Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
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अध्याय 92 / 232

Adhyaya 92

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अध्याय ९२

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे चण्डादित्यतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकनवतितमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ९२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र यमहास्यमनुत्तमम् ।सर्वपापहरं तीर्थं नर्मदातटमाश्रितम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe caṇḍādityatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikanavatitamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 92 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra yamahāsyamanuttamam / sarvapāpaharaṃ tīrthaṃ narmadātaṭamāśritam

हिन्दी अर्थ

इत्येते वाजिन: प्रोक्ता दश पत्च घ्॒ संस्मृता:। शतमेकाधिक कृत्स्नं यजुर्षां वे विकल्पका: +सुकर्माणं सुत॑ सुत्वा पुत्रमध्यापयत्प्रभुः १२७ स सहल्नमधीत्याउश्शु सुकर्माध्प्यथ संहिता: । प्रोवाचाथ सहस्नस्य सुकर्मा सुर्यवर्चसः

English

Henceforth, I shall describe briefly the activity of crea¬ tion by Svarocisa, the second Manu of noble soul."

अध्याय ९२

श्लोक 2

युधिष्ठिर उवाच: यमहास्यं कथं जातं पृथिव्यां द्विजपुंगव ।एतत्सर्वं ममाख्याहि परं कौतूहलं हि मे

yudhiṣṭhira uvāca: yamahāsyaṃ kathaṃ jātaṃ pṛthivyāṃ dvijapuṃgava / etatsarvaṃ mamākhyāhi paraṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

अनध्यायेष्वधोयानांस्ताअुजघान शतक़तुः । प्रायोपवेशमक रोत्ततोइसौ शिष्पकारणात् ...

English

In the Svarocisa Manvantara, there were the Devas called Tusitas and the learned scholars called Paravatas. Only these two are remembered as the groups of Devas.

अध्याय ९२

श्लोक 3

श्रीमार्कण्डेय उवाच: साधु साधु महाप्राज्ञ पृष्टो ऽहं नृपनन्दन ।स्नानार्थं नर्मदां पुण्यामागतस्ते पिता पुरा

śrīmārkaṇḍeya uvāca: sādhu sādhu mahāprājña pṛṣṭo 'haṃ nṛpanandana / snānārthaṃ narmadāṃ puṇyāmāgataste pitā purā

हिन्दी अर्थ

प्रतिष्ठित था उतने ही ऊपर उठ उठकर वह समस्त यजुत्रद सूर्य मण्डल में आश्रय लेने लगा । जिससे सन्तुष्ट होकर मार्तण्ड सूथं-देव ने सभी यजुवंद को अश्वरूप धारण करने वाले, ब्रद्मश्ञानी परम बुद्धिमान् याज्ञवल्क्य को प्रदान किया ।१९-२१। अइवरूप धारण करने वाले याज्ञवल्क्य को दिये गये उस यजुवंद का अध्ययन करने वाले ब्राह्मण अद्वरूपधारी हुये । जिन वेशम्पायन के शिष्यों ने उनके साथ ब्रह्महत्या का अनुभव किया था, वे चरण (अनुभव करने) के कारण चरक नाम से प्रसिद्ध हुये । चरकों का वृत्तान्त वर्णन कर चुका अब याज्ञवस्तय के शिष्यों का जो अश्वरूपधारी थे, वत्तान्त सुनिये । कण्व, वेधेयशाली, मध्यन्दिन, शापेयी, विदिग्ध, आप्य,

English

They were born of Tusita as the sons of Kralu, the Svarocisa (Manu). The Paravatas and the remaining ones—these two Ganas (groups) consist of twelve each. (Thus) all these Devas together are remembered as chandajas and they are twen¬ ty-four (in number).

