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अध्याय 13 · सहज सुख
अष्टावक्र गीता, श्लोक 13.3
सत्यापित
मूल संस्कृत
कृतं किमपि नैव स्यादिति सञ्चिन्त्य तत्त्वतः । यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम् ॥ ३ ॥
IAST लिप्यंतरण
kṛtaṃ kim api naiva syād iti sañcintya tattvataḥ | yadā yat kartum āyāti tat kṛtvāse yathāsukham || 3 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
कृतम्, किम्, अपि, न, एव, स्यात्, इति, सञ्चिन्त्य, तत्त्वतः, यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तत्, कृत्वा, आसे, यथासुखम्
- तत्त्वतः
- तत्त्व दृष्टि से विचार करने पर
- किम् अपि कृतम् न एव स्यात्
- शुद्ध आत्मा द्वारा कुछ भी किया नहीं जाता (आत्मा अकर्ता है)
- इति सञ्चिन्त्य
- ऐसा भली-भाँति समझकर
- यदा
- जब
- यत् कर्तुम् आयाति
- जो कर्तव्य स्वाभाविक रूप से सामने आ जाता है
- तत् कृत्वा
- उसे अनासक्त भाव से पूरा करके
- यथासुखम् आसे
- मैं सुखपूर्वक स्थित रहता हूँ
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
तत्त्वतः विचार करने पर आत्मा द्वारा कुछ भी किया हुआ नहीं है; ऐसा जानकर जब जो कार्य सामने आता है, उसे करके मैं सुखपूर्वक रहता हूँ।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक कर्मयोग और ज्ञाननिष्ठा का अद्भुत समन्वय है। राजा जनक कहते हैं कि परमार्थ दृष्टि से आत्मा सदा अकर्ता और निर्लेप है। इसलिए न तो वे भविष्य के कर्मों की कोई अहंकारी योजना बनाते हैं और न आए हुए कर्तव्य से मुँह मोड़ते हैं। प्रारब्धवश जो कर्म उनके सामने आता है, उसे दर्पण की तरह बिना लिप्त हुए करते हैं और अपने आत्म-सुख में स्थित रहते हैं।
सरल हिन्दी में समझें
यह श्लोक कर्म करने की सबसे सुंदर और व्यावहारिक कला सिखाता है।
अक्सर हम काम करने से पहले ही चिंताओं का पहाड़ बना लेते हैं—"यह कैसे होगा, उसका क्या फल मिलेगा।" या फिर काम से भागने की कोशिश करते हैं।
राजा जनक कहते हैं कि गहराई से देखें तो आत्मा कुछ नहीं करती, वह केवल सब कुछ देखने वाली है। इसलिए जब जो काम सामने आता है, उसे शांति से पूरा कर लेते हैं और अपने भीतर की खुशी में मग्न रहते हैं। यह न तो आलस्य है और न ही तनाव भरी भागदौड़।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. परमार्थ स्तर पर आत्मा की अकर्तृत्व सत्ता और व्यवहार में स्वाभाविक कर्म का समन्वय। 2. यदा यत्कर्तुमायाति गीता के यदृच्छालाभसन्तुष्ट के सिद्धांत का साक्षात प्रतिपादन है। 3. यह कर्म के प्रति द्वेष या पलायनवाद का पूरी तरह खंडन करता है। 4. अनासक्त भाव से कर्तव्य निभाने पर कोई कर्म-बंधन या मानसिक तनाव नहीं बनता। 5. ज्ञानी कर्म का भार अपने सिर पर नहीं लेता, बल्कि उसे सहज घटित होने देता है। 6. यह राजकाज और पारिवारिक जीवन में स्थित गृहस्थ के लिए सबसे उत्कृष्ट जीवन-सूत्र है।
उदाहरण से समझें: जैसे आईना अपने सामने आने वाली हर वस्तु को पूरी स्पष्टता से दिखाता है और उसके हटते ही खाली और अप्रभावित रहता है, वैसे ही ज्ञानी प्राप्त कर्म को पूरा करता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक कार्यस्थल पर जब कोई व्यक्ति बिना किसी व्यक्तिगत ईर्ष्या या घबराहट के अपने सामने आए प्रोजेक्ट को पूरी निष्ठा से करता है और परिणाम आने पर शांत रहता है, तो वह जनक के इस सूत्र को जी रहा होता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: भविष्य के कर्मों की चिंता छोड़िए; जो कर्तव्य इस क्षण सामने आए उसे निष्काम भाव से कीजिए और शांत रहिए।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति अपनी नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी करे या मनमाना अनुचित आचरण करे।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जो भी काम आपके सामने आए, उसे बिना शिकायत और बिना अहंकार के पूरे ध्यान से करें, और पूरा होते ही मानसिक रूप से मुक्त हो जाएँ। (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं वर्तमान में सामने आए काम को करने के बजाय भविष्य की योजनाओं या पुरानी गलतियों के मानसिक तनाव में जी रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: काम शुरू करने से पहले एक गहरी सांस लें और कहें: "यह कार्य वर्तमान की मांग है, मैं इसे पूरी निष्ठा से करूँगा पर परिणाम का बोझ नहीं उठाऊँगा।"
एक पंक्ति में सार: आत्मा को अकर्ता जानकर जो कर्तव्य सामने आए उसे सहजता से करके मैं सुखपूर्वक स्थित रहता हूँ।
English
Translation: Reflecting truly that nothing is ever done by the Self, whenever anything comes to be done, having done it I abide in ease.
Simple explanation: Janaka integrates action with pure wisdom: knowing that the witnessing Self remains forever unattached, he performs whatever duty presents itself naturally without anxiety, resting in spontaneous joy.
विषय और संबंधित श्लोक
- अकर्ता भाव
- सहज कर्म
- प्रारब्ध
- यथासुखम्
- श्लोक 11.1: भावाभावविकारश्च स्वभावान्नेति।
- श्लोक 13.4: कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावाः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। जनक का प्रसिद्ध कर्म-सूत्र।