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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ४२/१००42%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.42

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

भावस्य भावकः कश्चिन् न किञ्चिद् भावकोऽपरः । उभयाभावकः कश्चिद् एवमेव निराकुलः ॥ ४२ ॥

IAST लिप्यंतरण

bhāvasya bhāvakaḥ kaścin na kiñcid bhāvako'paraḥ | ubhayābhāvakaḥ kaścid evam eva nirākulaḥ || 42 ||

सरल उच्चारण: bhaavasya bhaavakah kashchin na kinychid bhaavakoparah ubhayaabhaavakah kashchid evam eva niraakulah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

भावस्य, भावकः, कश्चित्, न, किञ्चित्, भावकः, अपरः, उभय-अभावकः, कश्चित्, एवम्, एव, निराकुलः

कश्चित् भावस्य भावकः
कोई साधक भाव (संसार या ईश्वर के सगुण रूप) का ध्यान करता है
अपरः न किञ्चित् भावकः
कोई दूसरा शून्य या शून्यता का चिंतन करता है
कश्चित् उभय-अभावकः
किंतु कोई विरला ज्ञानी इन दोनों (भाव और अभाव) की कल्पना से परे है
एवम् एव निराकुलः
और वह इस प्रकार सर्वथा व्याकुलता-रहित (शांत) रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

कोई भाव (अस्तित्व या रूप) का ध्यान करता है, कोई शून्य का ध्यान करता है; किंतु कोई विरला ज्ञानी दोनों की भावना से रहित होकर सदा सर्वथा व्याकुलतारहित रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: मन जब तक कुछ सोचता है, तब तक वह द्वैत में रहता है। कुछ साधक कहते हैं कि "ईश्वर का यह रूप है" (भाव); दूसरे कहते हैं कि "संसार कुछ नहीं है, सब शून्य है" (अभाव)। अष्टावक्र कहते हैं कि भाव और अभाव दोनों मन की कल्पनाएँ हैं। जो ज्ञानी इन दोनों विकल्पों को छोड़कर केवल अपने शुद्ध साक्षी-स्वरूप में टिक गया है, वह किसी भी मानसिक कल्पना से बँधता नहीं और सदा परम निराकुल रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

एक व्यक्ति कहता है कि "संसार सच है", दूसरा कहता है कि "संसार बिल्कुल शून्य है।" दोनों ही अपने दिमाग में एक विचार को पकड़कर बैठे हैं।

लेकिन ज्ञानी व्यक्ति इन दोनों विचारों की लड़ाई में नहीं पड़ता। वह न तो किसी रूप को पकड़ता है और न शून्यता को।

वह किसी भी विचार के बिना जैसा है वैसा ही शांत रहता है। उसके मन में न कोई उलझन है और न कोई बेचैनी। वह पूरी तरह हल्का और स्वतंत्र है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. भावस्य भावकः सगुण उपासना या अस्तित्ववादी दर्शन की ओर संकेत है। 2. न किञ्चित् भावकः शून्यवाद या अभाव के चिंतन की ओर इशारा है। 3. उभयाभावकः भाव और अभाव दोनों मानसिक वृत्तियों के अतिक्रमण की तुरीयावस्था है। 4. निराकुलः चित्त की वह अवस्था है जहाँ कोई मानसिक द्वंद्व या व्याकुलता शेष नहीं। 5. यह मांडूक्य कारिका के ‘अद्वैतं सर्वभावानां’ के परम सिद्धांत की सीधी पुष्टि है। 6. साधक को किसी भी दार्शनिक वाद (ism) की पकड़ से मुक्त होकर शुद्ध उपस्थिति में जीने का मार्ग दिखाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे आकाश में चाहे बादल हों (भाव) या न हों (अभाव), आकाश दोनों की परवाह नहीं करता और अछूता रहता है; ज्ञानी भाव-अभाव दोनों से परे रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी ऑनलाइन डिबेट में न पक्ष में कमेंट करते हैं और न विपक्ष में, बल्कि फोन रखकर अपनी चाय का आनंद लेते हैं; ज्ञानी मानसिक तर्कों से ऐसे ही मुक्त रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: विचारों के पक्ष-विपक्ष की बहस छोड़िए; आप विचारों के होने और न होने दोनों के पार शुद्ध चैतन्य हैं।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘उभयाभावकः’ का अर्थ अकर्मण्य या सुन्न हो जाना नहीं है; यह विचारों के बंधनों से पार परम शांति का अनुभव है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन में किसी बात के पक्ष या विरोध का तूफान उठे, तो कहें: "मैं इस विचार के पक्ष-विपक्ष से परे शांत साक्षी हूँ।" (द्वंद्व के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने मन में अध्यात्म की नई-नई धारणाएँ और थ्योरीज़ बनाकर खुद को उलझा रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "कोई विचार नहीं, कोई शून्यता भी नहीं; केवल शुद्ध, शांत और अचल आत्म-उपस्थिति।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: कोई भाव सोचता है कोई शून्यता; दोनों से परे रहने वाला ज्ञानी ही सदा व्याकुलता-रहित रहता है।

English

Translation: One contemplates existence, another contemplates non-existence; but a rare one contemplates neither and thus remains ever undisturbed.

Simple explanation: Someone meditates upon existence, another contemplates non-existence; but a rare steadfast sage contemplates neither, resting in sublime stillness, totally free of mental agitation.

विषय और संबंधित श्लोक

  • भावाभाव-पार
  • निराकुल-स्थिति
  • विकल्प-मुक्ति
  • शुद्ध-साक्षी
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.41: स्वारामस्यैव धीरस्य।
  • श्लोक 18.43: शुद्धमद्वयमात्मानम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 313–315 (PDF पृ. 320–322)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का बयालीसवाँ श्लोक।