अध्याय ३१
श्लोक 1
स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः सहस्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात् ।स भूमि॑ᳪ स॒र्वत॑ स्पृ॒त्वाऽत्य॑तिष्ठद्दशाङ्गु॒॒लम्
sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt | sa bhūmi sarvata spṛtvā'tyatiṣṭhaddaśāṅgulam
हिन्दी अर्थ
१. वे प्रभु अनन्त सिरो, ओंखों व पोँवोंवाले हे। २. इस ब्रह्माण्ड को आवृत करके इसकी रक्षा कर रहे है ओर इसके अन्दर निवास कर रहे हेँ। ३. वे प्रभु इस दशांगुल पुरुषऽ एवेद ःसर्व यद् भूतं यच्च॑ भाव्यम्। उतामुंतत्वस्येशानो यदत्र नातिरोहं ति।।२॥ १. इस संसार में जन्म के दृष्टिकोण से जीव तीन भागों में विभक्त है (क) प्रथम
English
com The Texts of the White Yajurveda, tr. Ralph T.H. Griffith, [1899], BOOK THE THIRTY-FIRST. PURUSHA hath a thousand heads, a thousand eyes, a thousand feet. Pervading earth on every side he fills a space ten fingers broad.