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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.48
सत्यापित
मूल संस्कृत
वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः । नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ ४८ ॥
IAST लिप्यंतरण
vastuśravaṇamātreṇa śuddhabuddhir nirākulaḥ | naivācāram anācāram audāsyaṃ vā prapaśyati || 48 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
वस्तु-श्रवण-मात्रेण, शुद्ध-बुद्धिः, निराकुलः, न, एव, आचारम्, अनाचारम्, औदास्यम्, वा, प्रपश्यति
- वस्तु-श्रवण-मात्रेण
- केवल यथार्थ आत्मतत्त्व के श्रवण मात्र से
- शुद्ध-बुद्धिः निराकुलः
- जिसकी बुद्धि परम शुद्ध और व्याकुलता-रहित हो गई है
- न एव प्रपश्यति
- वह तनिक भी नहीं देखता
- आचारम् अनाचारम्
- धार्मिक आचार (विधि), अनाचार (निषेध)
- औदास्यम् वा
- अथवा उदासीनता (अकर्म) को
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
केवल यथार्थ आत्मतत्त्व के श्रवण मात्र से जिसकी बुद्धि शुद्ध और शांत हो गई है, वह न तो विधि-आचार को देखता है, न अनाचार को और न उदासीनता को।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह उत्तम अधिकारी का लक्षण है। जिसे केवल सद्गुरु के मुख से "तत्त्वमसि" (तू वही है) सुनते ही आत्म-साक्षात्कार हो गया, उसकी बुद्धि तुरंत निष्पाप और निर्मल हो जाती है। उसके लिए विधि-निषेध (यह करो, यह मत करो) के सामाजिक और शास्त्रीय आग्रह समाप्त हो जाते हैं। वह न तो कर्म करने के पीछे पड़ता है, न बुराई में प्रवृत्त होता है, और न जानबूझकर संन्यासी बनकर उदासीन बैठता है। वह इन तीनों के पार अपनी अद्वैत स्थिति में जीता है।
सरल हिन्दी में समझें
जब किसी कमरे में सूरज की पूरी रोशनी आ जाती है, तो क्या वहाँ यह देखने की ज़रूरत होती है कि दीया जलाना है या बुझाना है? दोनों बातें बेमानी हो जाती हैं।
सच्चे समझदार इंसान को जैसे ही यह समझ आता है कि वह शुद्ध आत्मा है, उसका मन पूरी तरह शांत हो जाता है।
अब उसके लिए न तो यह घमंड रहता है कि "मैं बहुत नियम पाल रहा हूँ", न वह कोई गलत काम करता है, और न वह ज़बरदस्ती मुँह फुलाकर उदासीन बैठता है। वह हर पाखंड से मुक्त होकर सहज जीता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. वस्तुश्रवणमात्रेण श्रवण की उस सर्वोच्च सामर्थ्य को प्रकट करता है जो उत्तम अधिकारी में तुरंत फल देती है। 2. शुद्धबुद्धिः निराकुलः अविद्या के आवरण और विक्षेप दोनों के एक साथ नाश का सूचक है। 3. आचारम् अनाचारम् विधि और निषेध के द्वंद्व से मुक्ति की घोषणा है। 4. औदास्यं न पश्यति यह सिद्ध करता है कि ज्ञानी का जीवन उदासीनता या अवसाद नहीं, सहज आनंद है। 5. यह तैत्तिरीयोपनिषद् के ‘किमहं साधु नाकरवम्’ (मैंने अच्छा क्यों नहीं किया, बुरा क्यों किया का संताप नहीं) का सत्य है। 6. साधक को बाह्य विधि-विधानों की औपचारिकता से उठाकर आंतरिक शुद्धि में प्रतिष्ठित करता है।
उदाहरण से समझें: जैसे नदी जब सागर में मिल जाती है तो वह यह नहीं देखती कि वह किस दिशा में बह रही है, वह केवल सागर हो जाती है; ज्ञानी आत्म-बोध के बाद विधि-निषेध से परे हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आपको किसी कानून की मूल भावना और न्याय की पूरी समझ आ जाए, तो आपको नियम पुस्तिका के हर शब्द को रटने की ज़रूरत नहीं होती, आप स्वतः सही निर्णय लेते हैं; आत्मज्ञानी का आचरण भी स्वतः शुद्ध होता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सत्य को सुनते ही अपने भीतर उतारिए; जब मन शुद्ध होता है तो बाहरी दिखावे और नियमों का बोझ खुद गिर जाता है।
सामान्य गलतफहमी
ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘नैवाचारमनाचारम्’ का अर्थ अधर्म या अनैतिक कर्मों में लिप्त होना नहीं है; ज्ञानी का स्वभाव स्वाभाविक रूप से निष्पाप और कल्याणकारी होता है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज किसी भी धार्मिक या सामाजिक काम को केवल दूसरों को दिखाने के लिए न करें; जो भी करें, पवित्र और शांत मन से करें। (आचरण में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं केवल बाहरी धार्मिक नियमों और रीतियों का पालन करके अपने अंतःकरण की अशांति को छुपा रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मेरी आत्मा समस्त विधि-निषेधों से परे नित्य पवित्र है; मेरा स्वभाव स्वाभाविक धर्म है।"
एक पंक्ति में सार: आत्म-श्रवण मात्र से शुद्धबुद्धि ज्ञानी न आचार को देखता है न अनाचार को और न उदासीनता को।
English
Translation: Merely through hearing of the Reality, one of purified intellect and serene mind perceives neither righteous conduct nor unrighteous conduct, nor indifference.
Simple explanation: Merely by hearing the Truth, one whose intellect is utterly cleansed and undisturbed no longer conceives of prescribed conduct, prohibited conduct, or deliberate indifference.
विषय और संबंधित श्लोक
- वस्तु-श्रवण
- शुद्ध-बुद्धि
- विधि-निषेध-पार
- औदास्य-मुक्ति
- श्लोक 18.47: पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्।
- श्लोक 18.49: यदा यत्कर्तुमायाति।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का अड़तालीसवाँ श्लोक।