दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.49
सत्यापित
मूल संस्कृत
यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ह्यृजुः । शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ ४९ ॥
IAST लिप्यंतरण
yadā yat kartum āyāti tadā tat kurute hy ṛjuḥ | śubhaṃ vāpy aśubhaṃ vāpi tasya ceṣṭā hi bālavat || 49 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तदा, तत्, कुरुते, हि, ऋजुः, शुभम्, वा, अपि, अशुभम्, वा, अपि, तस्य, चेष्टा, हि, बालवत्
- ऋजुः हि
- सरल अंतःकरण वाला ज्ञानी
- यदा यत् कर्तुम् आयाति
- जब जो कार्य प्रारब्धवश सामने आ जाता है
- तदा तत् कुरुते
- तब वह उसी कार्य को सहजता से कर देता है
- शुभम् वा अपि अशुभम् वा अपि
- चाहे वह सांसारिक दृष्टि से शुभ हो या अशुभ
- तस्य चेष्टा हि बालवत्
- क्योंकि उसकी चेष्टा एक बालक के समान निष्पाप और अहंकार-शून्य होती है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
सरल हृदय वाला ज्ञानी जब जो कार्य सामने आ जाता है तब उसे कर लेता है, चाहे लोकदृष्टि में वह शुभ हो या अशुभ; क्योंकि उसकी चेष्टा बालक के समान सर्वथा निष्पाप होती है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: ऋजु का अर्थ है अत्यंत सीधा और सरल, जिसके मन में कोई कपट या योजना नहीं। जब प्रारब्ध कर्म के अनुसार कोई परिस्थिति सामने आती है, तो ज्ञानी न तो उससे भागता है और न उसमें अहंकार जोड़ता है। जैसे एक छोटा बच्चा कभी धूल में खेलता है और कभी मिठाई खाता है, किंतु दोनों में उसके अंदर कोई पाप या पुण्य का अहंकार नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी की सारी चेष्टाएँ बालक के समान अहेतुक और अहंकार-शून्य होती हैं।
सरल हिन्दी में समझें
एक छोटे बच्चे को देखिए: वह कभी खिलौने बनाता है और कभी उन्हें तोड़ देता है। लेकिन क्या उसके दिल में किसी को नुकसान पहुँचाने का कोई बुरा इरादा होता है? बिल्कुल नहीं, वह तो बस खेल रहा होता है।
ज्ञानी व्यक्ति का दिल भी बिल्कुल उस बच्चे की तरह साफ़ और सीधा हो जाता है।
ज़िंदगी में जब जो काम उसके सामने आ जाता है, वह उसे बिना किसी नखरे या घमंड के पूरा कर देता है। उसके मन में न कोई साजिश होती है और न कोई स्वार्थ। वह हर काम को एक मासूम खेल की तरह खेलता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. ऋजुः ज्ञानी के परम निष्कपट, सरल और प्रांजल अंतःकरण का द्योतक है। 2. यदा यत्कर्तुमायाति वर्तमान क्षण में पूर्ण उपस्थिति और प्रारब्ध के सहज स्वीकार का सूत्र है। 3. शुभं वाप्यशुभं वा लोकदृष्टि के नैतिक द्वंद्वों की पारमार्थिक सीमाओं को इंगित करता है। 4. बालवत् चेष्टा अद्वैत जीवनमुक्ति का अत्यंत प्रसिद्ध उपमान है—अहंकार और कर्तापन का अभाव। 5. यह छांदोग्योपनिषद् के ‘बाल्येन तिष्ठासेत्’ (बालक के समान सरल भाव में स्थित हो) का साकार रूप है। 6. साधक को मानसिक जटिलताओं और पाखंड को छोड़कर हृदय की सरलता अपनाने की शिक्षा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे छोटा बच्चा शीशे के खिलौने को भी उसी मासूमियत से छूता है जैसे सोने के खिलौने को, वैसे ही ज्ञानी जीवन के हर कार्य को बालक की तरह निष्पाप भाव से करता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी खेल में हार-जीत की चिंता छोड़कर केवल खेल के आनंद के लिए बच्चों की तरह दौड़ते हैं, तो कोई तनाव नहीं होता; ज्ञानी अपने जीवन के हर कर्तव्य को इसी खेल-भावना से करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने मन की चालाकियाँ और जटिलताएँ छोड़िए; एक मासूम बच्चे की तरह सरल बनिए, आपका जीवन शांत हो जाएगा।
सामान्य गलतफहमी
ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘शुभं वाप्यशुभं वा’ का अर्थ जानबूझकर पाप या अपराध करना नहीं है; यह बालक जैसी अहंकार-शून्य चेष्टा का दार्शनिक रूपक है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब दिनभर में कोई ऐसा काम करना पड़े जो आपको पसंद न हो, तो बच्चे की तरह बिना किसी शिकायत के उसे निपटा लें। (अनचाहे काम में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने जीवन में बहुत ज़्यादा चालाक और रणनीतिक बनकर अपनी स्वाभाविक सरलता खो बैठा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मैं एक निष्पाप, सरल बालक की तरह परमात्मा की गोद में हूँ; मेरा कोई अहंकार नहीं, कोई बोझ नहीं।"
एक पंक्ति में सार: सरल ज्ञानी सामने आए कार्य को सहजता से कर लेता है; उसकी चेष्टा बालक के समान निष्पाप होती है।
English
Translation: The straightforward one does whatever arrives to be done, whether considered good or bad in the eyes of the world; for his actions are like those of a child.
Simple explanation: The guileless sage simply does whatever presents itself to be done, whether conventionally regarded as auspicious or inauspicious; for all his actions are innocent like those of a young child.
विषय और संबंधित श्लोक
- बालवत्-चेष्टा
- ऋजु-स्वभाव
- प्रारब्ध-कर्म
- अहंकार-शून्यता
- श्लोक 18.48: नैवाचारमनाचारम्।
- श्लोक 18.50: स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का उनचासवाँ श्लोक।