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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.24
सत्यापित
मूल संस्कृत
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया । प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता ॥ २४ ॥
IAST लिप्यंतरण
prakṛtyā śūnyacittasya kurvato'sya yadṛcchayā | prākṛtasyeva dhīrasya na māno nāvamānatā || 24 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
प्रकृत्या, शून्य-चित्तस्य, कुर्वतः, अस्य, यदृच्छया, प्राकृतस्य, इव, धीरस्य, न, मानः, न, अवमानता
- प्रकृत्या शून्य-चित्तस्य
- स्वभाव से ही संकल्प-विकल्प शून्य चित्त वाले
- यदृच्छया कुर्वतः अस्य
- और प्रारब्धवश प्राप्त कार्यों को अनायास करते हुए
- प्राकृतस्य इव धीरस्य
- साधारण अज्ञानी मनुष्य की भाँति व्यवहार करते हुए भी ज्ञानी का
- न मानः न अवमानता
- न कोई मान (सम्मान) होता है और न कोई अपमान
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
स्वभाव से ही अहंकार-शून्य चित्त वाले, प्रारब्ध अनुसार अनायास कर्म करते हुए और साधारण मनुष्य की तरह दिखाई देते हुए भी धीर पुरुष के लिए न मान है और न अपमान।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: मान और अपमान की चोट केवल अहंकार (अस्मिता) पर लगती है। जब तक मनुष्य अपने को कोई विशेष पदवी, जाति या प्रतिष्ठा वाला मानता है, तब तक कोई प्रशंसा करे तो उसे अहंकार होता है और निंदा करे तो क्रोध। किंतु ज्ञानी का चित्त स्वाभाविक रूप से शून्य (अहंकार-रहित) हो चुका है। वह प्रारब्धवश जो कार्य सामने आ जाए, उसे एक साधारण मनुष्य (प्राकृत) की तरह सहजता से करता है। इसलिए उसकी दृष्टि में न कोई मान है और न अपमान।
सरल हिन्दी में समझें
अगर कोई दीवार की तारीफ़ करे या उसे गाली दे, तो क्या दीवार पर कोई असर पड़ता है? नहीं, क्योंकि दीवार के अंदर कोई झूठा घमंड नहीं है।
ज्ञानी व्यक्ति का मन भी अंदर से बिल्कुल खाली और साफ़ होता है। बाहर से देखने पर वह एक आम इंसान की तरह खाना खाता है, चलता-फिरता है और काम करता है।
लेकिन अगर कोई उसकी बहुत तारीफ़ करे तो वह फूलता नहीं, और अगर कोई उसकी बेइज़्ज़ती करे तो वह दुखी नहीं होता। मान और अपमान उसके लिए दोनों बराबर हैं।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. शून्यचित्तस्य का अर्थ बौद्ध शून्यवाद नहीं, बल्कि चित्त का वासनाओं और अहंकार से सर्वथा रिक्त होना है। 2. यदृच्छया कुर्वतः प्रारब्ध-कर्म के निष्काम और अनायास संपादन को सूचित करता है। 3. प्राकृतस्य इव दिखाता है कि ज्ञानी कोई दिखावटी या विचित्र वेश बनाकर नहीं घूमता; वह अत्यंत स्वाभाविक रहता है। 4. मान और अपमान द्वंद्व हैं जिनका अधिष्ठान देहाभिमान है; देहाभिमान मिटते ही दोनों मिथ्या हो जाते हैं। 5. यह स्थिति गीता के ‘तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी’ के आदर्श को साकार करती है। 6. साधक को सामाजिक प्रतिष्ठा की भूख से मुक्त होकर आत्म-सम्मान में प्रतिष्ठित होने का मार्ग दिखाती है।
उदाहरण से समझें: जैसे सूरज के ऊपर चाहे कोई फूल बरसाए या धूल फेंके, सूरज अपने प्रकाश में अडिग रहता है, वैसे ही ज्ञानी मान-अपमान से अप्रभावित रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट पर 10,000 लाइक्स आ जाएँ या 100 ट्रोल कमेंट्स, अगर आप जानते हैं कि आपकी योग्यता इन नंबरों से तय नहीं होती तो आप मुस्कुराकर आगे बढ़ जाते हैं; ज्ञानी भी मान-अपमान को ऐसे ही देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दूसरों की तारीफ़ या आलोचना को अपने सिर पर मत चढ़ाइए; अपने आत्म-स्वरूप में रहकर मान-अपमान से परे हो जाइए।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘शून्यचित्तस्य’ का अर्थ सुध-बुध खो देना या गैर-जिम्मेदार हो जाना नहीं है; यह कर्ता-अहंकार की समाप्ति है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई आपकी आलोचना करे, तो तुरंत गुस्सा होने के बजाय कहें: "यह मेरे शरीर या काम की राय है, मेरी शांत आत्मा का इससे कोई अपमान नहीं।" (आलोचना पर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं हर समय इस चिंता में रहता हूँ कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे और मेरा कितना सम्मान करेंगे?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मान और अपमान केवल हवा की तरंगें हैं; मैं अचल, अखंड और पूर्ण आत्म-चैतन्य हूँ।"
एक पंक्ति में सार: अहंकार-शून्य चित्त वाले ज्ञानी के लिए, जो सहज भाव से जीता है, न कोई मान है और न अपमान।
English
Translation: For the steadfast one whose mind is inherently void of ego, who acts spontaneously like an ordinary man, there is neither honor nor dishonor.
Simple explanation: Naturally devoid of egocentric mental fabrications, acting effortlessly as circumstances unfold and appearing quite ordinary to worldly observers, the wise sage is untouched by honor or disgrace.
विषय और संबंधित श्लोक
- शून्यचित्त
- मान-अपमान-समता
- प्राकृतवत्-आचरण
- यदृच्छा-कर्म
- श्लोक 18.23: शीतलाच्छतरात्मनः।
- श्लोक 18.25: कृतं देहेन कर्मेदम्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का चौबीसवाँ श्लोक।