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अध्याय 17 · सत्रहवाँ प्रकरण

मुक्त आचरण

संपादकीय विषय-शीर्षक · पुस्तक में नाम: सत्रहवाँ प्रकरण

बीस श्लोकों के इस सत्रहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र जीवनमुक्त तत्त्वज्ञानी के आंतरिक आनंद, सहज व्यवहार और कैवल्य स्थिति के दिव्य लक्षणों का सजीव चित्रण करते हैं।

श्लोकों की कुल संख्या
20
अनुमानित पठन समय
लगभग 45 से 60 मिनट (अनुमान: प्रति श्लोक 4 से 5 मिनट)
मुख्य संस्कृत शब्द
तृप्त · स्वच्छेन्द्रिय · स्वाराम · भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी · गलितधी · समदर्शी · कैवल्य · गलितमानस
प्रमुख विषय
ज्ञान और योगाभ्यास का वास्तविक फल: आत्म-तृप्ति · ब्रह्मांड में अपनी ही चेतना का दर्शन और शोक-मुक्ति · हाथी और नीम के पत्तों का दृष्टांत: विषयों की अरुचि · भोगों में अनासक्ति और दुर्लभ जीवनमुक्तावस्था · बुभुक्षु और मुमुक्षु से परे भोग-मोक्ष-निराकांक्षी महाशय · जीवन-मरण और पुरुषार्थों में हेय-उपादेयता की समाप्ति · प्रारब्धानुसार सहज आजीविका और अखंड संतोष · इंद्रियों के व्यवहार के बीच विगलित-बुद्धि की अक्रियता · संसार-सागर के क्षीण होने पर शून्य-दृष्टि और निष्कामता · जागने और सोने से परे तुरीय पर-दशा · सर्वत्र स्वस्थ, विमलाशय और वासना-मुक्त स्थिति · पसंद-नापसंद (ईहित-अनीहित) से परे सहज आचरण · निंदा-स्तुति, हर्ष-क्रोध और राग-द्वेष से परे समता · कामवासना के आकर्षण और मृत्यु के भय में अविचल मन · सुख-दुख, नर-नारी, संपत्ति-विपत्ति में सर्वत्र समदर्शिता · हिंसा, दया, उद्धतता और दीनता के द्वंद्वों से मुक्ति · प्राप्त और अप्राप्त में समान अनासक्त भाव · समाधान-विकल्पों से परे कैवल्य में स्थिति · ममता-अहंकार शून्यता: करते हुए भी अकर्ता · तीनों गुणों के पार गलितमानस की अनिर्वचनीय दशा

चित्र-विवरण (संपादकीय): पत्थरों के बीच सहज बहती नदी। नदी बिना बल या प्रतिरोध के बहती है। (इस अध्याय का अपना चित्र अभी बनना शेष है; यहाँ सरल सामान्य पृष्ठभूमि दिखाई गई है।)

अध्याय का परिचय

पंद्रहवें और सोलहवें प्रकरण में अद्वैत तत्त्वोपदेश और बुद्धि की विश्रांति का मार्ग स्पष्ट करने के बाद, सत्रहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र उस पुरुष के प्रत्यक्ष आचरण और स्थिति का वर्णन करते हैं जिसने इस सत्य को जी लिया है। यह बीस श्लोकों का प्रकरण 'जीवनमुक्ति' और 'कैवल्य' का अनुपम दर्पण है।

अष्टावक्र पहले श्लोक (17.1) में कहते हैं कि ज्ञान और योग का असली फल सिद्धियाँ नहीं, बल्कि नित्य तृप्ति, स्वच्छ इंद्रियाँ और आत्म-रमण है। दूसरे और तीसरे श्लोक में वे समझाते हैं कि ज्ञानी कभी दुखी नहीं होता क्योंकि पूरा ब्रह्मांड उसकी अपनी आत्मा से भरा है; जैसे मीठे सल्लकी पत्ते खाने वाला हाथी कड़वे नीम के पत्तों की ओर नहीं देखता, वैसे ही आत्म-आनंद पाने वाले को सांसारिक भोग कभी नहीं लुभाते। चौथे और पाँचवें श्लोक में वे घोषणा करते हैं कि भोगी बहुत हैं और मोक्षार्थी भी मिल जाते हैं, लेकिन जो भोग और मोक्ष दोनों की चाहत से परे है, वह महाशय अत्यंत दुर्लभ है।