अध्याय ९२

श्लोक 4

रजकेन यथा धौतं वस्त्रं भवति निर्मलम् ।तथासौ निर्मलो जातो धर्मराजो युधिष्ठिर

rajakena yathā dhautaṃ vastraṃ bhavati nirmalam / tathāsau nirmalo jāto dharmarājo yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

धारी) जन कहे गये हैं । समस्त यजुर्वेद में एक सौ एक विकल्पक (संहिता भाग) देखे जाते हैं ।२२-२६। ज॑मिनि ने अपने पुत्र सुमन्‍्त को समस्त यजुर्वेद का अध्ययन कराया था। परम ऐश्वर्यशाली सुमन्‍्तु ने अपने पुत्र सुत्वा को उसे पढ़ाया । प्रभु सुत्वा ने अपने पुत्र सुकर्मा को उसकी शिक्षा दी । सुकर्मा ने इन सहस्र संहिताओं का अल्प समम में अध्ययन कर सूर्य के समान तेजस्वी अपने एक सहस्र शिष्यों को उसका अध्ययन कराया ।

English

Dhaivasyasa, Vamanya, Gopa, Devayata, lord Aja, the powerful lord Durona, Apa of powerful arms, the vigorous Mahaujas, C.ikitvan, Nibhrta, Viryavan, and Amsa: these were the sons of Kratu. They were then the imbibers of Soma.

अध्याय ९२

श्लोक 5

स पश्यन्निर्मलं देहं हसन्प्रोवाच विस्मितः

sa paśyannirmalaṃ dehaṃ hasanprovāca vismitaḥ

हिन्दी अर्थ

किन्तु अनध्याय के दिन अध्ययन करने के कारण इन्द्र ने उन सभी शिष्यों का संहार कर डाला, जिससे दुःखी इत्युक्टवा बासवः श्रीमान्सुकर्माणं यशस्विनम् । शान्तक्रोध॑ं द्विजं दृष्ट्वा तत्रवान्तरधीयत ३२

English

Lord Pracetas, Visvedeva, Samanja who was well known, Ajihma the suppressor of enemies, Ajihmana and Mahl- yana endowed with learning, the blessed Aja and Usa, Yavxya of great strength, Hotr and Yajva were the Paravatas of great exploit. These all were the deities whofunctioned in the Svaro¬ cisa Manvantara.

अध्याय ९२

श्लोक 6

यम उवाच: मत्पुरं कथम् आयान्ति मनुजाः पापबृंहिताः ।स्नानेनैकेन रेवायाः प्राप्यते वैष्णवं पदम्

yama uvāca: matpuraṃ katham āyānti manujāḥ pāpabṛṃhitāḥ / snānenaikena revāyāḥ prāpyate vaiṣṇavaṃ padam

हिन्दी अर्थ

लोकाक्षी कुथुमिश्चेव कुशीती लाज्भलिस्तथा । पौष्यञ्जिशिष्याश्रत्वारस्तेषां भेदान्चिबोधत

English

At that time these twenty-four Devatas (deities) were the imbibers of Soma. Their Indra (ruler and leader) was Vaidha who was world-famous.

अध्याय ९२

श्लोक 7

समर्था ये न पश्यन्ति रेवां पुण्यजलां शुभाम् ।जात्यन्धैस्ते समा ज्ञेया मृतैः पङ्गुभिरेव वा

samarthā ye na paśyanti revāṃ puṇyajalāṃ śubhām / jātyandhaiste samā jñeyā mṛtaiḥ paṅgubhireva vā

हिन्दी अर्थ

सकंतिपुत्र: सहसात्यपुत्र एतान्मेदान्वित्त लोकाक्षिणस्तु ॥३ ७ अयस्तु कुथुमे: पुत्रा औरसो रसपासर: । भागवित्तिश्न तेजस्वी त्रिविधाः कोथुमाः स्मृताः ॥रे८ होकर शिष्यों के लिए सुकर्मा प्रायोपवेश) करने पर उतारू हो मये। सुकर्मा को इस प्रकार क्र देखकर इन्द्र ने उन्हें फिर वरदान दिया कि तुम्हारे अग्नि के समान परम तेजस्वी एवं महान् पराक्रमी दो शिष्य होंगे ।३७-३०। है द्विजसत्तम ! वे आपके दोनों महाभाग्यशाली शिष्य महान पण्डित होंगे और इन सहख् संहिताओों का विधिवत् अध्ययन करेंगे आप क्रोध न करें। परम यशस्वी द्विजश्रेष्ठ से ऐसी बातें कहकर

English

The Saptarsis (the Seven Sages) were Orja the son of Vasistha, Stambha the son ofKasyapa, Drona the sonofBhrgu,

अध्याय ९२

श्लोक 8

समर्था ये न पश्यन्ति रेवां पुण्यजलां नदीम् ।एतस्मात् कारणाद् राजन्हसितो लोकशासनः

samarthā ye na paśyanti revāṃ puṇyajalāṃ nadīm / etasmāt kāraṇād rājanhasito lokaśāsanaḥ

हिन्दी अर्थ

और उनके क्रोध को शान्‍्त देखकर श्रीमान् इन्द्र वहीं पर अस्तर्धान हो गये है द्विजवय्य॑व॒न्द ! उन सुकर्मा के परम बुद्धिमान् पौष्यझजी नामक प्रथम और हिरण्यनाभ राजा कौशिल्य नामक द्वितीय शिष्य हुआ

English

There are some variations in the names of future Manus in some Puranas. Our Purana gives some different names (such as Raucya and Bhautya) of future Manus.

