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अध्याय 17 · मुक्त आचरण
अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.3
सत्यापित
मूल संस्कृत
न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निम्बपल्लवाः ॥ ३ ॥
IAST लिप्यंतरण
na jātu viṣayāḥ ke'pi svārāmaṃ harṣayanty amī | sallakīpallavaprītam ivebhaṃ nimbapallavāḥ || 3 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
न, जातु, विषयाः, के, अपि, स्व-आरामम्, हर्षयन्ति, अमी, सल्लकी-पल्लव-प्रीतम्, इव, इभम्, निम्ब-पल्लवाः
- अमी के अपि विषयाः
- ये संसार के तुच्छ विषय-भोग
- स्व-आरामम् न जातु हर्षयन्ति
- अपनी आत्मा में रमण करने वाले ज्ञानी को कदापि आकर्षित (हर्षित) नहीं कर पाते
- इव
- जैसे कि
- सल्लकी-पल्लव-प्रीतम् इभम्
- सल्लकी के मीठे पत्तों का प्रेमी हाथी
- निम्ब-पल्लवाः
- कड़वे नीम के पत्तों से कभी आकर्षित नहीं होता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जैसे सल्लकी के मीठे पत्तों से तृप्त हाथी को कड़वे नीम के पत्ते कभी नहीं लुभाते, वैसे ही आत्म-रमण करने वाले ज्ञानी को सांसारिक विषय कभी आकर्षित नहीं करते।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक विषयों से वैराग्य का स्वाभाविक रहस्य समझाता है। संसारी लोग सोचते हैं कि ज्ञानी को भोग छोड़ने के लिए बहुत कष्ट और संघर्ष करना पड़ता होगा। किंतु अष्टावक्र कहते हैं कि यह त्याग ज़बरदस्ती का नहीं, अत्यंत स्वाभाविक है। जैसे हाथी जब सल्लकी के रसीले और मधुर पत्ते खा लेता है, तो नीम के कड़वे पत्तों की तरफ देखता भी नहीं; वैसे ही जिसे अपनी आत्मा के परमानंद का स्वाद मिल गया, उसे संसार के क्षणिक भोग स्वतः फीके लगने लगते हैं।
सरल हिन्दी में समझें
बहुत से लोग पूछते हैं कि आध्यात्मिक रास्ते पर चलने के लिए क्या अपनी पसंद की चीजें ज़बरदस्ती छोड़नी पड़ती हैं?
अष्टावक्र यहाँ हाथी का बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं। जब कोई हाथी मीठे और स्वादिष्ट पत्ते खा चुका होता है, तो क्या उसे कड़वे नीम के पत्ते खाने से रोकने के लिए रस्सी से बांधना पड़ता है? बिल्कुल नहीं, वह खुद ही नीम के पत्तों की तरफ नहीं देखता।
इसी तरह, जब इंसान को अपने अंदर की सच्ची शांति और आनंद का स्वाद मिल जाता है, तो बाहर की छोटी-मोटी चीज़ों का आकर्षण अपने आप खत्म हो जाता है। यह त्याग मजबूरी का नहीं, बल्कि समझ का त्याग है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. वैराग्य दमन (repression) से नहीं, बल्कि उच्चतर रस की प्राप्ति (sublimation) से सिद्ध होता है। 2. स्वारामः वह है जिसका आनंद-स्रोत आंतरिक और नित्य है। 3. गीता के २.५९ ‘परं दृष्ट्वा निवर्तते’ का यह सजीव काव्यात्मक दृष्टांत है। 4. सल्लकी और नीम का दृष्टांत श्रेष्ठ और निकृष्ट सुख के अंतर को स्पष्ट करता है। 5. जब तक आत्म-रस का अनुभव नहीं होता, तब तक विषय-त्याग केवल हठ रहता है। 6. यह साधक को बाहरी त्याग का दिखावा करने के बजाय आंतरिक रस खोजने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे किसी को ताज़ा आम का रस मिल जाए तो वह बासी पानी की परवाह नहीं करता, वैसे ही आत्म-सुख मिलने पर सांसारिक सुख फीके पड़ जाते हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब कोई व्यक्ति किसी उच्च और सार्थक रचनात्मक काम में गहराई से डूब जाता है, तो उसे बेकार की गपशप या टीवी देखने का मन ही नहीं करता; यही स्वाभाविक अनासक्ति का आधुनिक उदाहरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: चीज़ों को ज़बरदस्ती छोड़ने की कोशिश मत कीजिए; अपने अंदर के गहरे आनंद को खोजिए, बाहरी आकर्षण अपने आप छूट जाएंगे।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘न जातु विषयाः हर्षयन्ति’ का अर्थ जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं (भोजन, वस्त्र) का तिरस्कार करना नहीं है, बल्कि उनमें आसक्त न होना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब किसी चीज़ को लेकर मन में बहुत लालच या बेचैनी उठे, तो 2 मिनट रुककर पूछें: "क्या यह चीज़ मुझे स्थायी शांति दे सकती है?" (लगभग 2 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं बुरी आदतों को छोड़ने के लिए केवल संघर्ष कर रहा हूँ, या मैंने अभी तक आत्म-शांति का सच्चा स्वाद चखा ही नहीं?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मेरी आत्मा आनंद का सागर है, मुझे बाहर के छोटे-मोटे सुखों के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है।"
एक पंक्ति में सार: जैसे मीठे पत्ते खाने वाला हाथी नीम के पत्तों की ओर नहीं देखता, वैसे ही आत्म-आनंद में मग्न ज्ञानी को सांसारिक विषय नहीं लुभाते।
English
Translation: Never do any objects of sense delight him who delights in his own Self, just as bitter neem leaves never attract an elephant fond of tender sallaki foliage.
Simple explanation: Renunciation is not an agonizing act of willpower, but the natural consequence of having tasted the nectar of the Self. Just as a majestic elephant relishing sweet leaves ignores bitter herbs, the sage effortlessly outgrows trivial sensory pursuits.
विषय और संबंधित श्लोक
- स्वाराम
- स्वाभाविक-वैराग्य
- हाथी-दृष्टांत
- परम-रस
- श्लोक 17.2: पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम्।
- श्लोक 17.4: यस्तु भोगेषु भुक्तेषु।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का तीसरा श्लोक।