छठे से दसवें श्लोक में वे दिखाते हैं कि ज्ञानी के लिए जीवन और मृत्यु सम हो जाते हैं; वह अपनी सहज आजीविका में संतुष्ट रहता है और जागने-सोने से परे एक अनिर्वचनीय 'पर-दशा' में जीता है। ग्यारहवें से पंद्रहवें श्लोक में वे जीवन के तीखे द्वंद्वों का परीक्षण करते हैं—निंदा-स्तुति, लाभ-हानि, कामवासना और मृत्यु—और बताते हैं कि इन सबके बीच ज्ञानी का मन 'अविह्वल' और 'समदर्शी' रहता है। अंत में (17.16-17.20) वे स्पष्ट करते हैं कि ज्ञानी का चित्त समस्त विकल्पों से शून्य होकर 'कैवल्य' में प्रतिष्ठित हो जाता है; उसका मन विगलित हो चुका है, इसलिए वह सब कुछ करते हुए भी अकर्ता रहता है।

सावधानी: समदर्शिता और अक्रियता का अर्थ समाज के प्रति असंवेदनशीलता, अपराध, या कर्तव्यों का परित्याग नहीं है; यह आंतरिक राग-द्वेष और अहंकार के क्षय का सर्वोच्च आध्यात्मिक आदर्श है।

केंद्रीय प्रश्न

जो पुरुष आत्मज्ञान और कैवल्य को उपलब्ध हो चुका है, संसार के सुख-दुख, आकर्षण और व्यवहार के बीच उसकी आंतरिक और बाह्य स्थिति कैसी होती है?

अध्याय की मुख्य शिक्षा

जीवनमुक्त ज्ञानी किसी नियम या हठ से नहीं बंधता; वह अपनी आत्मा में नित्य तृप्त होकर जीता है। वह न संसार के भोगों के पीछे भागता है और न उनसे डरकर भागता है। काम और मृत्यु जैसी चरम परिस्थितियाँ भी उसके समभाव को डिगा नहीं पातीं। उसका अहंकार और ममता विगलित हो चुके होते हैं, इसलिए वह संसार के सारे कार्य करते हुए भी परम अकर्ता और प्रशांत रहता है।

पढ़ने से पहले समझें

  • सत्रहवाँ प्रकरण जीवनमुक्त तत्त्वज्ञानी के व्यावहारिक आचरण का विस्तृत विवरण है।
  • यहाँ वर्णित लक्षण किसी कृत्रिम अभ्यास के परिणाम नहीं हैं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार के स्वाभाविक लक्षण हैं।
  • 'भोगमोक्षनिराकांक्षी' अद्वैत वेदांत की वह पराकाष्ठा है जहाँ मोक्ष को भी साध्य मानने की आवश्यकता नहीं रहती।
  • समदर्शिता का अर्थ अंधा हो जाना नहीं, बल्कि आंतरिक रूप से राग-द्वेष से मुक्त होकर सबको एक ही दृष्टि से देखना है।
  • इस प्रकरण को पढ़ते समय अपने मन की तुलना करके आत्म-निरीक्षण करें कि हमारी शांति किन परिस्थितियों में डगमगाती है।

प्रमुख अवधारणाएँ

स्वच्छेन्द्रिय
जिसकी इंद्रियाँ राग-द्वेष, काम और लोभ के मैल से सर्वथा शुद्ध हो चुकी हों।
स्वाराम
जो बाहरी विषयों में सुख खोजने के बजाय अपनी ही आत्मा में नित्य रमण और आनंद करता है।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी
जो न तो संसार के भोगों की कामना करता है और न मोक्ष पाने की चिंता; जो स्वतः नित्य-मुक्त है।
गलितधी
जिसकी अहंकारी, संशयग्रस्त और तर्क-वितर्क वाली संकीर्ण बुद्धि आत्म-अनुभूति में विगलित और शांत हो चुकी है।
परदशा
जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं से परे तुरीय आत्म-स्थिति जहाँ कोई द्वैत नहीं रहता।
समदर्शी
जो सुख-दुख, हानि-लाभ, नर-नारी और मित्र-शत्रु सब में एक ही चैतन्य आत्मा को समान रूप से देखता है।
कैवल्य
अद्वितीय, निर्विकल्प और परिपूर्ण आत्म-स्वरूप जिसमें कोई दूसरा या विकल्प शेष नहीं रहता।
गलितमानस
जिसका मन तीनों गुणों और मानसिक संकल्पों से मुक्त होकर साक्षात ब्रह्म-रूप में लीन हो चुका है।