अध्याय ९२

श्लोक 9

स्थापयित्वा यमस्तत्र देवं स्वर्गं जगाम ह ।यमहासेश्वरे राजञ्जितक्रोधो जितेन्द्रियः

sthāpayitvā yamastatra devaṃ svargaṃ jagāma ha / yamahāseśvare rājañjitakrodho jitendriyaḥ

हिन्दी अर्थ

जिनमें से पौष्यञ्जी ने पाँच सौ संहिताओं को अपने शिष्यों को पढ़ाया। पौष्यञ्जी के वे कल्याणभाजन शिष्य सामान्यतः उदीच्य के नाम से विख्यात थे पराक्रमी कौशिल्य ने भी पाँच सौ सहिताओं की शिक्षा अपने शिष्यों को दी। हिरण्यनाभ नराधिप कौशिल्य के शिष्यगण प्रान्‍्य सामग के नाम से विख्यात दुए । अब पीष्यञ्जी के लोकाक्षी, कुथुमि, कुशीती और लाज्भलि नामक जो चार शिष्य हो गये हैं, उनके भेदों को सुनिये ।३४-३६॥। तण्डिपुत्र, राणायनीय, सुविद्वान् मूलचारी, कैतिपुत्र, और सात्यपुत्र-ये सभी लोकाक्षी के शिष्यों के नाम हैं। कुथमि के औरस, रसपासर और तेजस्वी भागवित्ति नामक तीन पुत्र थे, जी तीनों कोथम नाम से प्रसिद्ध थे। शौरिद्य और श्रजद्धिपुत्र ये दो परम तपस्वी एवं ब्रतपरायण थे, राणायनीम और सोमित्रि ये दो सामवेद के विशारद थे ।३७-३६। महान् तपस्वी शज्भपुत्र ने तीन संहिताओं का उपदेश

English

Verses 6-22 enumerate and describe the fuiicuonaries (gods, Indra etc.) during the second Manvantara.

अध्याय ९२

श्लोक 10

विशेषाच्चाश्विने मासि कृष्णपक्षे चतुर्दशीम् ।उपोष्य परया भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते

viśeṣāccāśvine māsi kṛṣṇapakṣe caturdaśīm / upoṣya parayā bhaktyā sarvapāpaiḥ pramucyate

हिन्दी अर्थ

१. किसी घोर पाप का प्रायदिचत्त पूवंकाल में बिना कुछ खाये पीये एक स्थान पर बेठकर प्राण त्याग कर के किया जाता था, उसी को प्रायोपवेश कहा जाता है।

English

Caitra, Kaviruta,Krtanta, Ravi, Brhat, Guha, Nava and Subha 1: these nine are rememberd as the sons of Svarocisa Manu who established his race. They have been enumerated in the Purana. Such is the second Manvantara.

अध्याय ९२

श्लोक 11

रात्रौ जागरणं कुर्याद्दीपं देवस्य बोधयेत् ।घृतेन चैव राजेन्द्र शृणु तत्रास्ति यत्फलम्

rātrau jāgaraṇaṃ kuryāddīpaṃ devasya bodhayet / ghṛtena caiva rājendra śṛṇu tatrāsti yatphalam

हिन्दी अर्थ

भालुकिः कामहानिश्च जेमसिनिलोमिगायिनि: । कण्डुश्व कीहलश्चंव षडेते लाज्भला: स्मृताः ॥॥ ततो हिरण्पनाभस्य कृतशिष्यो नृपात्मजः । सो5करोच्च चतुविशत्संहिता द्विपदां बरः॥

English

The Seven Sages, Manu, Devas and Pitrs—these four constitute theroot (and foundation)of a Manvantara. All the subjects are subsidiary to them.

