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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.37
सत्यापित
मूल संस्कृत
मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति । अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक् ॥ ३७ ॥
IAST लिप्यंतरण
mūḍho nāpnoti tad brahma yato bhavitum icchati | anicchann api dhīro hi parabrahmasvarūpabhāk || 37 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
मूढः, न, आप्नोति, तत्, ब्रह्म, यतः, भवितुम्, इच्छति, अनिच्छन्, अपि, धीरः, हि, परब्रह्म-स्वरूप-भाक्
- मूढः तत् ब्रह्म न आप्नोति
- अज्ञानी उस परब्रह्म को नहीं पाता
- यतः भवितुम् इच्छति
- क्योंकि वह ब्रह्म बनने (होने) की इच्छा करता है
- धीरः अनिच्छन् अपि हि
- किंतु ज्ञानी बिना किसी इच्छा के भी
- परब्रह्म-स्वरूप-भाक्
- स्वयं परब्रह्मस्वरूप का ही अनुभव करता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अज्ञानी उस परब्रह्म को नहीं पा सकता क्योंकि वह ब्रह्म बनने की इच्छा करता है; किंतु धीर पुरुष बिना किसी इच्छा के भी परब्रह्मस्वरूप में ही नित्य प्रतिष्ठित रहता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अद्वैत दर्शन का एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य है। जो वस्तु हम पहले से ही हैं, उसे बनने की इच्छा करना ही अज्ञान है। जैसे कोई सोना यह इच्छा करे कि "मैं सोना बन जाऊँ", तो यह उसकी मूर्खता होगी। अज्ञानी सोचता है कि "मैं जीव हूँ और मुझे ब्रह्म बनना है"—यह इच्छा ही द्वैत को खड़ा रखती है। ज्ञानी जानता है कि वह कभी जीव बना ही नहीं था; इसलिए वह बिना किसी इच्छा के सहज ही परब्रह्मरूप में स्थित रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
अगर कोई लहर समुद्र से प्रार्थना करे कि "हे भगवान, मुझे समुद्र बना दो", तो क्या यह हँसी की बात नहीं होगी? लहर तो पहले से ही समुद्र का पानी है।
अज्ञानी व्यक्ति ब्रह्म बनने की कोशिश करता है, और यही कोशिश उसके आड़े आ जाती है क्योंकि कोशिश करने वाला अहंकार बीच में खड़ा रहता है।
ज्ञानी को कुछ बनने की कोई चाह नहीं होती। वह चुपचाप जान लेता है कि वह हमेशा से वही परमात्मा है, और बिना किसी इच्छा के परब्रह्म के आनंद में मग्न रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. भवितुम् इच्छति में कर्ता और साध्य का द्वैत छिपा है, जो अद्वैत ज्ञान का विरोधी है। 2. इच्छा अभाव की सूचक होती है; जब तक ब्रह्म बनने की इच्छा है, तब तक अपने को ब्रह्म से अलग माना जा रहा है। 3. अनिच्छन्नपि यह सिद्ध करता है कि ब्रह्म कोई इच्छा का फल नहीं, बल्कि नित्य-सिद्ध यथार्थ है। 4. परब्रह्मस्वरूपभाक् आत्मा की उस स्वाभाविक स्थिति का नाम है जहाँ कोई द्वंद्व शेष नहीं। 5. यह उपनिषदों की महावाक्य-दृष्टि ‘तत्त्वमसि’ (तू वही है) का सीधा साक्षात्कार है। 6. साधक को ‘कुछ बनने’ (becoming) की दौड़ से निकालकर ‘जो है’ (being) में विश्राम लेने का उपदेश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे बर्फ का टुकड़ा अगर पानी बनने की इच्छा करे तो व्यर्थ है, वह पिघलते ही पानी ही सिद्ध होता है; ज्ञानी की अहंता मिटते ही वह परब्रह्मस्वरूप ही अनुभव करता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी शीशे के सामने खड़े होकर यह इच्छा करें कि "काश मेरा चेहरा इस शीशे में दिखे", तो यह मूर्खता है क्योंकि वह पहले से दिख रहा है; परब्रह्म भी आपके भीतर पहले से मौजूद है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: कुछ बनने की होड़ छोड़ दीजिए; यह पहचानिए कि आप पहले से ही वही पूर्ण सच्चिदानंद हैं।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘अनिच्छन्नपि’ का अर्थ जीवन के प्रति उदासीन या निराश हो जाना नहीं है; यह आध्यात्मिक इच्छाओं की तृप्ति का चरम शिखर है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब मन में खुद को बेहतर या बड़ा साबित करने की बेचैनी हो, तो 1 मिनट शांत रहकर कहें: "मेरी आत्मा पहले से ही पूर्ण ब्रह्म है।" (तनाव के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं आध्यात्मिक साधना में भी एक नई पहचान (पहचान का अहंकार) बनाने की कोशिश कर रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मुझे कुछ नहीं बनना है, कहीं नहीं जाना है; मैं अभी, इसी क्षण पूर्ण परब्रह्म हूँ।"
एक पंक्ति में सार: अज्ञानी ब्रह्म बनने की इच्छा के कारण उसे नहीं पाता; ज्ञानी बिना इच्छा के भी परब्रह्मस्वरूप रहता है।
English
Translation: The fool does not attain that Brahman because he desires to become it; while the steadfast one, even without desiring, partakes of the nature of Supreme Brahman.
Simple explanation: The foolish seeker fails to attain that Brahman precisely because he strives to become it; whereas the steadfast sage, free from any craving to become anything, naturally embodies the Supreme Brahman.
विषय और संबंधित श्लोक
- नित्य-सिद्ध-ब्रह्म
- इच्छा-त्याग
- जीव-ब्रह्म-ऐक्य
- स्वरूप-स्थिति
- श्लोक 18.36: मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः।
- श्लोक 18.38: निराधारा ग्रहव्यग्राः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का सैंतीसवाँ श्लोक।