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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ३८/१००38%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.38

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः । एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः ॥ ३८ ॥

IAST लिप्यंतरण

nirādhārā grahavyagrā mūḍhāḥ saṃsārapoṣakāḥ | etasyānarthamūlasya mūlacchedaḥ kṛto budhaiḥ || 38 ||

सरल उच्चारण: niraadhaaraa grahavyagraa moodhaah samsaaraposhakaah etasyaanarthamoolasya moolachchhedah krito budhaih (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

निराधाराः, ग्रह-व्यग्राः, मूढाः, संसार-पोषकाः, एतस्य, अनर्थ-मूलस्य, मूल-च्छेदः, कृतः, बुधैः

मूढाः निराधाराः ग्रह-व्यग्राः
मूढ़ लोग निराधार होते हुए भी पकड़ (आग्रह) से व्याकुल होकर
संसार-पोषकाः
संसार रूपी भ्रम का ही पोषण करते रहते हैं
बुधैः कृतः मूल-च्छेदः
किंतु ज्ञानियों द्वारा जड़ से काट दिया गया है
एतस्य अनर्थ-मूलस्य
इस समस्त अनर्थ के कारण अहंकार रूपी मूल को

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

निराधार होते हुए भी किसी न किसी सहारे को पकड़ने के लिए व्याकुल मूढ़ लोग संसार का ही पोषण करते रहते हैं; किंतु ज्ञानियों ने इस समस्त अनर्थ की जड़ (अहंकार) को ही समूल काट दिया है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: अज्ञानी मनुष्य की स्थिति यह है कि उसका अपना कोई स्वतंत्र आधार नहीं है, फिर भी वह कभी धन, कभी परिवार, कभी प्रतिष्ठा और कभी साधना के नियमों को पकड़कर व्याकुल रहता है। इस पकड़ (ग्रह) के कारण ही संसार का चक्र चलता रहता है। अष्टावक्र कहते हैं कि ज्ञानी पुरुषों ने इस सारे अनर्थ की जड़—अर्थात् ‘अहंकार और अविद्या’—को आत्मज्ञान की कुल्हाड़ी से जड़ से काट दिया है। जब जड़ ही कट गई, तो संसार का पेड़ अपने आप सूख जाता है।

सरल हिन्दी में समझें

जब कोई डूबता हुआ इंसान पानी में तिनके को पकड़ने के लिए छटपटाता है, तो वह तिनके को पकड़कर भी डूबता ही है।

अज्ञानी लोग ज़िंदगी में हमेशा किसी न किसी चीज़ को पकड़ने के पीछे पागल रहते हैं—"यह मेरा सहारा है, वह मेरा सहारा है।" और यही पकड़ उन्हें दुखों के दलदल में धकेलती रहती है।

लेकिन समझदार ज्ञानी जानते हैं कि यह पकड़ ही सारे दुखों की जड़ है। उन्होंने अपने अहंकार की जड़ ही काट दी है, इसलिए वे बिल्कुल हल्के और आज़ाद होकर जीते हैं।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. निराधाराः आत्मा का स्वभाव निरालंब है, किंतु अज्ञानी कल्पित आलंबनों के पीछे भागता है। 2. ग्रहव्यग्राः मन के उस आग्रह और पकड़ की ओर संकेत है जो भय और असुरक्षा से उत्पन्न होती है। 3. संसारपोषकाः यह स्पष्ट करता है कि संसार कोई बाहर की वस्तु नहीं, हमारे मानसिक आग्रहों का ही विस्तार है। 4. अनर्थमूलस्य मूलच्छेदः अविद्या और अस्मिता का समूल नाश है (गीता १५.३ ‘असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’)। 5. बुधैः ज्ञानी की उस प्रज्ञा को दर्शाता है जो शाखाओं को काटने के बजाय सीधे जड़ पर प्रहार करती है। 6. साधक को बाहरी परिस्थितियों से लड़ने के बदले आंतरिक पकड़ और अहंकार को विसर्जित करने का मार्ग दिखाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे पेड़ की डालियों को छाँटने से पेड़ नहीं मरता, बल्कि जड़ काट देने पर पूरा पेड़ सूख जाता है; वैसे ही अहंकार की जड़ कटते ही सारे सांसारिक दुख स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी पुराने और धीमे कंप्यूटर के 100 वायरस हटाने के बजाय पूरी हार्ड ड्राइव को क्लीन फॉर्मेट कर देते हैं, तो सिस्टम तुरंत नया और तेज़ हो जाता है; ज्ञानी अहंकार की जड़ को ऐसे ही फॉर्मेट कर देता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: चीज़ों को पकड़ने की आदत छोड़िए; सारे दुखों की जड़ यह झूठा अहंकार है, इसे आत्मज्ञान से विदा कीजिए।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘मूलच्छेदः कृतः’ का अर्थ संसार में तोड़फोड़ करना या रिश्तों का अनादर करना नहीं है; यह अंतःकरण के मिथ्या अहंकार की समाप्ति है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब किसी चीज़ को लेकर बहुत असुरक्षा या डर लगे, तो कहें: "मेरा एकमात्र सच्चा आधार मेरी अमर आत्मा है।" (असुरक्षा के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं बाहरी नश्वर चीज़ों को अपना सहारा मानकर दिन-रात डर और चिंता में जी रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मैं आकाश की तरह निराधार और स्वतंत्र हूँ; मुझे किसी बाहरी सहारे की ज़रूरत नहीं, मैं स्वयं पूर्ण हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: सहारे के लिए व्याकुल अज्ञानी संसार को पालते हैं; ज्ञानी इस अनर्थ की जड़ (अहंकार) को ही काट देते हैं।

English

Translation: Lacking foundation yet eager to grasp support, fools merely nourish worldly delusion; but the wise have cut down the very root of this calamity.

Simple explanation: Rootless yet desperately grasping after transient crutches, the ignorant merely sustain empirical delusion; whereas the wise have severed the very root of this entire catastrophe of suffering.

विषय और संबंधित श्लोक

  • मूलच्छेद
  • ग्रह-मुक्ति
  • संसार-पोषण-अंत
  • निराधार-स्वाधीनता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.37: परब्रह्मस्वरूपभाक्।
  • श्लोक 18.39: न शान्तिं लभते मूढो।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 307–308 (PDF पृ. 314–315)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का अडतीसवाँ श्लोक।