अध्याय ९२

श्लोक 12

मुच्यते पातकैः सर्वैर् अगम्यागमनोद्भवैः ।अभक्ष्यभक्षणोद्भूतैर् अपेयापेयजैर् अपि

mucyate pātakaiḥ sarvair agamyāgamanodbhavaiḥ / abhakṣyabhakṣaṇodbhūtair apeyāpeyajair api

हिन्दी अर्थ

राड्श्न मह॒वीय॑श्व पत्चमो वाहनस्तथा। तालकः पाण्डकश्चव कालिको राजिकस्तथा ॥। गोतमश्चाजबस्तश्च सोमराजा5पतत्ततः

English

Deities are the sons of Sages, Pitrs are the sons of Devas and the Sages are the sons of Devas—This is the conclusion of the Sastras (Scriptures).

अध्याय ९२

श्लोक 13

अवाह्यवाहिते यत्स्याद् अदोह्यादोहने यथा ।स्नानमात्रेण तस्यैवं यान्ति पापान्यनेकधा

avāhyavāhite yatsyād adohyādohane yathā / snānamātreṇa tasyaivaṃ yānti pāpānyanekadhā

हिन्दी अर्थ

पृष्टघ्नः परिक्ृष्श्च उलूखलक एवं च। यवीयसश्च वशालो अहगुलीयश्च कोशिकः सालिसञ्जरिसत्यश्च कापीयः कानिकश्च यः । पराशरश्च धर्मात्मा इति क्रान्तास्तु सामगाः

English

Ksatriyas and Vaisyas were born of Manu and Brahmanas were born of the Seven Sages. Thus the Manvan¬ tara has been described in brief, not in details.

अध्याय ९२

श्लोक 14

यमलोकं न वीक्षेत मनुजः स कदाचन ।पित्ःणां परमं गुह्यमिदं भूमौ नरेश्वर

yamalokaṃ na vīkṣeta manujaḥ sa kadācana / pitḥṇāṃ paramaṃ guhyamidaṃ bhūmau nareśvara

हिन्दी अर्थ

सामगानां तु सर्वेषां श्रेष्ठो द्वो तु प्रकीतितों । पौष्यजिश्च कृतिश्चव संहितानां विकल्पको ४८ अथर्वाणं द्विधा कृत्वा सुमन्तुरददाद्द्िजा: । कबन्धाय गुरु: कृत्स्तं स च विद्याद्यथाक्रमम्

English

The detailed description of the Svarocisa Manvantara should be understood through (thatof) Svayambhuva Manvan¬ tara. It is impossible to describe it in detail even in hundreds of years, since the progenies are many in every family and they are oft-repeated.

अध्याय ९२

श्लोक 15

ददताम् अक्षयं सर्वं यमहास्ये न संशयः ।अमावास्यां जितक्रोधो यस्तु पूजयते द्विजान्

dadatām akṣayaṃ sarvaṃ yamahāsye na saṃśayaḥ / amāvāsyāṃ jitakrodho yastu pūjayate dvijān

हिन्दी अर्थ

किया । है द्विजसत्तम ! चल, प्राचीन योग, सुराल और कुथुमि के शिष्य पाराशय ने छः संहिताओं का उपदेश किया । आसुरायण, वैशज्याख्य, वेदबुद्ध परायण, प्राचीन योगपुत्र, बुद्धिमान् पतब्जलि ये कुथुमि के शिष्य पाराशयं के छः भेद कहे गये हैं। लाज़रलि और श्ालिहोत्र ने छः छः संहिताओं का उपदेश किया ।४०-४२। भालुकि, कामहानि, जैमिनि, लोमगायिनि, कण्डु और कीहल“-ये छः लाज्ञल नाम से स्मरण किये जाते हैं। ये सब के सब लाजुूलि के द्िष्य हैं, जिन्होंने संहिताओं का प्रचार क्रिया । हिरण्यनाभ ने, जो राजा का पुत्र एवं अति उत्तम प्रकृति का मनुष्य था-- चौंबीस संहिताओं का प्रणयत किया और उन सब को अपने जिन शिष्यों को पढ़ाया, उन्हें सुनिये । राड, मह॒वीयें, पञुचम, वाहन, तालक, पाण्डक, कालिक, राजिक, गौतम, आजवस्त, सोमराज, पृष्ठन्न, परिकृष्ट, उलूखलक, यवीयस, वेशाल, अडगुलीय,

English

The Manvantara of Auttama is the third among the Manvantaras. 2 There are five Ganas. I shall recount them. Under¬ stand them.

