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प्रकरण 13: तेरहवाँ प्रकरणश्लोक ६/७86%

अध्याय 13 · सहज सुख

अष्टावक्र गीता, श्लोक 13.6

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा । नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ६ ॥

IAST लिप्यंतरण

svapato nāsti me hāniḥ siddhir yatnavato na vā | nāśollāsau vihāyāsmād aham āse yathāsukham || 6 ||

सरल उच्चारण: svapato naasti me haanih siddhir yatnavato na vaa naashollaasau vihaayaasmaad aham aase yathaasukham (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

स्वपतः, न, अस्ति, मे, हानिः, सिद्धिः, यत्नवतः, न, वा, नाश-उल्लासौ, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम्

स्वपतः मे हानिः न अस्ति
सोने पर मेरी आत्मा का कोई नुकसान नहीं होता
यत्नवतः सिद्धिः न वा
और प्रयास करने से कोई नई आत्मसिद्धि नहीं बन जाती (आत्मा नित्यसिद्ध है)
अस्मात्
इसलिए
नाश-उल्लासौ विहाय
हानि के शोक और लाभ के उल्लास को त्यागकर
अहम् यथासुखम् आसे
मैं सहज सुख में स्थित रहता हूँ

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

सोने में मेरी कोई हानि नहीं है और यत्न करने से कोई नई सिद्धि नहीं है; इसलिए नाश (हानि) और उल्लास (हर्ष) को छोड़कर मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: सांसारिक मनुष्य जब कुछ हासिल करता है तो उल्लास में फूल जाता है, और जब कुछ खोता है तो नाश के शोक में डूब जाता है। राजा जनक कहते हैं कि आत्मा नित्य-प्राप्त और परिपूर्ण है; वह किसी साधना के यत्न से नई उत्पन्न नहीं होती और न विश्राम या नींद से नष्ट होती है। जब हानि-लाभ का यह भ्रम टूट गया, तो हर्ष और शोक दोनों शांत हो गए और वे सहज सुख में स्थित हो गए।

सरल हिन्दी में समझें

इस श्लोक में राजा जनक जीवन के दो सबसे बड़े झूलों—सफलता के घमंड और असफलता के डर—से मुक्ति का मार्ग बताते हैं।

जब हमें कुछ मिलता है, तो हम खुशी से पागल हो जाते हैं; और जब कुछ छिन जाता है, तो डिप्रेशन में चले जाते हैं। हम सोचते हैं कि केवल भागदौड़ से ही हम कुछ "बन" सकते हैं।

जनक कहते हैं कि आपकी आत्मा पहले से ही पूरी है। सोने से वह कम नहीं होती और अत्यधिक प्रयास से वह अधिक नहीं हो जाती। जब यह सत्य समझ आता है, तो व्यर्थ की चिंताएं मिट जाती हैं और जीवन सहज हो जाता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. आत्मा नित्य-सिद्ध है, साध्य नहीं; इसलिए वह किसी कर्म का परिणाम नहीं हो सकती। 2. नाशोल्लासौ विहायास्मात् द्वंद्वातीत समभाव का अचूक व्यावहारिक सूत्र है। 3. यत्न की सीमा और आत्म-विश्रांति का महत्व स्पष्ट करता है। 4. हर्ष और शोक चित्त की वृत्तियाँ हैं; साक्षी आत्मा दोनों को केवल देखती है। 5. यह उपलब्धि की निरंतर भूख और विफलता के भय को जड़ से समाप्त करता है। 6. मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह पूर्ण आंतरिक संतुलन और शांति प्रदान करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे सोने का हार टूटने पर भी सोना नष्ट नहीं होता और नया रूप मिलने पर सोना बढ़ता नहीं, वैसे ही लाभ-हानि से आत्मा अप्रभावित रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

शेयर बाजार या करियर में जब अचानक गिरावट आती है तो व्यक्ति टूट जाता है और उछाल आने पर घमंड करता है; जनक का यह सूत्र सिखाता है कि अपनी पहचान को इन उतार-चढ़ावों से अलग रखकर हमेशा स्थिर रहा जा सकता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: लाभ में फूलने और हानि में टूटने की आदत छोड़िए; आपकी वास्तविक आत्मा पहले से ही नित्य और परिपूर्ण है।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘स्वपतो नास्ति मे हानिः’ का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति आलसी बन जाए या जीवन से निराश होकर अपने लक्ष्यों को छोड़ दे।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज दिन में जब भी कोई अच्छी या बुरी खबर मिले, तुरंत प्रतिक्रिया देने से पहले एक गहरी सांस लें और कहें: "यह भी गुज़र जाएगा, मैं स्थिर हूँ।" (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी खुशी और दुख केवल बाहरी लाभ और हानि के तराजू पर तौले जा रहे हैं?

छोटा अभ्यास: दो मिनट के लिए विचार करें: "मैंने जीवन में क्या खोया और क्या पाया? पर जो इन सबको देख रहा था, वह “मैं” कभी नहीं बदला।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: हानि के शोक और लाभ के उल्लास को त्यागकर मैं अपने नित्यसिद्ध स्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।

English

Translation: In sleeping there is no loss for me, nor is there gain for me through striving; abandoning grief over loss and joy over gain, I abide in ease.

Simple explanation: King Janaka understands that the Self is ever-complete and cannot be augmented by striving or diminished by rest. Free from the pendulum of grief and euphoria, he remains in tranquil equanimity.

विषय और संबंधित श्लोक

  • नित्यसिद्ध
  • हर्ष-शोक-मुक्ति
  • समभाव
  • यथासुखम्
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 13.5: अर्थानर्थौ न मे स्थित्या।
  • श्लोक 13.7: सुखादिरूपानियमं भावेषु।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 194–195 (PDF पृ. 201–202)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। नित्यसिद्ध आत्मा का बोध।