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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक १२/१००12%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.12

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता । इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः ॥ १२ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva dharmaḥ kva ca vā kāmaḥ kva cārthaḥ kva vivekitā | idaṃ kṛtam idaṃ neti dvandvair muktasya yoginaḥ || 12 ||

सरल उच्चारण: kva dharmah kva cha vaa kaamah kva chaarthah kva vivekitaa idam kritam idam neti dvandvair muktasya yoginah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, धर्मः, क्व, च, वा, कामः, क्व, च, अर्थः, क्व, विवेकिता, इदम्, कृतम्, इदम्, न, इति, द्वन्द्वैः, मुक्तस्य, योगिनः

इदम् कृतम् इदम् न इति
'यह मैंने कर लिया और यह नहीं किया’ ऐसे
द्वन्द्वैः मुक्तस्य योगिनः
द्वंद्वों से सर्वथा मुक्त हुए योगी के लिए
क्व धर्मः
कहाँ धर्म?
क्व च वा कामः
कहाँ काम?
क्व च अर्थः
कहाँ अर्थ?
क्व विवेकिता
और कहाँ विवेकी होने का अभिमान?

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

‘यह किया और यह नहीं किया’ के द्वंद्वों से मुक्त हुए योगी के लिए धर्म कहाँ, काम कहाँ, अर्थ कहाँ और विवेकशीलता भी कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधारण साधक सदा विधि-निषेध के नियमों में बंधा रहता है। वह इसी चिंता में जलता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। किंतु जिस योगी का चित्त इस द्वंद्व से मुक्त हो चुका है, उसके लिए चारों पुरुषार्थों का कोई अलग बंधन नहीं रहता। यहाँ तक कि ’मैं विवेकी हूँ’ का सूक्ष्म अहंकार भी विदा हो जाता है। वह प्रकृति के सहज प्रवाह में अकर्ता होकर जीता है।

सरल हिन्दी में समझें

हमारा मन हमेशा इस हिसाब में लगा रहता है—"मैंने यह अच्छा काम किया, मुझसे वह छूट गया।"

लेकिन जो योगी इस हिसाब-किताब से बाहर आ जाता है, उसके लिए धर्म, अर्थ, काम और यहाँ तक कि "मैं बहुत समझदार हूँ" का घमंड भी खत्म हो जाता है।

वह किसी नियम को तोड़ने के लिए ऐसा नहीं करता, बल्कि वह इतना शुद्ध हो जाता है कि उससे कोई गलत काम हो ही नहीं सकता। उसका आचरण स्वाभाविक रूप से निष्कपट और शांत हो जाता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. कृत-अकृत के द्वंद्व से मुक्ति ही पुरुषार्थों के बंधन से मुक्ति है। 2. क्व धर्मः क्व चार्थः नैतिक पतन का नहीं, बल्कि नैतिकता के सहज स्वभाव बन जाने का सूचक है। 3. विवेकिता का अभाव यह दर्शाता है कि ज्ञानी को अब सत्य-असत्य को अलग करने के लिए सोचना नहीं पड़ता; वह साक्षात सत्य में जीता है। 4. गीता के २.४६ ‘यावानर्थ उदपाने’ के समान ज्ञानी के लिए सारे साधन गौण हो जाते हैं। 5. यह साधक को मानसिक नियमों की कठोरता से मुक्त करके सहज आध्यात्मिक स्वतंत्रता देता है। 6. अकर्ता-भाव में स्थित योगी का कोई भी कर्म बंधन का कारण नहीं बनता।

उदाहरण से समझें: जैसे नदी जब समुद्र में मिल जाती है तो उसे किनारे के नियमों की चिंता नहीं करनी पड़ती, वैसे ही पूर्ण मुक्त पुरुष सारे द्वंद्वों से पार हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी खेल के इतने माहिर खिलाड़ी बन जाते हैं कि आपको नियमों की किताब याद नहीं करनी पड़ती, आपका शरीर स्वतः सही खेलता है; ज्ञानी का जीवन भी ऐसा ही सहज हो जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: किए और न किए के हिसाब-किताब से बाहर निकलिए; सहज, सरल और अहंकार-रहित होकर जिएँ।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘क्व धर्मः’ का अर्थ अनैतिक या गैर-कानूनी आचरण करना नहीं है, बल्कि धर्म को अहंकार-रहित सहज स्वभाव बनाना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी काम को पूरा करने के बाद यह मत सोचिए कि "मैंने कितना बड़ा काम किया"; बस उसे शांत भाव से विदा कर दें। (काम के बाद)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने अच्छे कामों का हिसाब रखकर अपने मन में एक नया धार्मिक अहंकार खड़ा कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मैंने जो किया वह प्रकृति का खेल था; मेरी आत्मा समस्त कृत-अकृत से परे शुद्ध आकाश है।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: किए और न किए के द्वंद्वों से मुक्त योगी के लिए धर्म, अर्थ, काम और विवेकशीलता का कोई बंधन नहीं रहता।

English

Translation: Where is duty, where is desire, where is wealth, or where is discernment for the yogi who is liberated from the dualities of "this is done and this is undone"?

Simple explanation: For the yogi liberated from the mental ledger of achievements and omissions, the traditional pursuits of dharma, artha, and kāma lose their grip. Even the pride of intellectual discernment drops away as he rests in spontaneous wholeness.

विषय और संबंधित श्लोक

  • द्वंद्व-मुक्ति
  • कृत-अकृत-पार
  • पुरुषार्थ-अतिक्रमण
  • सहज-स्थिति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.11: स्वाराज्ये भैक्षवृत्तौ।
  • श्लोक 18.13: कृत्यं किमपि नैवास्ति।

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक अनुमानित पुस्तक पृ. 270–271 (PDF पृ. 277–278); स्कैन इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मानक 100-श्लोक क्रम में यह श्लोक 12 है (पहले ड्राफ्ट में 11 लिखा गया था, क्योंकि स्वाराज्ये वाला श्लोक छूट गया था)। मूल पाठ सार्वजनिक अष्टावक्रगीता से मिलाया गया; इस सत्र में पुस्तक का स्कैन फिर नहीं देखा गया।