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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.46
सत्यापित
मूल संस्कृत
निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ ४६ ॥
IAST लिप्यंतरण
nirvāsanaṃ hariṃ dṛṣṭvā tūṣṇīṃ viṣayadantinaḥ | palāyante na śaktās te sevante kṛtacāṭavaḥ || 46 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
निर्वासनम्, हरिम्, दृष्ट्वा, तूष्णीम्, विषय-दन्तिनः, पलायन्ते, न, शक्ताः, ते, सेवन्ते, कृत-चाटवः
- निर्वासनम् हरिम् दृष्ट्वा
- वासना-रहित ज्ञानी रूपी सिंह को देखकर
- विषय-दन्तिनः तूष्णीम्
- विषय-भोग रूपी हाथी चुपचाप
- पलायन्ते
- दूर भाग जाते हैं
- न शक्ताः ते
- और जो भागने में असमर्थ होते हैं वे
- कृत-चाटवः सेवन्ते
- चापलूसी करते हुए सेवक की तरह उसकी सेवा करने लगते हैं
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
वासनारहित ज्ञानी रूपी सिंह को देखकर विषय-भोग रूपी हाथी चुपचाप भाग जाते हैं; और जो नहीं भाग पाते, वे चाटुकार सेवकों की भाँति उसकी सेवा में लग जाते हैं।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह पिछले श्लोक का उत्तर और जीवनमुक्त की परम शक्ति का अद्भुत रूपक है। जहाँ साधक विषयों से डरकर गुफा में छिपता था, वहाँ आत्मज्ञानी को विषयों से डरने की ज़रूरत नहीं होती। वह तो वासना-रहित एक शक्तिशाली सिंह (हरिम्) है। जब सिंह वन में गरजता है, तो बड़े-बड़े मतवाले हाथी (विषय-दन्तिनः) चुपचाप दुम दबाकर भाग जाते हैं। और जो भोग ज्ञानी के सामने आते भी हैं, वे उसे बांध नहीं सकते; वे एक विनम्र सेवक की तरह उसके प्रारब्ध की सेवा करते हैं।
सरल हिन्दी में समझें
जंगल में जब एक बब्बर शेर चलता है, तो क्या वह हाथियों से डरकर पेड़ पर चढ़ता है? नहीं, शेर को देखते ही सारे हाथी चुपचाप रास्ता छोड़ देते हैं।
जिस इंसान के अंदर से वासना और लालच पूरी तरह खत्म हो चुका है, वह उस शेर की तरह बन जाता है। दुनिया के बड़े-बड़े आकर्षण और भोग-विलास उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते।
संसार के विषय उसके सामने झुक जाते हैं। वह भोगों का गुलाम नहीं बनता, बल्कि भोग एक शांत नौकर की तरह उसकी सेवा में खड़े रहते हैं।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. निर्वासनं हरिं ज्ञानी के निष्काम, निर्भय और राजसी आत्म-सामर्थ्य का प्रतीक है। 2. विषयदन्तिनः मदमत्त हाथियों की तरह विषयों के प्रचंड वेग को दर्शाता है। 3. तूष्णीं पलायन्ते आत्म-तेज के सामने प्रलोभनों के स्वतः शांत हो जाने की प्रक्रिया है। 4. कृतचाटवः सेवन्ते यह सिद्ध करता है कि ज्ञानी के लिए संसार बाधक नहीं, बल्कि उसकी सहज लीला का उपकरण बन जाता है। 5. यह उपनिषदों के ‘सर्वं तस्मै देवा बलिमावहन्ति’ (सारे देव और विषय ज्ञानी की सेवा करते हैं) का प्रत्यक्ष रूपक है। 6. साधक को पलायनवादी डरपोक बनने के बजाय भीतर से वासना-मुक्त सिंह बनने का आह्वान करता है।
उदाहरण से समझें: जैसे आग के सामने आते ही मोम अपने आप पिघल जाता है और आग का कुछ नहीं बिगाड़ पाता, वैसे ही वासना-मुक्त ज्ञानी के सामने विषय-भोग निष्प्रभावी हो जाते हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब एक ईमानदार और निडर अफ़सर किसी ज़िले में आता है, तो बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी या तो शहर छोड़कर भाग जाते हैं या हाथ जोड़कर लाइन में खड़े हो जाते हैं; ज्ञानी के आत्म-तेज के आगे विषय ऐसे ही नतमस्तक रहते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया के आकर्षणों से डरने के बजाय अपने भीतर की वासनाओं को खत्म कीजिए; आप आत्म-सिंह हैं, कोई प्रलोभन आपको छू नहीं सकता।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘सेवन्ते कृतचाटवः’ का अर्थ अनियंत्रित भोग-विलास में डूब जाना नहीं है; यह ज्ञानी की विषयों पर पूर्ण विजय का काव्यात्मक वर्णन है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई बड़ा प्रलोभन सामने आए, तो शेर की तरह सीना तानकर कहें: "मेरी आत्मा इन तुच्छ विषयों से बहुत महान और तृप्त है।" (प्रलोभन के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं जीवन के प्रलोभनों का गुलाम बना हुआ हूँ, या मेरे भीतर एक वासना-मुक्त शेर का आत्म-तेज है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मैं वासना-रहित आत्म-सिंह हूँ; कोई विषय मुझे बांध नहीं सकता, मैं अखंड स्वतंत्र और विजयी हूँ।"
एक पंक्ति में सार: वासनारहित ज्ञानी रूपी सिंह को देखकर विषय रूपी हाथी भाग जाते हैं या सेवक बन जाते हैं।
English
Translation: Seeing the desireless lion, the elephants of sense-objects silently flee away, or, unable to escape, serve him like flattering courtiers.
Simple explanation: Beholding the lion of the desireless sage, the wild elephants of sense-objects silently take to flight; or, unable to flee, attend upon him submissively like flattering servants.
विषय और संबंधित श्लोक
- निर्वासन-सिंह
- विषय-दन्तिन्
- आत्म-विजय
- राजसी-विश्रांति
- श्लोक 18.45: विशन्ति झटिति क्रोडम्।
- श्लोक 18.47: न मुक्तिकारिकां धत्ते।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का छियालीसवाँ श्लोक।