३।॥ “सु”! धातु का अर्थ होता है, स्फुरण या क्षरण तेज और जल का क्षरण करने के कारण सूर्य सब्रिता भो कहलाते हैं। 'चदि धातु का आह्वादन, शुब्लत्व, अमृतत्व और शीतत्व आदि अनेक अथे हैं । इसी धातु से चन्द्र छाब्द

English

Obeisance be to you e O Lord with golden necklace. Obeisance be to you, O Lord roaring terrifically.

अध्याय ७२

श्लोक 64

सोऽपि पापैर्विनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ।न विषं क्रमते तेषां विचरन्ति यथेच्छया

so'pi pāpairvinirmuktaḥ śivaloke mahīyate / na viṣaṃ kramate teṣāṃ vicaranti yathecchayā

हिन्दी अर्थ

बना है । चन्द्र और सूर्य का दिव्य मण्डल, आकाश में वतंमान है देदीप्यमान, तेजोमय, जाज्बल्यमास, शुक्ल ओर घड़े की तरह ग्रोल है ।५४-५६। उन मण्डलों में जलप्रधान चन्द्रमडल और तेज: प्रधान उज्ज्वलाकार सूर्यमंडल है । सभी मन्वन्तरों में नक्षत्र-ग्रहों के साथ देवगण इन स्थानों में प्रवेश करते हैं। इसी लिये ये देवगह कहलाते हैं । जो जिस घर में आश्रय प्राप्त करते, उसका कही नाम कहलाता है। सूर्य सौर स्थान में, सोम सोम्य स्थान में, झुंक़ शोक स्थान में प्रवेश करते हैं। शुक्र सोलह किरण वाले और प्रतापवान् हैं। बृहस्पति बृहत् स्थान में, लोहित (मंगल) लोहित स्थान में और शर्नेश्चर देव श नैदचर स्थान में प्रवेश करते हैं

English

Obeisance be to you, OLord of terrific speed. Bow to you, O Sankara, O blue-throated one. Obeisance be to you, O Lord with a thousand arms. Hail to you, O Lord, fond of dance and playing on instruments." On being eulogised thus, the lord, the great Yogin of great intellect, became manifest. He had the lustre equal to that of a crore suns.

अध्याय ७२

श्लोक 65

भाद्रपद्यां च यत्षष्ठ्यां पुण्यं सूर्यस्य दर्शने ।तत्फलं समवाप्नोति आख्यानश्रवणेन तु

bhādrapadyāṃ ca yatṣaṣṭhyāṃ puṇyaṃ sūryasya darśane / tatphalaṃ samavāpnoti ākhyānaśravaṇena tu

हिन्दी अर्थ

के सभी स्थान सूर्य किरण द्वारा प्रकाशित हो रहे है । सूर्य मेंडल का विष्कस्भ-विस्तार नौ हजार योजतनों का है और मण्डल का विस्तार-प्रमाण उससे तिगुना भधिक है! सूर्य के विस्तार से चन्द्रमा का विस्तार दूना है। इसके बराबर राहु भी इन दोनों के नीचे-तीचे चलता है। बहू मंडलाकार राहु पृथ्वी की छाया द्वारा निर्मित हुआ है ।६१-६३। राहु का अस्धकारमय बृहत् स्थान है। यह पूणिमा को सयमंडल से तिकलकर

English

Then the delighted Mahadeva, appeared worthy of being addressed. He seemed to be devouring the sky with his thousands and crores of mouths, though he had only a single neck and a single mass of hair. He was bedecked in different kinds of ornaments. His body looked wonderful and variegated. He wore different (kinds of) garlands and (besmeared himself) with unguents. He held Pinaka bow in his hand. The Lord wielding a spear was seated on a bull. He wore the hide of a black antelope. He assumed a terrible form with a skull in his hand. Wearing a serpent for the sacred thread, he offered pro¬ tection to Devas. He laughed boisterously producing sound like a kettle-drum and the rumbling cloud wherewith the sky was reverberated.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 72
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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