श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या

20 श्लोक, पुस्तक के क्रम में। सभी श्लोक पृष्ठ से मिलान किए गए हैं।

सत्यापितसमीक्षा आवश्यक

श्लोक 17.1

सत्यापित

तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा । तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तु यः ॥ १ ॥

जो सदा तृप्त, स्वच्छ इंद्रियों वाला और आत्म-स्वरूप में रमण करने वाला है, उसी ने ज्ञान और योग का सच्चा फल पाया है।

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श्लोक 17.2

सत्यापित

न कदाचिज्जगत्यस्मिन् तत्त्वज्ञो हन्त खिद्यति । यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥ २ ॥

तत्त्वज्ञानी संसार में कभी दुखी नहीं होता, क्योंकि उस एक अकेले आत्मस्वरूप से ही संपूर्ण ब्रह्मांड परिपूर्ण है।

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श्लोक 17.3

सत्यापित

न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निम्बपल्लवाः ॥ ३ ॥

जैसे मीठे पत्ते खाने वाला हाथी नीम के पत्तों की ओर नहीं देखता, वैसे ही आत्म-आनंद में मग्न ज्ञानी को सांसारिक विषय नहीं लुभाते।

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श्लोक 17.4

सत्यापित

यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासितः । अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः ॥ ४ ॥

जो मिले हुए भोगों में लिप्त नहीं होता और अनमिले की चाह नहीं रखता, वैसा पुरुष इस संसार में अत्यंत दुर्लभ है।

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श्लोक 17.5

सत्यापित

बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते । भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी विरलो हि महाशयः ॥ ५ ॥

संसार में भोगी और मुमुक्षु दोनों मिलते हैं; किंतु भोग और मोक्ष दोनों की चाहत से रहित महापुरुष कोई विरला ही होता है।

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श्लोक 17.6

सत्यापित

धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा । कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि ॥ ६ ॥

उदारचित्त ज्ञानी के लिए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और जीवन-मरण में त्यागने या पकड़ने का कोई भेद नहीं होता।

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श्लोक 17.7

सत्यापित

वाञ्छा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ । यथाजीविकया तस्माद् धन्य आस्ते यथासुखम् ॥ ७ ॥

न संसार के मिटने की चाह और न रहने से द्वेष; जो आजीविका सहज मिल जाए उसमें धन्य पुरुष सुख से रहता है।

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श्लोक 17.8

सत्यापित

कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ ८ ॥

आत्मज्ञान से जिसकी बुद्धि शांत हो चुकी है, वह देखते, सुनते, छूते और खाते हुए भी सदा सुखपूर्वक रहता है।

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श्लोक 17.9

सत्यापित

शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च । न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे ॥ ९ ॥

संसार-सागर सूखने पर ज्ञानी की दृष्टि वासना-शून्य और चेष्टाएं निष्प्रयोजन हो जाती हैं; न उसमें चाह रहती है न विरक्ति।

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श्लोक 17.10

सत्यापित

न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति । अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः ॥ १० ॥

मुक्त चित्त वाले की अनिर्वचनीय परम दशा होती है; वह न जागता है, न सोता है, न आँखें खोलता है और न मूँदता है।

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श्लोक 17.11

सत्यापित

सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः । समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते ॥ ११ ॥

मुक्त पुरुष हर जगह आत्म-स्थित और निर्मल चित्त रहता है; समस्त वासनाओं से मुक्त होकर वह सर्वत्र सुशोभित होता है।

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श्लोक 17.12

सत्यापित

पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गृह्णन्वदन्व्रजन् । ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः ॥ १२ ॥

देखते, सुनते, खाते और चलते हुए भी जो पसंद-नापसंद से मुक्त है, वह विशाल-हृदय पुरुष निश्चय ही सदा मुक्त है।

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श्लोक 17.13

सत्यापित

न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति । न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः ॥ १३ ॥

वह न निंदा करता है न स्तुति, न हर्षित होता है न कुपित; वह मुक्त पुरुष सब जगह अनासक्त रहता है।

