दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.14
समीक्षा आवश्यक
मूल संस्कृत
क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता । सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva mohaḥ kva ca vā viśvaṃ kva tad dhyānaṃ kva muktatā | sarvasaṅkalpasīmāyāṃ viśrāntasya mahātmanaḥ || 14 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, मोहः, क्व, च, वा, विश्वम्, क्व, तत्, ध्यानम्, क्व, मुक्तता, सर्व-सङ्कल्प-सीमायाम्, विश्रान्तस्य, महात्मनः
- सर्व-सङ्कल्प-सीमायाम् विश्रान्तस्य
- समस्त संकल्पों की अंतिम सीमा पर परम विश्राम पा चुके
- महात्मनः
- उस महात्मा पुरुष के लिए
- क्व मोहः
- कहाँ मोह?
- क्व च वा विश्वम्
- कहाँ यह संसार?
- क्व तत् ध्यानम्
- कहाँ वह ध्यान?
- क्व मुक्तता
- और कहाँ मुक्ति?
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम पा चुके महात्मा के लिए मोह कहाँ, संसार कहाँ, ध्यान कहाँ और मुक्ति भी कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अद्वैत स्थिति के शिखर का वर्णन करता है। जब तक मन में संकल्प-विकल्प उठते हैं, तब तक संसार भी है, मोह भी है, और उससे बचने के लिए ध्यान व मुक्ति की ज़रूरत भी है। किंतु जिस महात्मा के सारे संकल्प शांत हो चुके हैं, जो अपने आत्म-स्वरूप में पूरी तरह विश्राम पा चुका है, उसके लिए अब न कोई मोह बचा है, न संसार, न ध्यान की ज़रूरत और न मुक्ति की चाह। सब कुछ एक अखंड शांत आत्मा में लीन हो चुका है।
सरल हिन्दी में समझें
जब तक मन में विचार और इच्छाएं चलती हैं, तब तक इंसान को लगता है कि "यह दुनिया सच है, मुझे ध्यान लगाना चाहिए ताकि मुझे मोक्ष मिल सके।"
लेकिन जब मन के सारे विचार और इच्छाएं पूरी तरह शांत हो जाती हैं, तो यह सारा प्रपंच खत्म हो जाता है।
उस परम शांत ज्ञानी के लिए न तो कोई मोह बचता है, न दुनिया का कोई डर, न ध्यान लगाने की कोई मजबूरी और न मुक्ति की कोई तलाश। वह पहले से ही उस शांति में बैठा है जो कभी खत्म नहीं होती।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. सर्वसङ्कल्पसीमा चित्त की उस अंतिम अवस्था को सूचित करती है जहाँ कोई नया विचार उत्पन्न नहीं होता। 2. विश्रान्तस्य पद अद्वैत वेदांत की उस चरम तृप्ति का द्योतक है जहाँ सारी खोज समाप्त हो जाती है। 3. क्व ध्यानं क्व मुक्तता यह सिद्ध करता है कि ध्यान साधन है और मुक्ति संकल्प-रहित स्थिति; जब साध्य सिद्ध हो गया तो साधन का क्या काम? 4. माण्डूक्य उपनिषद् के ‘प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं’ का यह प्रत्यक्ष अनुभव है। 5. यह साधक को आध्यात्मिक विधियों के अंत और साक्षात विश्रांति की ओर ले जाता है। 6. सच्ची मुक्ति किसी अनुभव को पकड़ने में नहीं, समस्त संकल्पों के शांत होने में है।
उदाहरण से समझें: जैसे जब कोई यात्री अपनी मंज़िल पर पहुँचकर अपने घर के बिस्तर पर लेट जाता है, तो उसके लिए रास्ता, गाड़ी और टिकट सब समाप्त हो जाते हैं; वैसे ही आत्म-विश्रांति मिलने पर सारे साधन शांत हो जाते हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी बहुत लंबी और थकाऊ समस्या का समाधान पा लेते हैं, तो उसके बाद आप उस समस्या और उसके समाधान दोनों के बारे में सोचना बंद कर देते हैं; ज्ञानी की स्थिति भी ऐसी ही होती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सारे मानसिक संकल्पों को विदा कर दीजिए; जब मन पूरी तरह विश्राम पा लेगा, तो संसार और मुक्ति दोनों के विकल्प शांत हो जाएंगे।
सामान्य गलतफहमी
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘क्व ध्यानं क्व मुक्तता’ का अर्थ साधना का अनादर करना नहीं है; यह उस अवस्था की बात है जहाँ साधना फलित हो चुकी है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज दिन के अंत में 5 मिनट के लिए अपने सारे विचारों और योजनाओं को रोककर केवल यह अनुभव करें कि आप पूर्ण विश्राम में हैं। (रात को)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी ध्यान और मुक्ति को एक ऐसा काम मानकर कर रहा हूँ जिसे पूरा करना बाकी है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "सारे संकल्प शांत हो चुके हैं; न संसार है, न बंधन, न मुक्ति; केवल अखंड शांति है।"
एक पंक्ति में सार: समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम पा चुके महात्मा के लिए न मोह है, न संसार, न ध्यान और न मुक्ति।
English
Translation: Where is delusion, where the universe, where meditation, or where liberation for that great soul who rests at the very limit of all mental volitions?
Simple explanation: For the great soul who rests at the terminal boundary of all mental constructs (saṅkalpa), the entire apparatus of spiritual seeking dissolves. Where there is no delusion, neither universe nor meditation nor liberation remains meaningful.
विषय और संबंधित श्लोक
- संकल्प-सीमा
- परम-विश्रांति
- साधन-मुक्ति
- महात्मा
- श्लोक 18.13: यथा जीवनमेवेह।
- श्लोक 18.15: येन विश्वमिदं दृष्टम्।
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मानक 100-श्लोक क्रम में यह श्लोक 14 है (पहले ड्राफ्ट में 13 लिखा गया था, क्योंकि स्वाराज्ये वाला श्लोक छूट गया था)। मूल पाठ सार्वजनिक अष्टावक्रगीता से मिलाया गया; इस सत्र में पुस्तक का स्कैन फिर नहीं देखा गया।