दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ४५/१००45%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.45

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः । विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधैकाग्र्यसिद्धये ॥ ४५ ॥

IAST लिप्यंतरण

viṣayadvīpino vīkṣya cakitāḥ śaraṇārthinaḥ | viśanti jhaṭiti kroḍaṃ nirodhaikāgryasiddhaye || 45 ||

सरल उच्चारण: vishayadveepino veekshya chakitaah sharanaarthinah vishanti jhatiti krodam nirodhaikaagryasiddhaye (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

विषय-द्वीपिनः, वीक्ष्य, चकिताः, शरण-अर्थिनः, विशन्ति, झटिति, क्रोडम्, निरोध-ऐकाग्र्य-सिद्धये

विषय-द्वीपिनः वीक्ष्य
संसार के विषय-भोग रूपी चीतों (बाघों) को देखकर
चकिताः शरण-अर्थिनः
भयभीत होकर शरण खोजने वाले साधक
झटिति विशन्ति क्रोडम्
तुरंत कंदरा या गुफा की गोद में छिप जाते हैं
निरोध-ऐकाग्र्य-सिद्धये
चित्त के निरोध और एकाग्रता की सिद्धि के लिए

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

संसार के विषय रूपी हिंसक बाघों को देखकर भयभीत शरणार्थी साधक चित्त के निरोध और एकाग्रता को पाने के लिए तुरंत गुफाओं और एकांत में शरण लेते हैं।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह रूपक उन साधकों की स्थिति का वर्णन करता है जो संसार के आकर्षणों से डरते हैं। वे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध को हिंसक चीते (द्वीपिनः) की तरह समझते हैं कि ये उन्हें खा जाएँगे। इसलिए वे डरकर अपनी आँखें मूँद लेते हैं, जंगलों की गुफाओं में भागते हैं और मन को ज़बरदस्ती एकाग्र करने की कोशिश करते हैं। उनका वैराग्य समझदारी से नहीं, बल्कि भय से पैदा हुआ है। जहाँ भय है, वहाँ सच्ची शांति नहीं हो सकती।

सरल हिन्दी में समझें

जब जंगल में कोई डरपोक हिरण किसी चीते को देखता है, तो वह थर-थर काँपते हुए किसी झाड़ी या गुफा में छिप जाता है।

शुरुआती साधकों का हाल भी कुछ ऐसा ही होता है। वे दुनिया के सुखों और आकर्षणों को देखकर इतना डर जाते हैं कि वे सब कुछ छोड़कर किसी कोने या गुफा में भाग जाते हैं और ज़बरदस्ती आँखें बंद करके ध्यान लगाने की कोशिश करते हैं।

उनका ध्यान प्रेम या समझ से नहीं, बल्कि दुनिया के डर से पैदा हुआ है। और जब तक दिल में डर है, तब तक इंसान सचमुच आज़ाद नहीं हो सकता।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. विषयद्वीपिनः विषयों की वासना-प्रेरक और चित्त-विक्षेपक शक्ति का काव्यात्मक रूपक है। 2. चकिताः शरणार्थिनः भय-प्रेरित वैराग्य (मर्कट वैराग्य) की सीमा को दर्शाता है। 3. क्रोडं विशन्ति एकांत-सेवन और बाह्य पलायन का प्रतीक है जो प्राथमिक स्तर पर उपयोगी है किंतु अंतिम नहीं। 4. निरोधैकाग्र्यसिद्धये यह स्पष्ट करता है कि एकाग्रता का हठ भयभीत मन की रक्षा-प्रणाली (defense mechanism) है। 5. सच्ची मुक्ति विषयों से भागने में नहीं, बल्कि विषयों में आत्म-दृष्टि रखने में है। 6. साधक को भय-आधारित साधना से उठाकर ज्ञान-आधारित निर्भयता की ओर अग्रसर करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे पिंजरे में छिपकर बैठने वाला तोता बिल्ली से बचने की कोशिश करता है लेकिन आज़ाद नहीं होता, वैसे ही गुफा में भागने वाला साधक विषयों से डरकर एकाग्रता खोजता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई छात्र सोशल मीडिया के एडिक्शन से डरकर अपना स्मार्टफोन तोड़ देता है या अलमारी में बंद कर देता है, लेकिन दिमाग में वही सोचता रहता है; भागने वाले साधक का मन भी ऐसे ही डरता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया से डरकर भागिए मत; डर से शांति नहीं मिलती, आत्मज्ञान से निर्भय होकर जीना सीखिए।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘विशन्ति क्रोडम्’ का अर्थ एकांत-साधना को व्यर्थ बताना नहीं है; यह केवल भय-प्रेरित पलायन की सीमा को स्पष्ट करना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब किसी चीज़ का बहुत डर या लालच सताए, तो आँखें चुराने के बजाय शांत होकर कहें: "मैं निर्भय आत्मा हूँ, यह विषय मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" (डर के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं आध्यात्मिक जीवन में दुनिया से डरकर भाग रहा हूँ, या सच्ची समझ से आगे बढ़ रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "संपूर्ण जगत मेरी अपनी चेतना में प्रकट हो रहा है; कोई विषय मुझे नुकसान नहीं पहुँचा सकता, मैं अभय हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: विषय रूपी बाघों से डरकर शरणार्थी साधक एकाग्रता के लिए गुफाओं में छिपते हैं।

English

Translation: Beholding the leopards of sensory objects, the frightened seekers of refuge quickly enter the cave of mental restraint to attain concentration.

Simple explanation: Terrified by the stalking leopards of sense objects, the fearful seekers of refuge rush headlong into the cavern of mental suppression to force one-pointed concentration.

विषय और संबंधित श्लोक

  • भय-प्रेरित-वैराग्य
  • विषय-द्वीपिन
  • पलायन-सीमा
  • अभय-की-खोज
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.44: निरालम्बैव निष्कामा।
  • श्लोक 18.46: निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 319–321 (PDF पृ. 326–328)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का पैंतालीसवाँ श्लोक।