अध्याय ९२

श्लोक 16

हिरण्यभूमिदानेन तिलदानेन भूयसा ।कृष्णाजिनप्रदानेन तिलधेनुप्रदानतः

hiraṇyabhūmidānena tiladānena bhūyasā / kṛṣṇājinapradānena tiladhenupradānataḥ

हिन्दी अर्थ

कौशिक, सालिमज्जरि, सत्य, कापीय, कानिक और पधर्मात्मा पराशर, ये सभी अतीत कालीन ऋषिगण सामवेद के उपदेशक थे ।४२०४७। समस्त सामवेदीय ऋषियों में पौष्यञ्जि और क्ृति-ये दो श्रेष्ठ कहे गये हैं, जो विविध संहिताओं के प्रवतंक थे । विप्रवुन्द ! आचाये सुमन्तु ने अथवेवेद के दो विभाग कर सब की कबन्ध नामक शिष्य को शिक्षा दी, अब क्रमशः उप्तका वर्णन सुनिये। कबन्ध ने पुनः उसके दो विभाग

English

The Devas are Sudhamans, Vasavartins, Pratardanas, Sivas, and Satyas. Each of these groups (< Ganas ) consists of twelve (Devas).

अध्याय ९२

श्लोक 17

विधानोक्तद्विजाग्र्याय ये प्रदास्यन्ति भक्तितः ।हयं वा कुंजरं वाथ धूर्वहौ सीरसंयुतौ

vidhānoktadvijāgryāya ye pradāsyanti bhaktitaḥ / hayaṃ vā kuṃjaraṃ vātha dhūrvahau sīrasaṃyutau

हिन्दी अर्थ

कबन्धस्तु द्विधा कृत्वा पथ्यायक पुनदंदो । द्वितीय वेदस्पर्शाय स चतुर्धाश्करोत्पुनः ३४५० मोदो ब्रह्मबलश्चेव पिप्पलादस्तथव च् । शौष्कायनिश्च धर्मज्ञश्चतुर्थस्तपनः स्मृतः॥ शौनकस्तु द्विधा कृत्वा ददावेक तु बच्रवे । द्वितीयां संहितां धीमान्सेन्धवायनसंजिते ५३ सेन्धवों मुञ्जकेशाय भिन्ना सा च द्विधा पुनः । नक्षत्रकल्पो बतानस्तृतीयः संहिताबिधि: ॥

English

The names of the twelve constituting Sudhamans are Satya, Dhrti, Dama, Danta, Ksama, Ksama, Dhrti (Dhvani— Bd.P.), Suci, Isa, Orjas, Jyestha and Vapusman the twelfth.

अध्याय ९२

श्लोक 18

कन्यां वसुमतीं गां च महिषीं वा पयस्विनीम् ।ददते ये नृपश्रेष्ठ नोपसर्पन्ति ते यमम्

kanyāṃ vasumatīṃ gāṃ ca mahiṣīṃ vā payasvinīm / dadate ye nṛpaśreṣṭha nopasarpanti te yamam

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठास्त्वथ्रणों हां ते संहितानां विकल्पना: । षट्शः कृत्वा मया5प्युक्तं पुराणसषिसत्तमाः

English

The Vamsakarin Devas (Vasavartins) were Sahasra- dhara, Visvatman, Samitara, Brhadvasu, Visvadha, ViSvakarma Manasvanta, Virad. Yasas, Jyotis, Vibhavya and Klrtiman.

अध्याय ९२

श्लोक 19

यमो ऽपि भवति प्रीतः प्रतिजन्म युधिष्ठिर ।यमस्य वाहो महिषो महिष्यस्तस्य मातरः

yamo 'pi bhavati prītaḥ pratijanma yudhiṣṭhira / yamasya vāho mahiṣo mahiṣyastasya mātaraḥ

हिन्दी अर्थ

आत्रयः सुमतिर्धो मान्काश्यपो ह्ाकृतन्नण: भारद्वाजोइस्निवर्चाश्व॒ वसिष्ठों मित्रयुभ्य यः ।। एते शिष्या मम ब्रह्मन्पुराणेषु दृढब्ताः। त्रिभिस्तित्नर: कृतास्तिस्र: संहिता: पुनरेव हि

English

Pramardana (Pratardana) gods are glorified. They

अध्याय ९२

श्लोक 20

तासां दानप्रभावेण यमः प्रीतो भवेद् ध्रुवम् ।नासौ यममवाप्नोति यदि पापैः समावृतः

tāsāṃ dānaprabhāveṇa yamaḥ prīto bhaved dhruvam / nāsau yamamavāpnoti yadi pāpaiḥ samāvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

काश्यपः संहिताकर्ता सावरणि: शांशपायन: । सामिका च चतुर्थों स्थात्सा चंबा पूवंसेहिता 0५८

English

As per A.

