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प्रकरण 13: तेरहवाँ प्रकरणश्लोक ४/७57%

अध्याय 13 · सहज सुख

अष्टावक्र गीता, श्लोक 13.4

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनः । संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम् ॥ ४ ॥

IAST लिप्यंतरण

karmanaiṣkarmyanirbandhabhāvā dehasthayoginaḥ | saṃyogāyogavirahād aham āse yathāsukham || 4 ||

सरल उच्चारण: karmanaishkarmyanirbandhabhaavaa dehasthayoginah samyogaayogavirahaad aham aase yathaasukham (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

कर्म-नैष्कर्म्य-निर्बन्ध-भावाः, देहस्थ-योगिनः, संयोग-अयोग-विरहात्, अहम्, आसे, यथासुखम्

देहस्थ-योगिनः
स्वयं को शरीर मानने वाले साधक
कर्म-नैष्कर्म्य-निर्बन्ध-भावाः
कर्म करने अथवा कर्म छोड़ने के हठ और नियमों में बँधे रहते हैं
संयोग-अयोग-विरहात्
संग और असंग के बंधनों और आग्रहों से मुक्त होने के कारण
अहम्
मैं
यथासुखम् आसे
सहज सुखपूर्वक अपने स्वरूप में स्थित हूँ

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

देहाभिमानी योगीजन कर्म करने या कर्म छोड़ने के नियमों से बँधे रहते हैं; किंतु संग और वियोग के आग्रह से रहित होकर मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: जो साधक स्वयं को देह के साथ जोड़कर देखते हैं, वे हमेशा इस उलझन में रहते हैं कि ‘मुझे यह नियमपूर्वक करना चाहिए’ या ‘मुझे सब कर्म त्यागकर गुफा में बैठना चाहिए’। वे कर्म और नैष्कर्म्य के नियमों के दास बन जाते हैं। राजा जनक कहते हैं कि आत्मज्ञानी देह-भाव से ऊपर उठ चुका है, इसलिए उसके लिए न तो किसी से जुड़ने की आसक्ति है और न जबरन दूर भागने का डर। वह पूर्णतः मुक्त है।

सरल हिन्दी में समझें

इस श्लोक में राजा जनक साधकों की एक बहुत आम भूल की ओर इशारा करते हैं।

बहुत से लोग साधना में इतने नियम और हठ बना लेते हैं कि वे दिन-रात इसी तनाव में रहते हैं कि "अगर मैंने यह नियम तोड़ा तो पाप लगेगा, या अगर मैं एकांत में नहीं गया तो अशांति होगी।" वे कर्म और अकर्म दोनों के कैदी बन जाते हैं।

जनक कहते हैं कि जब आपको पता चल जाए कि आप शरीर नहीं, शुद्ध चेतना हैं, तो मिलने और बिछड़ने का डर खत्म हो जाता है। तब आप हर माहौल में सहज और खुश रहते हैं।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. देहस्थ-योगिनः पद देहाभिमान से बंधी हुई अपूर्ण साधना की सीमा को रेखांकित करता है। 2. कर्म करने का आग्रह और कर्म से भागने का हठ, दोनों ही अहंता के रूप हैं। 3. संयोगायोगविरहात् का अर्थ है न किसी अनुकूल परिस्थिति से चिपकना और न प्रतिकूल से घृणा करना। 4. वास्तविक नैष्कर्म्य कर्म छोड़ने में नहीं, बल्कि कर्तापन के अहम् से मुक्त होने में है। 5. यह श्लोक साधक को संकीर्ण धार्मिक आग्रहों से ऊपर उठाकर सार्वभौमिक अद्वैत में स्थापित करता है। 6. ज्ञानी लोक-संग्रह के लिए कर्म करता हुआ भी वास्तव में पूर्ण अकर्ता रहता है।

उदाहरण से समझें: जैसे आकाश में बादलों का समूह आता है और चला जाता है, पर आकाश न तो बादलों से जुड़ता है और न उनके हटने का शोक मनाता है, वैसे ही ज्ञानी संयोग और वियोग से अप्रभावित रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

आधुनिक जीवन में लोग अक्सर ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ के नियमों की इतनी सख्त सूचियाँ बना लेते हैं कि नियम का ज़रा-सा टूटना उन्हें भारी तनाव में डाल देता है; जनक का दृष्टिकोण परिस्थितियों के साथ सहज और लचीला होना सिखाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: नियमों के संकीर्ण हठ में मत उलझिए; संग और असंग के पार अपनी मुक्त चेतना को पहचानिए।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावाः’ का अर्थ समाज में आवश्यक आचार-विचार और कानून की अवहेलना करना कतई नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: यदि आज आपकी कोई बनाई हुई योजना या दिनचर्या बिगड़ जाए, तो चिढ़ने के बजाय मुस्कुराकर सहजता से परिस्थिति को स्वीकार करें। (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने बनाए नियमों का इतना गुलाम बन गया हूँ कि उनका थोड़ा-सा बदलना भी मुझे क्रोधित कर देता है?

छोटा अभ्यास: मन में विचार करें: "परिस्थितियाँ आएँगी और जाएँगी, पर मैं साक्षी की तरह उनसे परे और अछूता हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: कर्म और अकर्म के आग्रहों से परे होकर, संयोग और वियोग के भय से मुक्त मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ।

English

Translation: Yogis bound to bodily identity are chained to rules of action and non-action; free from union and separation, I abide in ease.

Simple explanation: King Janaka clarifies that those tied to body-consciousness remain trapped in rigid rules of doing versus abstaining. Free from grasping attachment and fearful avoidance, the sage lives in tranquil ease.

विषय और संबंधित श्लोक

  • नैष्कर्म्य
  • देहाध्यास-मुक्ति
  • संयोग-वियोग
  • यथासुखम्
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 12.6: अकर्मण्यापि मन्दधीः।
  • श्लोक 13.5: अर्थानर्थौ न मे स्थित्या।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 192–193 (PDF पृ. 199–200)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। देहस्थ योगियों की सीमा।