अध्याय ३८
श्लोक 1
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम् ।आ द॒देऽदि॑त्यै॒ रास्ना॑ऽसि
devasya tvā savituḥ prasave'śvinorbāhubhyāṃ pūṣṇo hastābhyām | ā dade'dityai rāsnā'si
हिन्दी अर्थ
पत्नी के अन्द्र ये गुण होने चादि : (क) समङ्दारी, (ख) यज्लियवृत्ति, गतमन्त्र के विषय को अधिक स्पष्ट करते हुए कहते है कि ९. है पत्नि! तू अदित्यै स्वास्थ्य के लिए रास्ना=-कमरवबन्ध (हपतकसम) असि=है। पत्नी ‹ धर्मपत्नी" है। वह पति का यज्ञो से संयोग करनेवाली है, स्वयं यक्ञियवृक्तिवाली होती हु पति के
English
com The Texts of the White Yajurveda, tr. Ralph T.H. Griffith, [1899], BOOK THE THIRTY-EIGHTH. BY impulse of God Savitar I take thee with arms of Asvins, with the Hands of Pûshan. A zone for Aditi art thou.