अध्याय ३९
श्लोक 1
स्वाहा॑ प्रा॒णेभ्य॒: साधि॑पतिकेभ्यः । पृ॒थि॒व्यै स्वाहा॒ ऽग्नये॒ स्वाहा॒ ऽन्तरि॑क्षाय॒ स्वाहा॑ वा॒यवे॒ स्वाहा॑ ।दि॒वे स्वाहा॒ सूर्या॑य॒ स्वाहा॑
svāhā prāṇebhya: sādhipatikebhyaḥ | pṛthivyai svāhā 'gnaye svāhā 'ntarikṣāya svāhā vāyave svāhā | dive svāhā sūryāya svāhā
हिन्दी अर्थ
हम अपने अन्तिमि समय (०) ५८० ४८) मनसहित प्राणो, अग्निसहित पृथिवी, वायुसहित अन्तरिक्ष तथा सूर्यसहित द्युलोक का धन्यवाद करते हुए इनसे विदा लै। १. दिग्भ्यः स्वाहा=इन दिशाओं के लिए मेँ धन्यवाद करता हूँ। इस "प्राची" ने मुल (प्रआञ्च) आगे बद्ने का पाठ पाया था तो "दक्षिण ने दाक्षिण्य का उपदेश दिया,
English
com The Texts of the White Yajurveda, tr. Ralph T.H. Griffith, [1899], BOOK THE THIRTY-NINTH. SVÂHÂ to the Vital Breathings with their Controlling Lord! To Earth Svâhâ! To Agni Svâhâ! To Firmament, Svâhâ! To Vâyu Svâhâ! To Sky Svâhâ! To Sûrya Svâhâ!