दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.23
सत्यापित
मूल संस्कृत
कुत्रापि न जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित् । आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः ॥ २३ ॥
IAST लिप्यंतरण
kutrāpi na jihāsāsti nāśo vāpi na kutracit | ātmārāmasya dhīrasya śītalācchatarātmanaḥ || 23 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
कुत्रापि, न, जिहासा, अस्ति, नाशः, वा, अपि, न, कुत्रचित्, आत्मारामस्य, धीरस्य, शीतल-अच्छतर-आत्मनः
- आत्मारामस्य धीरस्य
- अपने ही आत्मस्वरूप में रमण करने वाले धैर्यवान पुरुष को
- शीतल-अच्छतर-आत्मनः
- जिसका अंतःकरण परम शीतल और अत्यंत निर्मल (स्वच्छ) है
- कुत्रापि जिहासा न अस्ति
- कहीं भी किसी वस्तु को छोड़ने (त्यागने) की इच्छा नहीं होती
- कुत्रचित् नाशः वा अपि न
- और न किसी वस्तु के नष्ट होने पर कोई हानि या अभाव प्रतीत होता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अपने आत्मस्वरूप में रमण करने वाले, शीतल और परम निर्मल अंतःकरण वाले धीर पुरुष की न कहीं त्यागने की इच्छा होती है और न कहीं कोई हानि या विनाश दिखाई देता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: त्याग और विनाश का भय उसी को सताता है जो बाह्य वस्तुओं में सुख मानता है। जब तक मनुष्य सोचता है कि "यह वस्तु मेरी है", तब तक उसे उसके खोने का डर रहता है या वह वैराग्य के घमंड में उसे त्यागने की कोशिश करता है। किंतु जो ज्ञानी अपनी आत्मा में ही अखंड तृप्त (आत्माराम) है और जिसका मन दर्पण की तरह स्वच्छ और शीतल है, उसके लिए न कुछ छोड़ने योग्य है और न कुछ खोने योग्य। वह जानता है कि जो नष्ट होता है वह मिथ्या है, और जो सत्य आत्मा है उसका कभी नाश नहीं हो सकता।
सरल हिन्दी में समझें
जब किसी बच्चे को असली हीरे की माला मिल जाती है, तो क्या वह मिट्टी के कंकड़ों को फेंकने की अलग से योजना बनाता है? कंकड़ तो अपने आप छूट जाते हैं।
ज्ञानी को अपने ही भीतर परमात्मा का वह खज़ाना मिल चुका है जिसके बाद किसी और चीज़ की चाह नहीं रहती।
उसे न तो किसी चीज़ को ज़बरदस्ती छोड़ने की ज़रूरत महसूस होती है, और न किसी चीज़ के खो जाने पर दुख होता है। उसका दिल बिल्कुल साफ़ पानी की तरह शांत और निर्मल रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. आत्मारामस्य वह सर्वोच्च आत्मतृप्ति है जहाँ बाह्य विषयों की रमणीयता शून्य हो जाती है। 2. जिहासा (त्यागने की इच्छा) भी एक प्रकार का द्वंद्व है; सच्चा संन्यास त्याग के अहंकार से भी मुक्ति है। 3. नाशः न कुत्रचित् आत्मा की नित्यता और अविनाशी स्वभाव का दृढ़ साक्षात्कार है। 4. शीतलाच्छतरात्मनः उपशांत और सर्वथा निर्मल अंतःकरण का द्योतक है। 5. जब कुछ अपना था ही नहीं, तो क्या छूटा और क्या नष्ट हुआ? यह निर्भयता की पराकाष्ठा है। 6. साधक को त्याग के अहंकार और संग्रह के भय दोनों से मुक्त करता है।
उदाहरण से समझें: जैसे आकाश में बादल आते हैं और बिखर जाते हैं, लेकिन आकाश न बादलों को भगाता है और न उनके मिटने पर रोता है, वैसे ही ज्ञानी के मन में वस्तुओं का आना-जाना सहज रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप क्लाउड स्टोरेज में अपनी फाइलों का बैकअप रख लेते हैं, तो हार्ड ड्राइव खराब होने पर भी आपको डेटा खोने का डर नहीं होता; आत्मा में स्थित व्यक्ति संसार के नुकसान से ऐसे ही बेपरवाह रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने भीतर के आत्म-आनंद को पहचानिए; जब भीतर तृप्ति होगी तो न कुछ खोने का डर रहेगा न त्यागने का तनाव।
सामान्य गलतफहमी
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘न जिहासास्ति’ का अर्थ यह नहीं है कि बुरी आदतों या अधर्म को न छोड़ा जाए; यह आत्मज्ञानी की अकिंचनता का वर्णन है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई छोटी चीज़ खो जाए या टूट जाए, तो तुरंत कहें: "मेरा आत्म-आनंद अखंड है, कोई बाह्य वस्तु मुझे कम नहीं कर सकती।" (नुकसान होने पर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं चीज़ों को पकड़ने या ज़बरदस्ती छोड़ने के मानसिक तनाव में अपनी आंतरिक शांति खो रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन में दोहराएँ: "मैं आत्माराम हूँ; मेरा कोई नुकसान नहीं हो सकता, मेरा वास्तविक स्वरूप सदा परिपूर्ण है।"
एक पंक्ति में सार: आत्म-रमण करने वाले निर्मल ज्ञानी को न कुछ त्यागने की इच्छा होती है और न कहीं कोई नाश दिखाई देता है।
English
Translation: Nowhere does he have a desire to renounce, nor does he see loss anywhere—the wise one who rejoices in the Self, whose mind is serene and utterly pure.
Simple explanation: Rejoicing solely in the Self and blessed with a cool, transparent nature, the steadfast sage harbors no urge to abandon anything, nor does he register any loss. Resting in absolute wholeness, he fears no depletion.
विषय और संबंधित श्लोक
- आत्माराम
- त्याग-अहंकार-मुक्ति
- शीतलाच्छतरात्मन्
- अविनाशी-बोध
- श्लोक 18.22: असंसारस्य तु क्वापि।
- श्लोक 18.24: प्रकृत्या शून्यचित्तस्य।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तेईसवाँ श्लोक।