अध्याय ९२

श्लोक 21

एतस्मात् कारणाद् अत्र महिषीदानमुत्तमम् ।तस्याः शृङ्गे जलं कार्यं धूम्रवस्त्रानुवेष्टिता

etasmāt kāraṇād atra mahiṣīdānamuttamam / tasyāḥ śṛṅge jalaṃ kāryaṃ dhūmravastrānuveṣṭitā

हिन्दी अर्थ

किये, जिनमें से एक को पथ्य नामक शिष्य को तथा दूसरे को वेदस्पर्श नामक शिष्य को उपदेश दिया । तदनन्तर वेदस्पश ते उसके चार भाग किये ।४८-५०। मोद, ब्रह्मयल, पिप्पलाद तथा धर्मेज्ञ शौष्कायनि-- ये चार वेवस्पर्श के सुप्रसिद्ध शिष्य हैं जो सभी दृढ़ ब्रतधारी थे। पथ्य के उत्तम शिष्यों की संख्या तीन जानिये उनके जाजलि, कुमुदादि और शौनक नाम प्रसिद्ध हैं। विद्वात् शौनक ने दो विभाग कर एक संहिता को बशन्नू को दिया और दूसरी को सैन्धवायन नामक शिष्य को समपित किया । सेन्धव ने मुझ्जकेश को उपदेश दिया, जिसके द्वारा वह पुनः दो भागों में विभक्त हुई। प्रथम नक्षत्रकल्प, द्वितीय बेतान, तृतीय संहिता- विधि, चतुर्थ अज्िरस कल्प तथा पंचम झ्ान्तिकल्प हैं ।११-५४। अथवंवेद की संहिताओं के ये विकल्प श्रेष्ठ माने गये हैं। है ऋषिवध्य॑वृुन्द ! मैंने भी पुराणों का छः प्रकार के विभागों में उपदेश किया हैं। अत्रि

English

Verses 23-36 describe the Auttama or Uttama's Manvantara. As noted in v. 36 the activities of creation etc. are the same as in the previous Man¬ vantara.

अध्याय ९२

श्लोक 22

आयसस्य खुराः कार्यास् ताम्रपृष्ठाः सुभूषिताः ।लवणाचलं पूर्वस्यामाग्नेय्यां गुडपर्वतम्

āyasasya khurāḥ kāryās tāmrapṛṣṭhāḥ subhūṣitāḥ / lavaṇācalaṃ pūrvasyāmāgneyyāṃ guḍaparvatam

हिन्दी अर्थ

गोन्नोत्पन्त बुद्धिमान सुमति, कश्यपगोत्रीय अक्लतन्नण, अग्नि के समात तेजस्वी भरद्वाज, वशिष्ठ मित्रयु, सावर्णि सोमदत्ति और सुशर्मा शांशपायन हैं ! है विप्रवुन्द । ये हमारे पुराणों में शिष्य हैं, जों सब के सब दृढ़ ब्रतधारी हैं। इनमें से तीन शिष्यों ने संहिता के तीन विभागकर पुनः तीन भाग किये, जो संहिताकर्ता काइयप, सार्वाण और शांशपायन के नाम से प्रसिद्ध हैं। सामिका नामक चौंथी संहिता है जो पूर्व संहिता

English

The reading anyanaradhito dtvo c God not worshipped by others' is mean¬ ingless, as this is a list of Pratardana gods.— c Pramardana * in the text is an

अध्याय ९२

श्लोक 23

कार्पासं याम्यभागं तु नवनीतं तु नैरृते ।पश्चिमे सप्तधान्यानि वायव्ये तंदुलाः स्मृताः

kārpāsaṃ yāmyabhāgaṃ tu navanītaṃ tu nairṛte / paścime saptadhānyāni vāyavye taṃdulāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

