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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.25
सत्यापित
मूल संस्कृत
कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा । इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न ॥ २५ ॥
IAST लिप्यंतरण
kṛtaṃ dehena karmedaṃ na mayā śuddharūpiṇā | iti cintānurodhī yaḥ kurvannapi karoti na || 25 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
कृतम्, देहेन, कर्म, इदम्, न, मया, शुद्ध-रूपिणा, इति, चिन्ता-अनुरोधी, यः, कुर्वन्, अपि, करोति, न
- इदम् कर्म देहेन कृतम्
- यह कर्म शरीर और इंद्रियों द्वारा किया गया है
- शुद्ध-रूपिणा मया न
- मुझ विशुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मा द्वारा नहीं
- इति चिन्ता-अनुरोधी यः
- इस प्रकार के आत्म-निश्चय में जो स्थित रहता है
- कुर्वन् अपि न करोति
- वह कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
‘यह कर्म देह ने किया है, मुझ शुद्ध चैतन्यस्वरूप ने नहीं’—इस प्रकार के दृढ़ बोध में स्थित पुरुष सब कुछ करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अद्वैत वेदांत का मूलमंत्र है कि आत्मा स्वभाव से अकर्ता और अभोक्ता है। कर्म तो पंचभूतों से बने शरीर, प्राण और मन के द्वारा होते हैं। जब तक मनुष्य यह मानता है कि "मैंने किया", तब तक वह कर्म के फल (पुण्य या पाप) से बंधता है। किंतु जो ज्ञानी यह दृढ़ता से जानता है कि "मैं तो केवल साक्षी और शुद्ध रूप हूँ, सारे कर्म शरीर द्वारा प्रकृति के नियमों से हो रहे हैं", वह लोकदृष्टि में कर्म करता हुआ भी आंतरिक रूप से सर्वथा अकर्ता रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
जब आपकी कार सड़क पर चलती है, तो क्या आप कहते हैं कि "मेरे पैर पहिए बनकर घूम रहे हैं"? नहीं, आप जानते हैं कि पहिए इंजन से घूम रहे हैं और आप सिर्फ ड्राइवर हैं।
इसी तरह, ज्ञानी जानता है कि हाथ-पैर और दिमाग शरीर के अंग हैं जो अपना काम कर रहे हैं। आत्मा तो इन सबसे अलग, बिल्कुल शुद्ध और देखने वाली शक्ति है।
इसलिए वह दिनभर सारे काम अच्छे से निभाता है, लेकिन उसके मन पर कोई बोझ या घमंड नहीं चढ़ता। वह कर्म करके भी अकर्ता रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. देहेन कृतम् कर्म सांख्य और वेदांत के प्रकृति-पुरुष विवेक का व्यावहारिक सूत्र है। 2. शुद्धरूपिणा मया आत्मा की निर्विकारता और असंगता को उद्घाटित करता है। 3. चिन्तानुरोधी का अर्थ केवल बौद्धिक विचार नहीं, बल्कि अपरोक्ष आत्म-निश्चय में निरंतर स्थिति है। 4. कुर्वन्नपि न करोति कर्मबंधन से मुक्ति का रहस्य है—कर्तापन का त्याग ही सच्चा नैष्कर्म्य है। 5. यह गीता के ‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (१३.३१) का सीधा प्रतिध्वनि है। 6. साधक को कर्म करते हुए भी कर्तापन के तनाव और अहंकार से मुक्त होने की कुंजी देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे बिजली के पंखे को चलाने पर पंखा घूमता है, लेकिन बिजली खुद नहीं घूमती; वैसे ही शरीर कर्म करता है, शुद्ध आत्मा केवल प्रकाशक रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक कुशल पायलट ऑटोपायलट पर विमान उड़ाते समय हर सिस्टम पर नज़र रखता है लेकिन खुद इंजन को धक्का नहीं लगाता; ज्ञानी अपने शरीर-मन के काम को साक्षी भाव से ऐसे ही देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: काम को अपनी पूरी लगन से कीजिए, लेकिन कर्तापन का अहंकार मत पालिए; आप शुद्ध आत्मा हैं, कर्म देह का धर्म है।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘न मया कृतम्’ का बहाना बनाकर कोई अपने अनैतिक या गैर-जिम्मेदाराना आचरण से नहीं बच सकता; यह आंतरिक अनासक्ति का सूत्र है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज कोई बड़ा काम पूरा करने के बाद मन में कहें: "ईश्वर और प्रकृति ने यह कार्य कराया, मैं तो केवल साक्षी और शांत आत्मा हूँ।" (सफलता मिलने पर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने हर छोटे-बड़े काम का श्रेय लेकर अपने अहंकार को भारी बना रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर साँसों को देखें और अनुभव करें: "साँसें अपने आप चल रही हैं, शरीर काम कर रहा है; मैं शुद्ध अकर्ता साक्षी हूँ।"
एक पंक्ति में सार: यह कर्म देह ने किया है मुझ शुद्ध आत्मा ने नहीं—इस बोध में स्थित ज्ञानी कर्म करता हुआ भी अकर्ता रहता है।
English
Translation: Thinking "This action was performed by the body, not by me who am pure awareness," the one who abides in such realization does not act even while acting.
Simple explanation: Anchored in the unbroken conviction that "this deed was carried out by the physical vehicle, never by me, the immaculate Self," he remains entirely actionless in the midst of all action.
विषय और संबंधित श्लोक
- अकर्ता-भाव
- शुद्धरूप-आत्मा
- देहेन-कृतम्
- नैष्कर्म्य-सिद्धि
- श्लोक 18.24: प्रकृत्या शून्यचित्तस्य।
- श्लोक 18.26: अतद्वादीव कुरुते।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का पचीसवाँ श्लोक।