श्लोक 14.1
प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाद्भावभावनः । निद्रितो बोधित इव क्षीणसंस्मरणो हि सः ॥ १ ॥
स्वभाव से विचार-शून्य चित्त वाला ज्ञानी जागे हुए व्यक्ति की तरह विचारों के संस्कारों को तुरंत विस्मृत कर देता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 14 · चौदहवाँ प्रकरण
चार श्लोकों के इस चौदहवें प्रकरण में राजा जनक चित्त की स्वाभाविक विचार-शून्यता, तृष्णा-गलने की पराकाष्ठा और बंधन-मोक्ष की चिंताओं से पूर्ण मुक्ति का निरूपण करते हैं।
तेरहवें प्रकरण में 'यथासुखम्' सहज स्थिति का गान करने के बाद, चौदहवें प्रकरण में राजा जनक चित्त की अंतरंग शांति और संस्कारों से पूर्ण विमुक्ति का वर्णन करते हैं। यह प्रकरण केवल चार श्लोकों का है, किंतु इसमें अद्वैत वेदांत की चरम स्थिति संजोई गई है।
पहले श्लोक (14.1) में जनक कहते हैं कि ज्ञानी का चित्त स्वाभाविक रूप से शून्य और निर्मल होता है। यदि कभी प्रारब्धवश कोई सांसारिक विचार उठ भी जाए, तो वह नींद से जागे हुए व्यक्ति के स्वप्न की तरह तुरंत विस्मृत हो जाता है—चित्त पर कोई स्थायी संस्कार नहीं बनता। दूसरे श्लोक (14.2) में वे तृष्णा के गलने (गलिता स्पृहा) का परिणाम दिखाते हैं: जब चाह ही नहीं रही, तो धन, मित्र, विषय-वासना, यहाँ तक कि शास्त्रों और विद्या का अहंकार भी विदा हो जाता है। तीसरे श्लोक (14.3) में वे बंधन और मोक्ष से परे की स्थिति बताते हैं: जब साक्षी परमात्मा का साक्षात हो गया, तो अब मोक्ष पाने की भी कोई व्याकुलता या चिंता शेष नहीं रही। चौथे श्लोक (14.4) में वे ज्ञानी के बाह्य आचरण का मर्म बताते हैं: जो भीतर से विकल्प-शून्य है और बाहर से स्वच्छंद विचरण करता प्रतीत होता है, उसकी स्थिति को केवल उसके जैसा ही कोई आत्मवेत्ता जान सकता है।
सावधानी: 'बहिः स्वच्छन्दचारिणः' का अर्थ मर्यादाहीन या अनैतिक आचरण नहीं है; यह सामाजिक आडंबरों और पाखंड से मुक्त होकर अपने सहज कर्तव्य में जीने का आध्यात्मिक संकेत है।
जब भीतर कोई इच्छा या विकल्प नहीं बचता, तो मन की क्या दशा होती है और ज्ञानी संसार में कैसे विचरण करता है?
राजा जनक स्पष्ट करते हैं कि ज्ञानी का चित्त स्वाभाविक रूप से खाली (शून्य) होता है। यदि कोई विचार आता भी है, तो वह नींद से जागे हुए व्यक्ति के स्वप्न की तरह तुरंत विस्मृत हो जाता है। जब तृष्णा पूरी तरह गल जाती है, तो बंधन और मुक्ति की चिंताएं भी समाप्त हो जाती हैं। ज्ञानी बाहर से चाहे कैसा भी दिखे, भीतर से पूर्णतः शांत और विकल्प-शून्य रहता है।
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प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाद्भावभावनः । निद्रितो बोधित इव क्षीणसंस्मरणो हि सः ॥ १ ॥
स्वभाव से विचार-शून्य चित्त वाला ज्ञानी जागे हुए व्यक्ति की तरह विचारों के संस्कारों को तुरंत विस्मृत कर देता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः । क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ २ ॥
जब मेरी तृष्णा गल गई, तब धन, मित्र, विषय-वासना, शास्त्र और विशेष ज्ञान के सारे प्रपंच विलीन हो गए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंविज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे । नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम ॥ ३ ॥
साक्षी परमात्मा का बोध होने पर और बंधन-मोक्ष की भ्रांति मिटने पर मुझे मुक्ति की भी कोई चिंता नहीं रही।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः । भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥
भीतर से विकल्प-शून्य और बाहर से सहज ज्ञानी की उन गूढ़ अवस्थाओं को केवल उसके जैसे आत्मवेत्ता ही समझ सकते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंचौदहवाँ प्रकरण चित्त की स्वाभाविक निर्मलता और संस्कारों की समाप्ति का प्रकरण है। राजा जनक बताते हैं कि ज्ञानी का मन स्वभाव से शून्य होता है और विचार स्वप्न की तरह विस्मृत हो जाते हैं। जब तृष्णा गल जाती है, तो धन, मित्र और शास्त्रों के अहंकार मिट जाते हैं। साक्षी का बोध होने पर मुक्ति की चिंता भी समाप्त हो जाती है और भीतर से विकल्प-शून्य ज्ञानी सहज शांति में विचरण करता है।
पाँच मिनट शांत बैठें। जो भी विचार मन में आए, उसे नींद से जागे हुए व्यक्ति की तरह तुरंत जाने दें। मन में दोहराएं: 'अन्तर्विकल्पशून्य—भीतर कोई विकल्प नहीं, कोई द्वंद्व नहीं; मैं केवल साक्षी चेतना हूँ।' यदि कोई असुविधा हो तो सामान्य स्थिति में आ जाएँ।
चौदहवें प्रकरण में राजा जनक चित्त की स्वाभाविक विचार-शून्यता, वासनाओं के विलीन होने और बंधन-मोक्ष की चिंताओं से मुक्ति का निरूपण करते हैं।
इसका अर्थ है कि ज्ञानी के मन पर कोई विचार स्थायी संस्कार नहीं छोड़ता; जैसे सोकर उठने पर स्वप्न विस्मृत हो जाता है, वैसे ही विचार तत्काल शांत हो जाते हैं।
जनक बताते हैं कि आत्मा सदा से ही नित्य-मुक्त है; इसलिए बंधन और मोक्ष दोनों ही मानसिक कल्पनाएं हैं और मुक्ति की चिंता करना भी व्यर्थ है।