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प्रकरण 13: तेरहवाँ प्रकरणश्लोक ७/७100%

अध्याय 13 · सहज सुख

अष्टावक्र गीता, श्लोक 13.7

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

सुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः । शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ७ ॥

IAST लिप्यंतरण

sukhādirūpāniyamaṃ bhāveṣvālokya bhūriśaḥ | śubhāśubhe vihāyāsmād aham āse yathāsukham || 7 ||

सरल उच्चारण: sukhaadiroopaaniyamam bhaaveshvaalokya bhoorishah shubhaashubhe vihaayaasmaad aham aase yathaasukham (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

सुख-आदि-रूप-अनियमम्, भावेषु, आलोक्य, भूरिशः, शुभ-अशुभे, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम्

भावेषु
संसार के समस्त पदार्थों और घटनाओं में
सुख-आदि-रूप-अनियमम्
सुख-दुःख के आने-जाने की अनिश्चितता और क्षणभंगुरता को
भूरिशः आलोक्य
अनेक बार प्रत्यक्ष देखकर
अस्मात्
इसलिए
शुभ-अशुभे विहाय
शुभ और अशुभ (अनुकूल-प्रतिकूल) के आग्रह को विदा कर
अहम् यथासुखम् आसे
मैं परम सुख और तृप्ति में स्थित रहता हूँ

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

पदार्थों में सुख-दुःख आदि के रूपों की अनिश्चितता को बार-बार देखकर, शुभ और अशुभ को त्यागकर मैं सुखपूर्वक स्थित रहता हूँ।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

तेरहवें प्रकरण का उपसंहार करते हुए बाबू जालिमसिंह जी लिखते हैं: राजा जनक ने संसार के समस्त भोगों और अनुभवों की गहराई से परीक्षा की है। उन्होंने देखा कि जिस वस्तु से आज सुख मिलता है, वही कल दुःख देती है। संसार में सुख का कोई स्थायी नियम नहीं है। इसलिए उन्होंने अनुकूलता की चाह और प्रतिकूलता के द्वेष दोनों को छोड़ दिया है और उस अविनाशी आत्म-आनंद में टिक गए हैं जो कभी नहीं बदलता।

सरल हिन्दी में समझें

तेरहवें प्रकरण के अंतिम श्लोक में राजा जनक अपने जीवन का सबसे बड़ा निष्कर्ष बताते हैं।

वे कहते हैं कि संसार की किसी भी चीज़ में स्थायी सुख नहीं है। जो परिस्थिति आज बहुत अच्छी लगती है, वही कल परेशानी बन जाती है। जो व्यक्ति आज मित्र है, कल उससे अनबन हो सकती है। संसार का नियम ही बदलाव है।

जब उन्होंने यह सच्चाई बार-बार अपनी आँखों से देख ली, तो उन्होंने अच्छी-बुरी परिस्थितियों से उलझना बंद कर दिया। वे जान गए कि सच्चा सुख केवल अपनी आत्मा में है, और अब वे हर हाल में खुश रहते हैं।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. तेरहवें प्रकरण का पूर्णाहुति श्लोक, जो सांसारिक सुख की अनित्यता का निर्णायक विश्लेषण करता है। 2. भावेष्वालोक्य भूरिशः दिखाता है कि यह ज्ञान कोरी कल्पना नहीं, बल्कि जीवन के गहन निरीक्षण का परिणाम है। 3. शुभ और अशुभ के मानसिक विकल्पों से मुक्ति ही वास्तविक द्वंद्वातीत अवस्था है। 4. अहमासे यथासुखम् की अंतिम घोषणा जनक के अखंड, स्थायी आनंद का प्रमाण है। 5. यह वैराग्य को निराशावाद नहीं, बल्कि परम संतोष और स्वाधीनता बनाता है। 6. अष्टावक्र गीता के उच्च दर्शन का यह सबसे सहज और सुंदर व्यावहारिक फल है।

उदाहरण से समझें: जैसे मौसम में कभी धूप और कभी छांव आती है और बुद्धिमान व्यक्ति मौसम बदलने पर दुखी होने के बजाय छाता लेकर सहज रहता है, वैसे ही ज्ञानी सुख-दुःख में स्थिर रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

आधुनिक जीवन में जब हम यह समझ लेते हैं कि परिस्थितियाँ, तकनीक और लोग हमेशा बदलते रहेंगे, तो हम उन पर अपनी खुशी निर्भर करना छोड़ देते हैं और अपने भीतर की शांति में टिक जाते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: संसार के क्षणभंगुर सुख-दुःख के पीछे भागना बंद कीजिए; अपने भीतर के अखंड और सहज आनंद में विश्राम पाइए।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘शुभाशुभे विहाय’ का अर्थ अच्छे और बुरे आचरण के नैतिक भेद को मिटा देना या समाज में मर्यादा तोड़ना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी कोई परिस्थिति आपकी उम्मीद के खिलाफ जाए, तो याद रखें: "संसार का नियम ही अनिश्चितता है, मेरी शांति मेरी अपनी है।" (लगभग 1 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी किसी ऐसी सांसारिक परिस्थिति से स्थायी सुख की उम्मीद लगाए बैठा हूँ जो स्वभाव से ही बदलने वाली है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "सुख आया और गया, दुःख आया और गया, पर मैं जो इन दोनों को जान रहा था, वह सदा शांत और पूर्ण है।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: संसार में सुख-दुःख की अनिश्चितता देखकर, शुभ-अशुभ के पार मैं अपने सहज आनंद में सुखपूर्वक स्थित हूँ।

English

Translation: Observing repeatedly the irregularity of pleasure and pain in worldly things, dropping the good and the bad, I abide in ease.

Simple explanation: King Janaka concludes Chapter 13 with mature detachment: having witnessed that worldly things offer no constant satisfaction, he releases craving for the agreeable and aversion to the disagreeable, resting in pure Self-contentment.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अनित्यता-दर्शन
  • द्वंद्वातीत
  • सहज सुख
  • यथासुखम्
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 13.1: अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं।
  • श्लोक 14.1: प्रकृत्या शून्यचित्तो यः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 195–197 (PDF पृ. 202–204)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। तेरहवें प्रकरण का अंतिम श्लोक।