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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ६८/१००68%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.68

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः । भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः ॥ ६८ ॥

IAST लिप्यंतरण

bahunātra kim uktena jñātatattvo mahāśayaḥ | bhogamokṣanirākāṅkṣī sadā sarvatra nīrasaḥ || 68 ||

सरल उच्चारण: bahunaatra kim uktena jnyaatatattvo mahaashayah bhogamokshaniraakaangkshee sadaa sarvatra neerasah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

बहुना, अत्र, किम्, उक्तेन, ज्ञात-तत्त्वः, महाशयः, भोग-मोक्ष-निराकाङ्क्षी, सदा, सर्वत्र, नीरसः

अत्र बहुना उक्तेन किम्
यहाँ बहुत अधिक कहने से क्या लाभ?
ज्ञात-तत्त्वः महाशयः
जिस उदारचेता महापुरुष ने परम सत्य तत्त्व को जान लिया है
भोग-मोक्ष-निराकाङ्क्षी
वह न भोग की इच्छा रखता है और न मोक्ष की
सदा सर्वत्र नीरसः
और वह सदा सब जगह सांसारिक प्रपंचों से सर्वथा नीरस (अनासक्त) रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

यहाँ बहुत कहने से क्या प्रयोजन? जिसने सत्य तत्त्व को जान लिया है, वह उदारचेता ज्ञानी न भोग की इच्छा रखता है और न मोक्ष की; वह सदा सर्वत्र सांसारिक प्रपंचों में पूर्णतः अनासक्त (नीरस) रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: अष्टावक्र कहते हैं कि ज्ञानी के लक्षणों का वर्णन शब्दों में कहाँ तक किया जाए? संक्षेप में इतना ही समझ लो कि जिसने आत्म-तत्त्व को अपरोक्ष रूप से जान लिया है, उसका अंतःकरण इतना विशाल (महाशय) हो जाता है कि उसके लिए न तो संसार के भोगों में कोई आकर्षण बचता है और न मोक्ष पाने की कोई अलग चाह। जब सब कुछ वह स्वयं ही है, तो भोग क्या और मोक्ष क्या? वह सदा सर्वत्र सांसारिक प्रलोभनों से पूर्णतः अनासक्त होकर अपनी शांति में स्थित रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

बहुत लंबी-चौड़ी बातें करने की कोई ज़रूरत नहीं है, बात सिर्फ एक लाइन की है: जिस इंसान ने यह जान लिया कि वह कौन है, उसकी सारी इच्छाएं एक झटके में खत्म हो जाती हैं।

उसे न तो दुनिया के ऐशो-आराम की कोई भूख रहती है और न ही मोक्ष पाने की कोई बेचैनी।

संसार के सारे खिलौने उसके लिए बिल्कुल बेस्वाद हो जाते हैं। वह किसी चीज़ के पीछे नहीं भागता और अपनी मस्ती में मस्त रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. बहुनात्र किमुक्तेन शब्दों की सीमा और अद्वैत बोध की अनिर्वचनीयता का संकेत है। 2. ज्ञाततत्त्वो महाशयः आत्मज्ञानी के हृदय की अगाध विशालता को दर्शाता है जहाँ कोई क्षुद्र आग्रह नहीं रहता। 3. भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी वेदांत का चरम शिखर है—भोग तो बंधन है ही, मोक्ष की चाह भी द्वैत में रखती है। 4. सदा सर्वत्र नीरसः विषयों के प्रति आत्यंतिक वैराग्य और आत्म-रस में पूर्ण तृप्ति का द्योतक है। 5. साधक को आध्यात्मिक साधना के अंतिम सत्य—सर्व-इच्छा-मुक्ति—का सीधा साक्षात्कार कराता है।

उदाहरण से समझें: जैसे भरे हुए पेट वाले व्यक्ति के सामने छप्पन भोग भी रख दिए जाएँ तो वह उनकी तरफ देखता भी नहीं, वैसे ही आत्म-तृप्त ज्ञानी के लिए भोग और मोक्ष दोनों की चाह समाप्त हो जाती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी खेल के चैंपियन बन चुके हों, तो आपको किसी स्थानीय गली के टूर्नामेंट में मेडल जीतने की कोई ललक नहीं रहती; ज्ञानी सांसारिक उपलब्धियों से ऐसे ही बेपरवाह हो जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: बहुत तर्कों में मत उलझिए; सत्य को पहचानिए, जब सत्य मिल जाएगा तो भोग और मोक्ष दोनों की चाह शांत हो जाएगी।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘सदा सर्वत्र नीरसः’ का अर्थ जीवन से ऊब जाना या शुष्क हो जाना नहीं है; यह सांसारिक प्रपंचों के प्रति अनासक्ति और आत्म-रस की पूर्णता है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन में किसी चीज़ को पाने की तीव्र इच्छा उठे, तो कहें: "मेरी आत्मा पूर्ण है, मुझे न भोग चाहिए न कोई नया फल।" (इच्छा के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं एक तरफ सांसारिक भोग चाहता हूँ और दूसरी तरफ मोक्ष, और इस दोहरी चाहत में खुद को थका रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "न भोग की चाह, न मोक्ष की चिंता; मैं अभी इसी क्षण पूर्ण, तृप्त और शांत परब्रह्म हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: बहुत कहने से क्या लाभ; तत्त्वज्ञानी महापुरुष न भोग चाहता है न मोक्ष, वह सदा अनासक्त रहता है।

English

Translation: What need is there of saying much here? The noble-minded one who has known the Truth desires neither enjoyment nor liberation, ever detached everywhere.

Simple explanation: What is the use of elaborate words? The magnanimous sage who has realized the Truth craves neither worldly enjoyment nor liberation, remaining ever detached and dispassionate everywhere.

विषय और संबंधित श्लोक

  • ज्ञात-तत्त्व
  • महाशय
  • भोग-मोक्ष-पार
  • सर्वत्र-नीरस
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.67: स जयत्यर्थसंन्यासी।
  • श्लोक 18.69: महदादि जगद्द्वैतं।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 365–367 (PDF पृ. 372–374)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का अड़सठवाँ श्लोक।