Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
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अध्याय 91 / 232

Adhyaya 91

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अध्याय ९१

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे जलशायितीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम नवतितमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ९१ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल तीर्थपरमपावनम् ।चण्डादित्यं नृपश्रेष्ठ स्थापितं चण्डमुण्डयोः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe jalaśāyitīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma navatitamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 91 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla tīrthaparamapāvanam / caṇḍādityaṃ nṛpaśreṣṭha sthāpitaṃ caṇḍamuṇḍayoḥ

हिन्दी अर्थ

ही केवल एकमात्र उनकी शिक्षा से बच रहे । वे भी यजुर्वेद की छियासी संहिताओं की रचना करनेवाले हुये । इसके अतिरिक्त उनके सभो शिष्यगणों में भी तीन भेद कहे जाते हैं। इस प्रकार नव भेद युक्त संहिता के उदीच्य (उत्तरी) मध्यदेशीय और प्राच्य (पूर्वीय) ये तीन प्रमुख भेद कहे गये हैं। उनमें से उत्तर देसवासियों में ब्यामायनि, मध्यदेशवासियों में आरुणि और त्रयोदह्य्रादि, पूर्वीय देशवासियों में आलम्बि प्रधान माने गये

English

In all the changes of Manvantaras that have been functioning for a long time, the world of living beings does not remain (the same) even for a moment. Due to the nature of destiny, it (the world) undergoes changes by way of decrease or increase.

अध्याय ९१

श्लोक 2

आस्तां पुरा महादैत्यौ चण्डमुण्डौ सुदारुणौ ।नर्मदातीरमाश्रित्य चेरतुर् विपुलं तपः

āstāṃ purā mahādaityau caṇḍamuṇḍau sudāruṇau / narmadātīramāśritya ceratur vipulaṃ tapaḥ

हिन्दी अर्थ

हैं ।६-९। वे सभी संहिताओं के जानने वाले द्विज गण चरक नाम से प्रसिद्ध हैं। ऋषियों ने इस प्रकार सूत की बातें सुन कर जिज्ञासा प्रकट की किये अध्वर्युगण किस कारण चरक नाम से पुकारे जाते हैं। इसका वास्तविक कारण हमें बतलाइये कि इन्होंने ऐसे कौन से आचरण किये थे, जिसके कारण चरकत्व की प्राप्ति हुई। ऋषियों के इस प्रकार पूछने पर सूत ने बहु कथा बतलाई जिस प्रकार उन्हें चरकत्व की प्राप्ति के आषेत्वादेकवचनम्

English

It is highly meritorious to eulogise the lords born

अध्याय ९१

श्लोक 3

ध्यायन्तौ भास्करं देवं तमोनाशं जगत्त्रये ।तुष्टस्तत्तपसा देवः सहस्रांशुरुवाच ह

dhyāyantau bhāskaraṃ devaṃ tamonāśaṃ jagattraye / tuṣṭastattapasā devaḥ sahasrāṃśuruvāca ha

हिन्दी अर्थ

कार्यमासीदूषीणां च किचिद्ब्राह्मणसत्तमा: । सेरुपृष्ठं तदा गत्वा सम्पत्त्यर्थ तु मस्त्रितम्

English

It is conducive to the attainment of heaven. It is very holy, highly esoteric, capable of granting progeny. It should be recited during great parvan days. It is conducive to the removal of the effects of bad dreams and is conducive to longevity.

अध्याय ९१

श्लोक 4

साधु साध्विति तौ पार्थ नर्मदायाः शुभे तटे ।वरं प्रार्थयतं वीरौ यथेष्टं चेतसेच्छितम्

sādhu sādhviti tau pārtha narmadāyāḥ śubhe taṭe / varaṃ prārthayataṃ vīrau yatheṣṭaṃ cetasecchitam

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणानां तु बजनादब्रह्मवध्यां चकार सः । शिष्यानथ समानीय स वेशम्पायनो5ब्रबीत् १५ ब्रह्मवध्यां चरध्वं वे सत्कृते द्विजसत्तमाः सर्वे यूयं समागम्य ब्रूत सेतद्धितं बचः १६ एवमुक्तस्ततः कद्धों याज्ञवल्क्यमथात्रवीत् । उवाच यक्त्वया5धीत॑ सर्वे प्रत्यपंयस्व से १८ एवमुक्तः स रूपाणि यजुंषि प्रददो गुरोः। रुघिरेण तथाक्तानि छरदित्वा ब्रह्मवित्तमाः ११६

English

Resort to the great principle Sumahesa for attaining Siddhis. Resort to this Purana which contains the narratives of Prajapatis, Devas, Sages, the well-known yet sacred origination of the unborn Lord and for the fulfilment of my narration.

अध्याय ९१

श्लोक 5

चण्डमुण्डावूचतुः ।अजेयौ सर्वदेवानां भूयास्वावां समाहितौ ।सर्वरोगैः परित्यक्तौ सर्वकालं दिवाकर

caṇḍamuṇḍāvūcatuḥ / ajeyau sarvadevānāṃ bhūyāsvāvāṃ samāhitau / sarvarogaiḥ parityaktau sarvakālaṃ divākara

हिन्दी अर्थ

खूत ने कहा--ब्राह्मणश्रेष्टवृन्द ! प्राचीन काल में एक समय ऋषियों को कोई एक ऐसा कार्य आ पडा जिसमें सुमेरु पर्वत पर जाकर वे सब सम्पत्ति के लिये उपस्थित हुयें थे। उस समय उन्होंने यह् प्रण॑ किया था कि जो ब्राह्मण सात रात के बीच में हमारी इस मन्त्रणा में सहयोग देने के लिये नहीं आ जाता है वह ब्रह्महत्या का पाप ग्रहण करेगा, ऐसी हम लोगों की प्रतिज्ञा है। ऋषियों की ऐसी प्रतिज्ञा सुतकर सभी

English

Thus I have described the Svayambhuva Manvantara in detail and in the proper order. What more shall I describe to you?

