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प्रकरण 14: चौदहवाँ प्रकरणश्लोक ४/४100%

अध्याय 14 · संस्कारों से स्वतंत्रता

अष्टावक्र गीता, श्लोक 14.4

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः । भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥

IAST लिप्यंतरण

antarvikalpaśūnyasya bahiḥ svacchandacāriṇaḥ | bhrāntasyeva daśāstāstās tādṛśā eva jānate || 4 ||

सरल उच्चारण: antarvikalpashoonyasya bahih svachchhandachaarinah bhraantasyeva dashaastaastaas taadrishaa eva jaanate (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

अन्तर्विकल्प-शून्यस्य, बहिः, स्वच्छन्द-चारिणः, भ्रान्तस्य, इव, दशाः, ताः, ताः, तादृशाः, एव, जानते

अन्तर्विकल्प-शून्यस्य
भीतर से समस्त संकल्प-विकल्पों और अहंकार से रहित
बहिः स्वच्छन्द-चारिणः
और बाहर से लोक-दिखावे के आडंबरों से मुक्त, स्वाभाविक विचरण करने वाले
भ्रान्तस्य इव
संसारी लोगों को किसी मतवाले या उन्मत्त की भाँति प्रतीत होने वाले ज्ञानी की
ताः ताः दशाः
उन गूढ़ आंतरिक अवस्थाओं को
तादृशाः एव जानते
केवल उसके जैसे आत्मज्ञानी महापुरुष ही जान सकते हैं

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

भीतर से विकल्पों से शून्य और बाहर से स्वच्छंद विचरण करने वाले, किसी उन्मत्त जैसे प्रतीत होने वाले ज्ञानी की उन अवस्थाओं को केवल उसके जैसे ज्ञानी ही जानते हैं।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

चौदहवें प्रकरण का उपसंहार करते हुए बाबू जालिमसिंह जी लिखते हैं: राजा जनक ज्ञानी के बाह्य आचरण और अंतरंग स्थिति का मर्म समझाते हैं। ज्ञानी के भीतर कोई ‘यह करूँ, वह करूँ’ का विकल्प नहीं होता। बाहर से वह समाज के ढोंग और पाखंड से मुक्त होकर स्वाभाविक रूप से जीता है, इसलिए अज्ञानी संसारी लोग कभी-कभी उसे मतवाला या पागल समझ लेते हैं। किंतु ज्ञानी की उस परम शांति और दिव्य दशा को केवल वही समझ सकता है जो स्वयं उस आत्म-पद पर पहुँच चुका हो।

सरल हिन्दी में समझें

चौदहवें प्रकरण के अंतिम श्लोक में राजा जनक बताते हैं कि आत्मज्ञानी को बाहर से पहचानना असंभव क्यों है।

संसारी लोग सोचते हैं कि ज्ञानी वही होगा जो कोई खास वेशभूषा पहनेगा, गंभीर चेहरा बनाएगा या विशेष नियमों का ढोंग करेगा। लेकिन सच्चा ज्ञानी भीतर से पूरी तरह हल्का और शांत होता है।

वह बाहर से एक सरल बच्चे या मतवाले की तरह सहज जीता है, दिखावे से दूर रहता है। उसकी इस गहरी और सुंदर शांति को केवल वही समझ सकता है जिसने खुद अपने भीतर उस सच को जाना हो।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. चौदहवें प्रकरण का समापन श्लोक, जो जीवनमुक्त की बाह्य और आंतरिक स्थिति का उद्घाटन करता है। 2. अन्तर्विकल्पशून्यस्य: मन के समस्त संशयों और द्वंद्वों की आत्यंतिक समाप्ति। 3. बहिः स्वच्छन्दचारिणः सामाजिक पाखंड और कृत्रिम मर्यादाओं से मुक्ति का प्रतीक है। 4. भ्रान्तस्येव उपनिषदों के “बालवन्मूकवज्जडवत्” (बालक, मूक अथवा जड़ के समान) लक्षण की पुष्टि करता है। 5. तादृशा एव जानते स्पष्ट करता है कि आध्यात्मिकता कोई बाह्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतर्मुखी अनुभूति है। 6. ज्ञानी को बाह्य आचरण से आंकना सांसारिक अज्ञान का सबसे बड़ा प्रमाण है।

उदाहरण से समझें: जैसे समुद्र की गहराइयों की शांति को केवल वही गोताखोर समझ सकता है जो स्वयं नीचे उतरा हो, किनारे पर खड़े होकर लहरें गिनने वाला नहीं, वैसे ही ज्ञानी को ज्ञानी ही पहचानता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

आधुनिक समाज में अक्सर लोग किसी की योग्यता को उसके कपड़ों, पद और दिखावे से तौलते हैं; जनक बताते हैं कि वास्तविक ज्ञान भीतर की सादगी और निश्चल शांति में है, जिसे केवल संवेदनशील हृदय ही पहचान सकते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: आध्यात्मिकता का बाह्य ढोंग मत रचिए; अपने भीतर से विकल्पों को शांत कर सहज और सरल बनिए।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘स्वच्छन्दचारिणः’ का अर्थ समाज में उच्छृंखलता, अनैतिकता या अपराध करना नहीं है, बल्कि मानसिक पाखंड से मुक्त होकर सहज रूप से जीना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज लोगों को प्रभावित करने के लिए कोई बनावटी व्यवहार करने से बचें; शांत, सच्चे और सरल रहकर अपने काम करें। (दिनभर)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपनी आंतरिक शांति पर ध्यान देने के बजाय दूसरों के सामने धार्मिक या ज्ञानी दिखने का ढोंग कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मुझे किसी को कुछ साबित नहीं करना है; भीतर की शांति ही मेरा वास्तविक स्वरूप है।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: भीतर से विकल्प-शून्य और बाहर से सहज ज्ञानी की उन गूढ़ अवस्थाओं को केवल उसके जैसे आत्मवेत्ता ही समझ सकते हैं।

English

Translation: Innerly free from constructs, outwardly moving at ease, appearing like one bewildered—his diverse states are known only to those like him.

Simple explanation: King Janaka concludes Chapter 14 by describing the unfathomable state of the jivanmukta: inwardly quiet beyond mental constructs and outwardly unaffected by social pretension, the sage is truly understood only by another seer.

विषय और संबंधित श्लोक

  • जीवनमुक्त
  • अन्तर्विकल्पशून्य
  • सहज आचरण
  • आत्मज्ञानी
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 14.1: प्रकृत्या शून्यचित्तो यः।
  • श्लोक 15.1: सुखं संविन्मयोऽसि।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 203–204 (PDF पृ. 210–211)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। चौदहवें प्रकरण का अंतिम श्लोक।