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श्लोक 17.14

सत्यापित

सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम् । अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः ॥ १४ ॥

कामुक स्त्री को देखकर या सामने मृत्यु को पाकर भी जिसका मन विचलित नहीं होता, वह स्वरूप-स्थित महापुरुष निश्चय ही मुक्त है।

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श्लोक 17.15

सत्यापित

सुखे दुःखे नरे नार्यां सम्पत्सु च विपत्सु च । विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः ॥ १५ ॥

सर्वत्र समदर्शी ज्ञानी के लिए सुख-दुख, नर-नारी और संपत्ति-विपत्ति में तनिक भी कोई भेद नहीं होता।

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श्लोक 17.16

सत्यापित

न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे ॥ १६ ॥

जिसका संसार क्षीण हो चुका है, उसमें न हिंसा है न कृत्रिम दया, न घमंड है न दीनता, न आश्चर्य है न क्षोभ।

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श्लोक 17.17

सत्यापित

न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः । असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते ॥ १७ ॥

मुक्त पुरुष न विषयों से द्वेष करता है न लोलुप होता है; वह नित्य अनासक्त मन से प्राप्त और अप्राप्त दोनों में सम रहता है।

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श्लोक 17.18

सत्यापित

समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः । शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः ॥ १८ ॥

कैवल्य में स्थित शून्य-चित्त पुरुष समाधि-विक्षेप और भले-बुरे के सारे मानसिक विकल्पों से परे हो जाता है।

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श्लोक 17.19

सत्यापित

निर्ममो निरहङ्कारो न किञ्चिदिति निश्चितः । अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न ॥ १९ ॥

ममतारहित, अहंकाररहित और आशारहित ज्ञानी पुरुष बाहर से सब कुछ करते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं करता।

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श्लोक 17.20

सत्यापित

मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः । दशां कामपि सम्प्राप्तो भवेद्गलितमानसः ॥ २० ॥

तीनों गुणों और मानसिक अवस्थाओं से रहित, शांत मन वाला पुरुष किसी अनिर्वचनीय परम दशा को प्राप्त हो जाता है।

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अध्याय का सरल सार

सत्रहवें प्रकरण में अष्टावक्र एक सच्चे ज्ञानी इंसान के जीवन और उसके मन की हालत का वर्णन करते हैं। ज्ञानी वह नहीं है जो दुनिया से कटकर किसी गुफा में बैठ जाए, बल्कि वह है जो दुनिया के बीच रहते हुए भी अंदर से पूरी तरह हल्का और शांत रहता है। उसे न तो सुख पाने की लालच होती है और न दुख से भागने का डर। कोई उसकी तारीफ करे या बुराई, उसके पास संपत्ति हो या गरीबी, सामने प्यार आए या मौत—वह हर हालत में एक जैसा शांत रहता है। उसका मन बच्चे की तरह साफ हो चुका होता है, इसलिए वह सब काम करते हुए भी किसी तनाव में नहीं आता।

पाँच प्रमुख शिक्षाएँ

  1. ज्ञान और योग का असली फल सिद्धियाँ या शास्त्र-चर्चा नहीं, बल्कि आत्म-तृप्ति और शुद्ध इंद्रियाँ हैं। (17.1, 17.3)
  2. सच्चा महापुरुष भोगी और मुमुक्षु दोनों से परे है; उसे न भोग की लालसा है और न मोक्ष की चिंता। (17.4, 17.5)
  3. ज्ञानी जीवन और मृत्यु, सुख और दुख में समदर्शी रहता है; प्रारब्ध से जो मिले उसमें प्रसन्न रहता है। (17.6, 17.7, 17.15)
  4. कामवासना का तीव्र आकर्षण और मृत्यु का भीषण भय भी ज्ञानी के चित्त को विचलित नहीं कर पाते। (17.13, 17.14)
  5. जिसका मन और अहंकार विगलित हो चुका है, वह संसार के सारे कार्य करते हुए भी अकर्ता और कैवल्य में स्थित रहता है। (17.18, 17.19, 17.20)

