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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.4
सत्यापित
मूल संस्कृत
भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित् परमार्थतः । नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम् ॥ ४ ॥
IAST लिप्यंतरण
bhavo'yaṃ bhāvanāmātro na kiñcit paramārthataḥ | nāsty abhāvaḥ svabhāvānāṃ bhāvābhāvavibhāvinām || 4 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
भवः, अयम्, भावना-मात्रः, न, किञ्चित्, परमार्थतः, न, अस्ति, अभावः, स्वभावानाम्, भाव-अभाव-विभाविनाम्
- अयम् भवः भावना-मात्रः
- यह संसार केवल मन की कल्पना और विचार मात्र है
- परमार्थतः किञ्चित् न
- परमार्थ दृष्टि से यह वास्तव में कुछ भी नहीं है
- भाव-अभाव-विभाविनाम्
- भाव (होने) और अभाव (न होने) को जानने वाली आत्मा के
- स्वभावानाम् अभावः न अस्ति
- स्वाभाविक चैतन्य स्वरूप का कभी अभाव नहीं होता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
यह संसार केवल भावना (कल्पना) मात्र है, परमार्थ रूप से कुछ भी नहीं है; भाव और अभाव को जानने वाले आत्म-स्वभाव का कभी अभाव नहीं होता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अद्वैत तत्व के मूल सत्य को प्रकट करता है। संसार क्या है? अष्टावक्र कहते हैं कि यह केवल मन की भावना (विचारों का जाल) है। जैसे रस्सी में सांप केवल भावना मात्र है, वैसे ही आत्मा में यह जगत केवल कल्पना है। जगत के आने और जाने, बनने और मिटने (भावाभाव) को जो साक्षी चेतना जानती है, उस साक्षी का कभी नाश नहीं होता। वह सदा ज्यों-का-त्यों विद्यमान रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
हम जिस दुनिया को इतना ठोस और भारी मानते हैं, अष्टावक्र कहते हैं कि वह असल में हमारे विचारों और कल्पनाओं का एक खेल है।
जब आप गहरी नींद में होते हैं, तो यह दुनिया कहाँ चली जाती है? तब यह नहीं होती। लेकिन जब आप जागते हैं, तो मन इसे फिर से बना लेता है।
संसार की चीज़ें कभी बनती हैं और कभी मिटती हैं; लेकिन इन सब चीज़ों के बनने और मिटने को जो चेतना देख रही है—यानी आप खुद—वह कभी नहीं मिटती। आप अमर और सदा रहने वाले सत्य हैं।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. भवोऽयं भावनामात्रो विवर्तवाद का संक्षिप्त और अचूक सूत्र है। 2. परमार्थतः किञ्चित् न जगत की पारमार्थिक असत्ता और व्यावहारिक प्रतीति का भेद स्पष्ट करता है। 3. भावाभावविभाविनाम् साक्षी चैतन्य की त्रैकालिक सत्ता को सिद्ध करता है। 4. जो सत्ता के होने और न होने दोनों को प्रकाशित करता है, उसका स्वयं कभी अभाव नहीं हो सकता। 5. यह साधक को संसार के उतार-चढ़ाव से अप्रभावित होकर अपने अविनाशी स्वरूप में टिकने का आधार देता है। 6. संसार को सत्य मानने का भ्रम टूटने पर ही वास्तविक अभय की प्राप्ति होती है।
उदाहरण से समझें: जैसे सिनेमा के पर्दे पर आग, पानी या युद्ध का दृश्य केवल रोशनी की भावना मात्र है और पर्दे को नहीं जलाता, वैसे ही संसार चेतना पर केवल एक दृश्य है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जैसे कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखने वाले ग्राफिक्स केवल कोड और पिक्सेल की भावना हैं और स्क्रीन को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते, वैसे ही संसार साक्षी आत्मा को प्रभावित नहीं करता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: संसार केवल विचारों का खेल है, इसे इतना भारी मत मानिए; आप वह अविनाशी चेतना हैं जिसका कभी अंत नहीं होता।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘भवोऽयं भावनामात्रो’ का अर्थ दुनिया के व्यावहारिक नियमों का उल्लंघन करना नहीं है, बल्कि आंतरिक रूप से इसके भय से मुक्त होना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी कोई पुरानी चिंता या डर मन में आए, तो कहें: "यह केवल मन का एक विचार है, यह मेरा सच्चा स्वरूप नहीं है।" (चिंता के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मन के बनाए हुए विचारों और कल्पनाओं को ही सच मानकर दिन-रात परेशान हो रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें मूँदकर देखें कि विचार कैसे आते हैं और जाते हैं; अनुभव करें कि आप विचारों के आने-जाने से अप्रभावित साक्षी हैं।
एक पंक्ति में सार: यह संसार केवल भावना मात्र है, परमार्थतः कुछ नहीं; भाव और अभाव को जानने वाली आत्मा का कभी अभाव नहीं होता।
English
Translation: This worldly existence is a mere mental projection; in ultimate truth it is nothing. The inherent nature of the Self, which witnesses both existence and non-existence, never ceases to be.
Simple explanation: The phenomenal universe is fundamentally an imaginative construct of the mind. That supreme witness consciousness which perceives both presence and absence never undergoes negation; it remains the immutable ground of being.
विषय और संबंधित श्लोक
- भावनामात्र-संसार
- साक्षी-चेतना
- परमार्थ-सत्य
- अविनाशी-आत्मा
- श्लोक 18.3: प्रशमपीयूषधारा।
- श्लोक 18.5: न दूरं न च संकोचात्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का चौथा श्लोक।