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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.29
सत्यापित
मूल संस्कृत
यस्यान्तः स्यादहङ्कारो न करोति करोति सः । निरहङ्कारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम् ॥ २९ ॥
IAST लिप्यंतरण
yasyāntaḥ syād ahaṅkāro na karoti karoti saḥ | nirahaṅkāradhīreṇa na kiñcid akṛtaṃ kṛtam || 29 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
यस्य, अन्तः, स्यात्, अहङ्कारः, न, करोति, करोति, सः, निरहङ्कार-धीरेण, न, किञ्चित्, अकृतम्, कृतम्
- यस्य अन्तः अहङ्कारः स्यात्
- जिसके अंतःकरण में कर्तापन का अहंकार बना रहता है
- न करोति सः करोति
- वह कर्म न करता हुआ भी कर्म का फल भोगने हेतु कर्ता ही है
- निरहङ्कार-धीरेण
- किंतु अहंकार-शून्य ज्ञानी पुरुष द्वारा
- किञ्चित् कृतम् अकृतम् न
- कर्म किए जाने पर भी वास्तव में कुछ भी नहीं किया गया होता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जिसके भीतर अहंकार है, वह कर्म न करता हुआ भी वास्तव में कर्ता ही है; किंतु अहंकार-रहित धीर पुरुष द्वारा सब कुछ किए जाने पर भी वास्तव में कुछ नहीं किया गया होता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह कर्म और अकर्म का सबसे गहरा रहस्य है। जो अज्ञानी बाहर से हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाए, किंतु मन में यह सोचता रहे कि "मैं त्याग कर रहा हूँ", वह अहंकार के कारण कर्मों के बंधन में बंधा रहता है। इसके विपरीत, जिस ज्ञानी के भीतर से "मैं कर्ता हूँ" का भाव पूरी तरह मिट चुका है, वह चाहे राजा बनकर पूरे देश का शासन चलाए, फिर भी वह सर्वथा निष्पाप और अकर्ता ही रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
कल्पना कीजिए कि दो लोग हैं: एक व्यक्ति बिस्तर पर चुपचाप पड़ा है लेकिन मन ही मन सबको कोस रहा है और योजनाएं बना रहा है; दूसरा व्यक्ति दिनभर अनाथालय में काम कर रहा है लेकिन दिल से सोचता है कि "यह सब ईश्वर की कृपा से हो रहा है, मैं कुछ नहीं।"
पहला व्यक्ति कुछ न करके भी बहुत बड़ा कर्ता और पापी बन रहा है, जबकि दूसरा सब कुछ करके भी बिल्कुल अलिप्त और पवित्र है।
कर्म हाथ-पैर से नहीं, बल्कि अहंकार से बनता है। जब अहंकार नहीं, तो कर्म का कोई बंधन नहीं।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. अहङ्कारः बन्धस्य मूलम्—बंधन कर्म में नहीं, कर्तापन के अभिमान में है। 2. न करोति करोति सः यह दर्शाता है कि मानसिक क्रिया ही वास्तविक कर्म है। 3. निरहङ्कारधीरेण अद्वैत जीवनमुक्ति की आधारशिला है। 4. न किञ्चित् कृतम् अकृतम् नैष्कर्म्य-सिद्धि की चरम अवस्था है जहाँ कर्म भस्म हो जाते हैं। 5. यह गीता के ‘कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः’ (४.१८) का सटीक दार्शनिक भाष्य है। 6. साधक को बाहरी क्रिया-त्याग के बदले आंतरिक अहंकार के विसर्जन का उपदेश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे पत्थर की मूर्ति पर पानी डालने से उस पर कोई असर नहीं होता, वैसे ही अहंकार-शून्य ज्ञानी के द्वारा किए गए कर्मों का कोई संस्कार उस पर नहीं चिपकता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी कंपनी में निष्काम भाव से कोड लिखते हैं और उसका पेटेंट कंपनी के नाम होता है, तो कानूनी दायित्व कंपनी का होता है आपका नहीं; ज्ञानी भी कर्म का सारा दायित्व प्रकृति को सौंपकर मुक्त रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: काम छोड़ने से कोई मुक्त नहीं होता, अहंकार छोड़ने से मुक्त होता है; मैं-पन विदा कीजिए और निर्लेप हो जाइए।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘न किञ्चित् कृतम्’ का अर्थ यह नहीं है कि कोई अपराध करके कहे कि मैंने नहीं किया; यह नैतिक कर्मों में अहंकार-शून्यता की बात है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी कोई अच्छा काम करें, तो तुरंत मन में कहें: "प्रकृति ने कराया, मेरा कोई कर्तापन नहीं।" (काम करते समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं केवल बाहरी काम छोड़कर खुद को धार्मिक मान रहा हूँ, जबकि मन में अहंकार भरा हुआ है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "शरीर और मन के कर्म प्रकृति के प्रवाह हैं; मैं नित्य अकर्ता और विशुद्ध साक्षी हूँ।"
एक पंक्ति में सार: जिसमें अहंकार है वह न करके भी कर्ता है; अहंकार-रहित ज्ञानी सब करके भी कुछ नहीं करता।
English
Translation: He within whom egoism still dwells acts even when not acting; but for the steadfast one free from ego, nothing whatsoever is done even when acting.
Simple explanation: Whoever harbors ego within is acting even when physically motionless; yet by the steadfast sage free of self-importance, nothing at all has been done even when intensely active.
विषय और संबंधित श्लोक
- अहंकार-त्याग
- कर्मण्यकर्म
- नैष्कर्म्य
- कर्तापन-मुक्ति
- श्लोक 18.28: ब्रह्मैवास्ते महाशयः।
- श्लोक 18.30: नोद्विग्नं न च सन्तुष्टम्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का उनतीसवाँ श्लोक।