दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.15
समीक्षा आवश्यक
मूल संस्कृत
येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै । निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १५ ॥
IAST लिप्यंतरण
yena viśvam idaṃ dṛṣṭaṃ sa nāstīti karotu vai | nirvāsanaḥ kiṃ kurute paśyann api na paśyati || 15 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
येन, विश्वम्, इदम्, दृष्टम्, सः, न, अस्ति, इति, करोतु, वै, निर्वासनः, किम्, कुरुते, पश्यन्, अपि, न, पश्यति
- येन इदम् विश्वम् दृष्टम्
- जिसने इस संसार को सत्य रूप से देखा है
- सः वै न अस्ति इति करोतु
- वह भले ही यह सिद्ध करने का प्रयास करे कि ‘यह संसार नहीं है’
- निर्वासनः किम् कुरुते
- किंतु वासनारहित ज्ञानी क्या करे?
- पश्यन् अपि न पश्यति
- वह तो आँखों से देखते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं देखता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जिसने इस विश्व को देखा है, वह भले ही कहे कि ‘यह नहीं है’; किंतु वासनारहित ज्ञानी क्या करे? वह तो देखते हुए भी नहीं देखता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक बौद्धिक वेदांत और अपरोक्ष अनुभूति के अंतर को स्पष्ट करता है। जो व्यक्ति संसार को सत्य मानकर बैठा है, वह शास्त्रों के तर्कों से यह रटने की कोशिश करता है कि "जगत मिथ्या है, जगत नहीं है।" किंतु सच्चा ज्ञानी वह है जिसके मन से संसार की वासना ही मिट चुकी है (निर्वासनः)। जब वासना ही नहीं रही, तो उसे संसार का खंडन करने की भी कोई ज़रूरत नहीं है। उसकी आँखें दुनिया को देखती हैं, लेकिन उसका मन किसी चीज़ को सत्य नहीं मानता। वह देखते हुए भी नहीं देखता।
सरल हिन्दी में समझें
अगर किसी को रस्सी में सचमुच सांप दिखाई दे रहा हो, तो वह चिल्लाएगा कि "यह सांप नहीं है, डरो मत।"
लेकिन जिसे पहले से ही पता है कि यह सिर्फ एक रस्सी है, वह न तो डरेगा और न किसी को समझाने की कोशिश करेगा।
इसी तरह, जिस व्यक्ति के मन से दुनिया की चाहतें खत्म हो चुकी हैं, उसे दुनिया को झूठा साबित करने की कोई हड़बड़ी नहीं होती। उसकी आँखें दुनिया की चीज़ों को देखती हैं, लेकिन उसका दिल जानता है कि यह सब केवल एक पर्दा है। वह देखते हुए भी किसी चीज़ में नहीं उलझता।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. नेति-नेति (जगत-निषेध) अज्ञानी साधक के लिए है जिसे जगत सत्य प्रतीत होता है। 2. निर्वासनः वह है जिसकी विषय-वासनाएं समूल नष्ट हो चुकी हैं। 3. पश्यन्नपि न पश्यति का अर्थ है कि इंद्रिय-प्रत्यक्ष होते हुए भी चित्त में कोई सत्यत्व-बुद्धि नहीं होती। 4. यह कनिष्क और उत्तम अधिकारी के बीच के भेद को स्पष्ट करता है। 5. जगत का खंडन करना भी जगत को मान्यता देना है; ज्ञानी जगत की उपेक्षा करके आत्मा में रहता है। 6. साधक को बौद्धिक तर्कों के बजाय वासना-क्षय पर ध्यान देने की प्रेरणा मिलती है।
उदाहरण से समझें: जैसे कांच की खिड़की से बाहर देखते हुए कोई कांच को नहीं देखता बल्कि पार देखता है, वैसे ही ज्ञानी संसार को देखते हुए भी केवल उसके पीछे छिपी आत्मा को देखता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी टीवी स्क्रीन पर कोई नाटक देख रहे होते हैं, तो आप जानते हैं कि स्क्रीन पर दिखने वाले लोग असली नहीं हैं; आप उन्हें देखते हुए भी सच नहीं मानते। ज्ञानी भी संसार को ऐसे ही देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: संसार को झूठा साबित करने में समय मत गंवाइए; अपने मन की वासनाएं शांत कीजिए, संसार अपने आप बेअसर हो जाएगा।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘पश्यन्नपि न पश्यति’ का अर्थ आँखें बंद कर लेना या सड़क पर गाड़ी चलाते समय असावधान हो जाना नहीं है; यह मानसिक अनासक्ति है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी सुंदर या आकर्षक दृश्य को देखें, तो मन में याद रखें: "यह दृश्य बाहर है, किंतु यह मुझमें कोई नई चाहत नहीं जगा सकता।" (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी संसार को मिथ्या साबित करने की बौद्धिक बहसों में उलझा हुआ हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर कमरे की चीज़ों को देखें, बिना उनका नाम लिए और बिना कोई राय बनाए। केवल शुद्ध साक्षी रहें।
एक पंक्ति में सार: जिसने विश्व देखा है वह भले कहे कि यह नहीं है; वासनारहित ज्ञानी क्या करे, वह देखते हुए भी नहीं देखता।
English
Translation: Let him who has perceived the universe deny its existence; but what can the desireless one do? Even while looking, he does not see.
Simple explanation: Denying the universe is necessary only for the mind that still credits it with reality. For the desireless sage, whose inner cravings have withered away, sensory perception carries no conviction of independent reality; seeing, he sees not.
विषय और संबंधित श्लोक
- निर्वासन
- पश्यन्नपि-न-पश्यति
- जगत-बाध
- अपरोक्ष-दृष्टि
- श्लोक 18.14: क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता।
- श्लोक 18.16: येन दृष्टं परं ब्रह्म।
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मानक 100-श्लोक क्रम में यह श्लोक 15 है (पहले ड्राफ्ट में 14 लिखा गया था, क्योंकि स्वाराज्ये वाला श्लोक छूट गया था)। मूल पाठ सार्वजनिक अष्टावक्रगीता से मिलाया गया; इस सत्र में पुस्तक का स्कैन फिर नहीं देखा गया।