के नाम से विख्यात है ।५५-५८। ये सभी संहिताएँ चार-चार पादों वाली एवं एक अर्थ को वाचिका हैं । सर्वास्ता हि चतुष्पादाः सर्वाश्वेकार्थवाचिका: । पाठान्तरे पृथर्भुता वेदशाखा यथा तथा ॥

English

Understand the names of those constituting the Satya category of Devas, as agreed (by sages of yore). They are Dikpati, Vakpati, Visva, Sarnbhu, Svamrdika, Adhi- pa, Varcodhas, Muhyasarvas'a (?), Vasava, Sadasva, Ksema and Ananda. These are those sacrifice-worthy other twelve (Devas) famous as Satyas. These are the deities who lived in the Manvantara of Auttama.

अध्याय ९२

श्लोक 24

सौम्ये तु काञ्चनं दद्याद् ईशाने घृतमेव च ।प्रदद्याद्यमराजो मे प्रीयतामित्युदीरयन्

saumye tu kāñcanaṃ dadyād īśāne ghṛtameva ca / pradadyādyamarājo me prīyatāmityudīrayan

हिन्दी अर्थ

चतुःसाहसनिकाः सर्वाः शांशपायनिकासृते द ५६ लोमहर्षणिका मूलास्ततः काश्यपिकाः पराः । सावरणिकास्तृतीयास्ता यजूवक्यार्थेपण्डिला:.

English

Aja, Parasu, Divya, Divyausadhi, Naya, the un¬ equalled Devanuja, Mahotsaha, Ausija, Vinlta, Suketu, Sumitra, Subala and Suci—these thirteen were the noble-souled sons of the Manu Auttama. These were the progenitors of the race of Ksatriyas and made them flourish. Such is the third Manvan- tara.

अध्याय ९२

श्लोक 25

इत्युच्चार्य द्विजस्याग्रे यमलोकं महाभयम् ।असिपत्त्रवनं घोरं यमचुल्ली सुदारुणा

ityuccārya dvijasyāgre yamalokaṃ mahābhayam / asipattravanaṃ ghoraṃ yamacullī sudāruṇā

हिन्दी अर्थ

एता: पत्चदशान्वाश्च दशान्या दशभिस्तथा। वालखिल्याः सहप्रेषा: ससावर्णा: प्रकीतिताः. सप्राम्यारण्पक तत्स्यात्समन्त्रकरणं तथा । अतः परं कथानां तु पूर्वा इति विशेषणम् ६५

English

The activity of creation etc. in the course of the Auttama Manvantara has been explained through (that of) Svarocisa Manvantara. Now listen and understand the creation etc. in the Tamasa Manvantara in detail and in the proper order.

अध्याय ९२

श्लोक 26

रौद्रा वैतरणी चैव कुम्भीपाको भयावहः ।कालसूत्रो महाभीमस् तथा यमलपर्वतौ

raudrā vaitaraṇī caiva kumbhīpāko bhayāvahaḥ / kālasūtro mahābhīmas tathā yamalaparvatau

हिन्दी अर्थ

दे सहन शते न्‍्यूंने वेदे वाजसनेयके ऋग्गणः परिसंख्यातो ब्राह्मण तु चतुर्गुणम्

English

In the fourth period of Manvantara * 1 2 of the Manu Tamasa, the Ganas were four, viz. Satyas, Svarupas, Sudhls and Haris.

अध्याय ९२

श्लोक 27

क्रकचं तैलयन्त्रं च श्वानो गृध्राः सुदारुणाः ।निरुच्छ्वासा महानादा भैरवो रौरवस्तथा

krakacaṃ tailayantraṃ ca śvāno gṛdhrāḥ sudāruṇāḥ / nirucchvāsā mahānādā bhairavo rauravastathā