अध्याय ९१

श्लोक 6

एवमस्त्विति तौ प्राह भास्करो वारितस्करः ।इत्युक्त्वान्तर्दधे भानुर्दैत्याभ्यां तत्र भास्करः

evamastviti tau prāha bhāskaro vāritaskaraḥ / ityuktvāntardadhe bhānurdaityābhyāṃ tatra bhāskaraḥ

हिन्दी अर्थ

ऋषिमुनि अपने-अपने दिष्यादि को साथ ले लेकर वहीं उपस्थित हुये, जहाँ पहुँचने के लिये प्रतिज्ञा की गई थी केवल वैशम्पायन ऋषि वहाँ नहीं गये ।१२-१४। और इस प्रकार समान ब्र।ह्ाणों के बचनानुसार वे ब्रह्महत्या के भागी हुये । वेशम्पायल ने उस अवसर पर अपने शिथ्यों को बुलाकर कहा-+द्विजवयव॒न्द तुम सब लोग मिलकर मेरे लिये इस ब्रद्माहत्या के पाप का भोग करो, कहो, क्या यह मेरी बात हितकर नहीं है याज्षवलक््य बोले--“मैं इस ब्रह्महत्या का अनुभव करूँगा ये मुनिगण आपके साथ ही रहें । अपनी तपस्या द्वारा पराक्रम संचय करके मैं उसका अनुभव करने में समर्थ होऊंगा ।”” याज्ञवल्क्य के ऐसा कहने पर वैशम्पायन ने क्रद्व होकर उनसे कहा- तुमने जो कुछ मुझसे अंध्ययन किया है वह सब लौटा दो

English

I wish to know precisely the order of Manvantaras 1 and all the respective deities pertaining to the different Manvan¬ taras.

अध्याय ९१

श्लोक 7

स्थापितः परया भक्त्या तं गच्छेदात्मसिद्धये ।गीर्वाणांश्च मनुष्यांश्च पित्ःंस् तत्रापि तर्पयेत्

sthāpitaḥ parayā bhaktyā taṃ gacchedātmasiddhaye / gīrvāṇāṃśca manuṣyāṃśca pitḥṃs tatrāpi tarpayet

हिन्दी अर्थ

बेशम्पायन के इस प्रकार कहने पर ब्रह्मज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ मुनिव॒र याज्ञवल्क्य ने वन द्वारा रुधिर से भींगे हुये समस्त यजुर्वेद को मूते रूप में गुरु के सम्मुख प्रत्यंपेण कर दिया । ह्विजवुन्द ! तदनन्तर याज्ञवल्क्य मुनि ने ध्यान लगाकर सूर्य की आराधना की, उस समय आकाश मण्डल में जितने ऊपर जाकर सूर्य रूप ब्रह्म

English

Listen to and understand as I recount succinctly and in detail, the Manvantaras which have gone and which are yet to come.

अध्याय ९१

श्लोक 8

स वसेद् भास्करे लोके विरिञ्चिदिवसं नृप ।घृतेन बोधयेद्दीपं षष्ठ्यां स च नरेश्वर ।मुच्यते सर्वपापैस्तु प्रतियाति पुरं रवेः

sa vased bhāskare loke viriñcidivasaṃ nṛpa / ghṛtena bodhayeddīpaṃ ṣaṣṭhyāṃ sa ca nareśvara / mucyate sarvapāpaistu pratiyāti puraṃ raveḥ

हिन्दी अर्थ

ततो यानि गतास्यूध्व॑ यजुंष्यादित्यमण्डलम् । तानि तस्मे ददौ तुष्ठः सूर्यो वे ब्रह्मरातये ॥ प्जूध्यधीयन्ते यात्रि ब्राह्मणा येन केन च । अश्वरूपाय दत्तानि ततस्ते बाजिनोउभवन् २२ ब्रह्महत्या तु येश्चीर्णा चरणाच्चरका: स्पृता: । वेशम्पायनशिष्यास्ते चरका: समुदाहताः

English

The first Manu was Svayambhuva and then there was Svarocisa Manu. Thereafter the Manus wereAuttama, Tamasa, They arc the five Savarnas, Raucya, Bhautya and Vai- vasvata. I shall explain them after Vaivasvata Manu.

अध्याय ९१

श्लोक 9

उत्पत्तिं चण्डभानोर्यः शृणोति भरतर्षभ ।विजयी स सदा नूनमाधिव्याधिविवर्जितः

utpattiṃ caṇḍabhānoryaḥ śṛṇoti bharatarṣabha / vijayī sa sadā nūnamādhivyādhivivarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

इत्येते चरकाः प्रोक्ता बाजिनस्तान्निबोधत । याज्ञवल्क्यस्य शिष्पास्ते कण्ववेधेयशालिनः (२४

English

Know the five Manus who have passed away to be Manavas. The Manvantara of Svayambhuva Manu which lias already passed has been described by me.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 91
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.