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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ४३/१००43%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.43

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः । न तु जानन्ति संमोहाद् यावज्जीवमनिर्वृताः ॥ ४३ ॥

IAST लिप्यंतरण

śuddham advayam ātmānaṃ bhāvayanti kubuddhayaḥ | na tu jānanti sammohād yāvajjīvam anirvṛtāḥ || 43 ||

सरल उच्चारण: shuddham advayam aatmaanam bhaavayanti kubuddhayah na tu jaananti sammohaad yaavajjeevam anirvritaah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

शुद्धम्, अद्वयम्, आत्मानम्, भावयन्ति, कुबुद्धयः, न, तु, जानन्ति, संमोहात्, यावज्जीवम्, अनिर्वृताः

कुबुद्धयः भावयन्ति
अल्पबुद्धि लोग मन में केवल कल्पना (चिंतन) करते रहते हैं
शुद्धम् अद्वयम् आत्मानम्
कि आत्मा शुद्ध और अद्वैत है
तु संमोहात् न जानन्ति
किंतु मोह के कारण वे उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं करते
यावज्जीवम् अनिर्वृताः
और जीवनभर अशांत और अतृप्त ही बने रहते हैं

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अल्पबुद्धि लोग केवल मन में यह सोचते (कल्पना करते) रहते हैं कि आत्मा शुद्ध और अद्वैत है; किंतु मोह के कारण वे उसे साक्षात नहीं जानते और जीवनभर अशांत ही रहते हैं।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक केवल शुष्क बौद्धिक ज्ञान की कड़ी आलोचना करता है। बहुत से लोग वेदांत की किताबें पढ़कर तोते की तरह रट लेते हैं कि "आत्मा शुद्ध है, मैं ब्रह्म हूँ।" वे दिन-रात इसकी भावना (मानसिक चिंतन) करते हैं। किंतु अष्टावक्र कहते हैं कि भावना करना भी तो मन की ही एक क्रिया है! जब तक देहाभिमान और मोह बना हुआ है, तब तक केवल "मैं शुद्ध हूँ" सोचने से मुक्ति नहीं मिलती। ऐसे लोग जीवनभर अशांत रहते हैं क्योंकि उन्होंने सत्य को जिया नहीं, केवल सोचा है।

सरल हिन्दी में समझें

अगर कोई भूखा इंसान एक कागज़ पर "स्वादिष्ट खीर" लिखकर दिन-रात उस शब्द को देखता रहे और कहे कि "मैं खीर खा रहा हूँ", तो क्या उसकी भूख मिटेगी? कभी नहीं।

बहुत से लोग केवल किताबों की बातें रट लेते हैं कि "मैं शुद्ध आत्मा हूँ।" वे दिन-रात अपने दिमाग में विचार दोहराते रहते हैं, लेकिन उनका गुस्सा, डर और लालच वैसा का वैसा रहता है।

अष्टावक्र कहते हैं कि आत्मा कोई सोचने की चीज़ नहीं है। जब तक आप अपने अहंकार को नहीं छोड़ते, तब तक केवल बातें बनाने से मन की बेचैनी कभी खत्म नहीं होगी।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. भावयन्ति मानसिक कल्पना और वैचारिक पुनरावृत्ति (repetition) की सीमा को उजागर करता है। 2. कुबुद्धयः उन लोगों के लिए प्रयुक्त है जो साधन को ही साध्य मानकर आत्म-वंचना में जी रहे हैं। 3. न जानन्ति संमोहात् अपरोक्ष अनुभूति और परोक्ष ज्ञान के भेद को स्पष्ट करता है। 4. यावज्जीवमनिर्वृताः शुष्क वेदांतियों की वास्तविक आंतरिक अशांति का यथार्थ चित्रण है। 5. आत्मा ज्ञाता है, वह ज्ञेय या भावना का विषय नहीं हो सकता (केनोपनिषद्)। 6. साधक को बौद्धिक पाखंड छोड़कर जीवन में आंतरिक रूपांतरण और अहंकार-समर्पण का आदेश देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे कागज़ की नाव पर बैठकर नदी पार नहीं की जा सकती, वैसे ही केवल विचारों की नाव पर बैठकर संसार-सागर पार नहीं किया जा सकता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

तैरने की किताब के 10 चैप्टर्स याद कर लेने के बाद भी अगर आप पानी में कूदने से डरते हैं, तो आप तैरना नहीं जानते; केवल बातें बनाने वाला ज्ञानी भी जीवन के संकट में ऐसे ही डूबता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: आध्यात्मिक शब्दों को रटना बंद कीजिए; अहंकार को विदा कीजिए और इस सत्य को अपने स्वभाव में उतारिए।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘कुबुद्धयः’ का अर्थ साधकों का अपमान करना नहीं है; यह केवल बौद्धिक रटन को आत्मज्ञान मान लेने के खतरे से आगाह करना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन में दूसरों को ज्ञान सिखाने या अपनी समझ का घमंड आए, तो रुकें और पूछें: "क्या मैंने अपने भीतर के क्रोध और लालच को शांत किया है?" (ज्ञान बघारते समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं केवल वेदांत की बातें दोहराकर अपने अहंकार को आध्यात्मिक चोला पहना रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर सारे दार्शनिक विचारों को विदा कर दें; केवल अपनी शांत सांस और निशब्द उपस्थिति को महसूस करें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अज्ञानी शुद्ध आत्मा की केवल कल्पना करते हैं पर जानते नहीं, और जीवनभर अशांत रहते हैं।

English

Translation: The foolish merely imagine the pure and non-dual Self; because of delusion they do not truly know it, and remain unfulfilled all their lives.

Simple explanation: The deluded endlessly conceptualize the pure, non-dual Self as a mental object; blinded by infatuation, they never directly recognize it and wander through life perpetually unfulfilled.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अपरोक्ष-अनुभूति
  • शुष्क-वेदान्त-खण्डन
  • कुबुद्धि-चेतावनी
  • अनिर्वृत-स्थिति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.42: उभयाभावकः कश्चित्।
  • श्लोक 18.44: मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 315–317 (PDF पृ. 322–324)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तैंतालीसवाँ श्लोक।