हिन्दी अर्थ

वेद शाखाओं की भाँति पाठास्तर में भिन्‍न-भिन्‍न हैं। शांशपायन की संहिता को छोड़कर इत सब की संख्या चार सहख्र है। इन समस्त वेद शाखाओं में लोमहषंण की शाखा ही मुख्य है, उसके बाद कश्यप की शाखा की महत्ता मानी गई है, सावणिक शाखा का तृतीय स्थान है, ये शाखाएँ यजुर्वेद की हैं जिन्हें उसके पण्डित लोग जानते हैं ।५६-६०। इनके अतिरिक्त जो शांशपायन की शाखा है वह प्रेरणात्मक अर्थ से विभूषित है, उसकी ऋचाओं की संख्या आठ सहस्न छः सौ है। ये समस्त संहिताएँ, इसके अतिरिक्त परन्द्रह यथा दस-दस संहिताएँ, जो बालखिल्य सहप्रेष एवं सार्वाण की संहिताओं के नाम से कही गई हैं, आठ सहस्न॒ साम, चौदह सहस्र साममंत्र हवनमंत्र समेत आरण्यक--इन सब को साम के गायत करने वाले ऋषि लोग गाते हैं । इसके अति- रिक्त व्यासदेव ने यजुः और ब्राह्मण के बारह सहस्न छन्दों का विभाग किया, जो ग्राम्य एवं आरण्यक संहिताओं

English

In the Manvantara of Tamasa, the gardsons of Pulastya (manifested themselves). Each of these Devaganas consisted of twentyfive (gods). If Vitta, Kratu and Rathormi from the readings in Bd. P. is accepted, the list will have twelve names (the expected number of this group of Devas).

अध्याय ९२

श्लोक 28

एते घोरा याम्यलोके श्रूयन्ते द्विजसत्तम ।त्वत्प्रसादेन ते सोम्यास्तीर्थस्यास्य प्रभावतः

ete ghorā yāmyaloke śrūyante dvijasattama / tvatprasādena te somyāstīrthasyāsya prabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

एवं मंत्रकरणक के साथ आध्वयंव के नाम से स्मरण किये जाते हैँ । इसके उपरान्त कथाओं का पूर्वा यह विशेषण कहा जाता है ।६१-६५। ऋक्, ब्राह्मण और यजु ये तीन मंत्रों के साथ ग्राम्य और आरण्य के नाम से स्मरण किये जाते हैं। हारिद्रवीय के खिल उपखिल तथा तैत्तिरीय के पर और क्षुद्र भाग भी दो-दो प्रकार के स्मरण किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त दो सहस्न में एक सो कम वाजसनेयी संहिता की ऋचाओं

English

Verses 37-43 deal with Tamasa Manvantara.

अध्याय ९२

श्लोक 29

दानस्यास्य प्रभावेण यमराजप्रसादतः ।नरके ऽहं न यास्यामि द्विज जन्मनि जन्मनि

dānasyāsya prabhāveṇa yamarājaprasādataḥ / narake 'haṃ na yāsyāmi dvija janmani janmani

हिन्दी अर्थ

को तथा उसके चतग्रणित ब्राह्मण को परिगणित किया। आठ सहस्॒ आठ सौ अस्सी थजु ओर ऋक की एतावदधिक तेषां यजुः कार्म विवक्ष्यति ६९ एकादश सहस्नाणि दश चान्‍्या दशोत्तरा: । ऋचां दश सहल्नाणि अशीतित्रिशतानि च

English

The hundred Indriyas (sense-organs) and the eighth Tamas (Darkness) which the top-most sages who value truth as life, enunciate, are remembered as the Devas in that Manvan- tara. Sibi the lord of (great) exploit, was the Indra of those Devas. O excellent ones, understand the seven sages of that Manvantara.

अध्याय ९२

श्लोक 30

यमहास्यस्य चाख्यानम् इदं शृण्वन्ति ये नराः ।ते ऽपि पापविनिर्मुक्ता न पश्यन्ति यमालयम्

yamahāsyasya cākhyānam idaṃ śṛṇvanti ye narāḥ / te 'pi pāpavinirmuktā na paśyanti yamālayam

हिन्दी अर्थ

कर्तारश्चेब शाखानां भेदे हेतुस्तथेव च। सर्वेमन्वन्तरेष्बेबं शाखाभेदाः समा: स्मृताः ७४ प्राजापत्या श्रुतिनित्या तद्विकल्पास्त्विमे स्मृता: । अनित्यभावाहेवानां मन्त्रोत्पत्ति: पुनः पुनः

English

Harsa, the son of Kavi; Pfthu, the son of Kasyapa; Agni, the son of Atri; Jyotirdhaman, the son of Bhrgu; Vanapltha, the son of Pulaha, Gotra, the son ofVasistha; and Caitra, the son ofPulastya were the (seven) sages in theTamasa Manvan¬ tara.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 92
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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