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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक १३/१००13%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.13

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

कृत्यं किमपि नैवास्ति न कापि हृदि रञ्जना । यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः ॥ १३ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kṛtyaṃ kim api naivāsti na kāpi hṛdi rañjanā | yathā jīvanam eveha jīvanmuktasya yoginaḥ || 13 ||

सरल उच्चारण: krityam kim api naivaasti na kaapi hridi ranyjanaa yathaa jeevanam eveha jeevanmuktasya yoginah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

कृत्यम्, किम्, अपि, न, एव, अस्ति, न, कापि, हृदि, रञ्जना, यथा, जीवनम्, एव, इह, जीवन्मुक्तस्य, योगिनः

इह जीवन्मुक्तस्य योगिनः
इस संसार में जीवन्मुक्त योगी के लिए
किम् अपि कृत्यम् न एव अस्ति
करने योग्य कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रहता
न हृदि कापि रञ्जना
और न उसके हृदय में किसी सांसारिक विषय की कोई आसक्ति (रंजना) होती है
यथा जीवनम् एव
जैसा जीवन प्रारब्ध से प्राप्त हो गया है, वह उसी प्रकार सहज जीता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जीवन्मुक्त योगी के लिए करने योग्य कुछ भी बाकी नहीं है और न उसके हृदय में कोई आसक्ति है; जैसा जीवन सामने है, वह वैसे ही जीता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह जीवन्मुक्ति का अत्यंत सरल और प्रामाणिक लक्षण है। जीवन्मुक्त वह है जो शरीर में रहते हुए भी कर्मों के बंधन से मुक्त है। उसके लिए कोई ’यह मुझे ज़रूर करना है’ का दबाव (कृत्यम्) नहीं होता, और न उसके दिल में किसी चीज़ को पाने की ललक या आसक्ति (रंजना) होती है। प्रारब्ध के अनुसार जो परिस्थिति, जो भोजन और जो कार्य सामने आ जाए, उसे वह बिना किसी शिकायत के एक साक्षी की तरह निभाता है।

सरल हिन्दी में समझें

जीवन्मुक्त व्यक्ति वह होता है जो दुनिया में रहते हुए भी अंदर से पूरी तरह आज़ाद होता है।

उसके सिर पर कोई मानसिक बोझ नहीं होता कि "मुझे यह काम पूरा करना ही पड़ेगा।" और न उसके दिल में किसी चीज़ को लेकर कोई लालच या खिंचाव होता है।

जैसी ज़िंदगी कुदरत ने दी है, वह उसे बिल्कुल सहजता से जीता है। न कल की चिंता, न आज की शिकायत। वह हर पल को एक शांत नदी की तरह बहने देता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. कृत्यं नैवास्ति गीता के ३.१७ ‘तस्य कार्यं न विद्यते’ का साक्षात प्रतिपादन है। 2. हृदि रञ्जना न राग और आसक्ति के समूल क्षय को दर्शाता है। 3. जीवन्मुक्त वह है जिसकी अविद्या का नाश हो चुका है, यद्यपि प्रारब्ध-शरीर गतिशील रहता है। 4. यथा जीवनम् प्रारब्ध के प्रति पूर्ण समर्पण और सहजता का प्रतीक है। 5. ज्ञानी कर्म करने के लिए नहीं, बल्कि कर्मों के बीच अकर्ता होकर जीता है। 6. यह साधक को भविष्य की चिंताओं से मुक्त करके वर्तमान क्षण की पूर्णता में स्थापित करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे पेड़ से गिरा हुआ सूखा पत्ता ज़मीन पर पड़ा रहता है और हवा जिधर ले जाए उधर चला जाता है, वैसे ही जीवन्मुक्त प्रारब्ध के अनुसार सहज जीता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई व्यक्ति रिटायरमेंट के बाद बिना किसी हड़बड़ी या दिखावे के अपनी दिनचर्या को शांति और संतोष से जीता है, तो यह उसी सहज जीवन का एक व्यावहारिक रूप है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने सिर से "मुझे कुछ साबित करना है" का बोझ उतार दीजिए; जो जीवन सामने है उसे बिना आसक्ति के शांति से जिएँ।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘कृत्यं नैवास्ति’ का अर्थ कर्तव्यों से मुँह मोड़ना या आलसी हो जाना नहीं है; यह आंतरिक कर्तापन की समाप्ति है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज काम करते समय मन में यह भाव रखें: "यह काम स्वाभाविक रूप से हो रहा है, मैं इसका कोई तनाव नहीं लूँगा।" (काम के दौरान)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी यह सोचकर जी रहा हूँ कि जब तक मैं सब कुछ नियंत्रित नहीं करूँगा, तब तक कुछ ठीक नहीं होगा?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मेरे करने के लिए कुछ बाकी नहीं है, मैं इस क्षण में पूर्ण और संतुष्ट हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: जीवन्मुक्त योगी के लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता और न मन में कोई आसक्ति होती है; वह सहज जीवन जीता है।

English

Translation: For the living liberated yogi in this world, there is nothing whatsoever to be done, nor any attachment coloring his heart; he simply lives as life unfolds.

Simple explanation: The liberated-while-living sage (jīvanmukta) carries no compulsion of duties yet to be fulfilled, nor does any latent passion color his heart. Without personal agenda, he lives effortlessly as destiny unfolds.

विषय और संबंधित श्लोक

  • जीवन्मुक्ति
  • अकर्तव्यता
  • रंजना-मुक्ति
  • सहज-जीवन
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.12: द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः।
  • श्लोक 18.14: क्व मोहः क्व च वा विश्वम्।

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक अनुमानित पुस्तक पृ. 271–272 (PDF पृ. 278–279); स्कैन इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मानक 100-श्लोक क्रम में यह श्लोक 13 है (पहले ड्राफ्ट में 12 लिखा गया था, क्योंकि स्वाराज्ये वाला श्लोक छूट गया था)। मूल पाठ सार्वजनिक अष्टावक्रगीता से मिलाया गया; इस सत्र में पुस्तक का स्कैन फिर नहीं देखा गया।