सामान्य गलतफहमियाँ

  • ‘नीरस’ (17.13) का अर्थ पत्थर जैसा निर्दयी या असंवेदनशील हो जाना नहीं है; इसका अर्थ सांसारिक प्रपंचों में आसक्त न होना है।
  • ‘कुर्वन्नपि न करोति’ (17.19) का अर्थ यह नहीं है कि कोई अपराध करके कहे कि मैं अकर्ता हूँ; व्यावहारिक नैतिकता और कानून का पालन अनिवार्य है।
  • भोगों में अनासक्ति का अर्थ जानबूझकर अनैतिक या अस्वस्थ भोगों में लिप्त होना नहीं है; यह प्रारब्ध से मिले सात्त्विक निर्वाह के प्रति तटस्थता है।
  • ‘शून्या दृष्टिः’ (17.9) का अर्थ दृष्टिहीन या मंदबुद्धि हो जाना नहीं है; यह स्वार्थ और वासना के बिना देखने की शुद्ध दृष्टि है।

आत्मचिंतन प्रश्न

  1. जब कोई मेरी तारीफ या आलोचना करता है, तो क्या मेरी मानसिक शांति तुरंत डगमगा जाती है?
  2. क्या मैं जीवन में आने वाली असुविधाओं या अनपेक्षित परिस्थितियों को बिना शिकायत स्वीकार कर पाता हूँ?
  3. क्या मेरे अंदर अभी भी आध्यात्मिक उपलब्धियों को लेकर कोई सूक्ष्म अहंकार या दिखावे की भावना है?
  4. क्या मैं सुख और दुख दोनों को चेतना में आने-जाने वाली अस्थायी तरंगों की तरह देख पा रहा हूँ?
  5. क्या मैं दिनभर के अपने कामों को करते हुए अंदर से हल्का और अकर्ता महसूस कर सकता हूँ?

संक्षिप्त चिंतन अभ्यास

दिन के किसी समय 5 मिनट शांत बैठें। अपने सामने सुखद और दुखद यादों को एक-एक करके आने दें। दोनों के प्रति पूरी तरह निष्पक्ष और समदर्शी रहें। मन में कहें: 'सुख आया, वह भी बीता; दुख आया, वह भी बीता; मैं दोनों का साक्षी अचल आकाश हूँ।' इस समता में विश्राम करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्लोक 17.3 में हाथी और नीम के पत्तों का क्या दृष्टांत है?

सल्लकी के मधुर पत्ते खाने वाले हाथी को नीम के कड़वे पत्ते कभी आकर्षित नहीं करते। इसी प्रकार, जिसने अपनी आत्मा का असीम आनंद अनुभव कर लिया है, उसे संसार के तुच्छ विषय-भोग कभी आकर्षित नहीं कर पाते।

'भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी' (17.5) का क्या अर्थ है? क्या मोक्ष की इच्छा भी छोड़नी होती है?

हाँ। अद्वैत वेदान्त के अनुसार आत्मा पहले से ही नित्य-मुक्त है। जब तक कोई खुद को 'बंधा हुआ' मानकर मोक्ष पाने की इच्छा करता है, तब तक द्वैत बना रहता है। जब यह बोध हो जाता है कि मैं सदा मुक्त हूँ, तब मोक्ष की भी चाह समाप्त हो जाती है।

श्लोक 17.14 में काम और मृत्यु के समक्ष ज्ञानी की क्या परीक्षा बताई गई है?

कामवासना का तीव्र आकर्षण और मृत्यु का भीषण भय संसार की दो सबसे बड़ी परीक्षाएँ हैं। जो इन दोनों के उपस्थित होने पर भी तनिक विचलित नहीं होता और शांत रहता है, वही सच्चा जीवनमुक्त है।

'कुर्वन्नपि करोति न' (17.19) का रहस्य क्या है?

ज्ञानी पुरुष के अंदर से 'मैं कर्ता हूँ' का अहंकार समाप्त हो चुका होता है। वह जानता है कि समस्त कार्य प्रकृति और इंद्रियों द्वारा हो रहे हैं, आत्मा अक्रिय साक्षी है। इसलिए वह सब करते हुए भी निर्लेप रहता है।

सत्रहवें प्रकरण का मुख्य संदेश क्या है?

मुख्य संदेश यह है कि ज्ञान केवल बातों या विचारों में नहीं, बल्कि आचरण और स्वभाव में उतरना चाहिए। सच्चा ज्ञानी संसार में रहते हुए भी जल में कमल की तरह हर परिस्थिति में समदर्शी और आनंदित रहता है।