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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक २८/१००28%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.28

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

असमाधेरविक्षेपान् न मुमुक्षुर्न चेतरः । निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्ते महाशयः ॥ २८ ॥

IAST लिप्यंतरण

asamādher avikṣepān na mumukṣur na cetaraḥ | niścitya kalpitaṃ paśyan brahmaivāste mahāśayaḥ || 28 ||

सरल उच्चारण: asamaadher avikshepaan na mumukshur na chetarah nishchitya kalpitam pashyan brahmaivaaste mahaashayah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

असमाधेः, अविक्षेपात्, न, मुमुक्षुः, न, च, इतरः, निश्चित्य, कल्पितम्, पश्यन्, ब्रह्म, एव, आस्ते, महाशयः

असमाधेः अविक्षेपात्
न समाधि का हठ होने से और न चित्त में विक्षेप होने से
न मुमुक्षुः न च इतरः
वह न मुक्ति की इच्छा वाला है और न बद्ध (संसारी)
कल्पितम् पश्यन् निश्चित्य
संसार को केवल कल्पित निश्चयपूर्वक देखता हुआ
महाशयः ब्रह्म एव आस्ते
वह उदारचेता महापुरुष स्वयं ब्रह्मरूप होकर स्थित रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

न समाधि के हठ से और न चित्त के विक्षेप से, न मुमुक्षु होकर और न संसारी होकर, संपूर्ण संसार को कल्पित जानकर वह उदारचेता ज्ञानी स्वयं ब्रह्म होकर स्थित रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: समाधि की आवश्यकता उसे होती है जिसका चित्त विक्षिप्त हो और जो एकाग्रता पाना चाहता हो। मुक्ति की चाह उसे होती है जो अपने को बंधन में मानता हो। किंतु जो ज्ञानी यह जान चुका है कि आत्मा कभी बंधी ही नहीं थी, उसके लिए न समाधि का कोई आग्रह है और न विक्षेप का कोई डर। वह सारे दृश्य जगत को स्वप्न की तरह मन की कल्पना समझकर स्वयं साक्षात ब्रह्मस्वरूप होकर शांत रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

जो व्यक्ति पहले से ही अपने घर में बैठा हुआ है, क्या उसे घर पहुँचने के लिए टिकट खरीदने या भागने की ज़रूरत है? बिल्कुल नहीं।

संसारी लोग दुनिया में उलझे हैं, और कुछ साधक समाधि लगाने की ज़िद में परेशान हैं। लेकिन ज्ञानी को समझ आ गया है कि वह तो सदा से मुक्त और परिपूर्ण है।

उसे न तो आँखें बंद करके समाधि लगाने की मजबूरी है और न दुनिया से भागने की ज़रूरत। वह जानता है कि सब कुछ आत्मा का ही खेल है, और वह खुद ब्रह्म बनकर शांति से रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. असमाधेरविक्षेपात् द्वैत के दोनों छोरों (समाधि और विक्षेप) से परे तुरीयावस्था का प्रतिपादन है। 2. न मुमुक्षुः न इतरः बंधन और मोक्ष दोनों की पारमार्थिक असत्यता की घोषणा है (मांडूक्य ३.४८)। 3. निश्चित्य कल्पितम् पश्यन् संसार के मिथ्यात्व और अधिष्ठान ब्रह्म की सत्यता का अपरोक्ष बोध है। 4. महाशयः उस विशाल अंतःकरण का सूचक है जिसमें पूरा ब्रह्मांड समा जाता है पर कोई विकार नहीं होता। 5. ब्रह्मैवास्ते अद्वैत का चरम फल है—‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’। 6. साधक को साधना की कृत्रिमता से उठाकर सहज आत्म-स्थिति में प्रतिष्ठित करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे अंतरिक्ष में चाहे तेज़ आँधी चले या शांति रहे, अंतरिक्ष न आँधी से बिगड़ता है और न शांति से नया बनता है; ज्ञानी का अंतःकरण ऐसा ही महाशय ब्रह्मरूप रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी मूवी स्क्रीन को देखें, तो परदे को न फिल्म के हीरो से प्यार होता है न विलेन से नफरत; ज्ञानी का चित्त संसार के नाटक को स्क्रीन की तरह ब्रह्म में देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: समाधि लगाने या भागने की ज़िद छोड़िए; यह जानिए कि आप अभी इसी क्षण पूर्ण और मुक्त ब्रह्म हैं।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘न मुमुक्षुः’ का अर्थ साधना या सदाचार का त्याग करके आलसी हो जाना नहीं है; यह सिद्धावस्था की विश्रांति है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन में बहुत बेचैनी या ध्यान न लगने की शिकायत हो, तो कहें: "मेरी आत्मा न विक्षिप्त होती है न समाधिस्थ, वह सदा मुक्त ब्रह्म है।" (साधना के तनाव में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मोक्ष को कोई भविष्य का लक्ष्य मानकर वर्तमान की अपनी नित्य पूर्णता को भूल रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "कोई बंधन नहीं, कोई अभ्यास नहीं; मैं केवल व्यापक, शांत और अनंत ब्रह्म हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: न समाधि न विक्षेप, न मुक्ति की चाह न बंधन; संसार को कल्पित जानकर ज्ञानी ब्रह्म होकर स्थित रहता है।

English

Translation: Free from the need for samadhi as from mental distraction, neither a seeker of liberation nor bound, knowing the world to be imagined, the noble-minded one abides as Brahman alone.

Simple explanation: Neither craving absorption nor distressed by distraction, neither striving for release nor bound by bondage, the magnanimous sage recognizes all phenomena as mere conceptual overlay and rests serenely as Brahman itself.

विषय और संबंधित श्लोक

  • असमाधि-अविक्षेप
  • मुमुक्षा-पार
  • ब्रह्म-स्थिति
  • महाशय
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.27: विश्रान्तिमागतः।
  • श्लोक 18.29: यस्यान्तः स्यादहङ्कारः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 289–291 (PDF पृ. 296–298)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का अट्ठाईसवाँ श्लोक।