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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ७१/१००71%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.71

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

शुद्धस्फुरणरूपस्य विदुषः क्व विधीयते । वैराग्यं क्व च वा त्यागः क्व च वा शमहेतुकम् ॥ ७१ ॥

IAST लिप्यंतरण

śuddhasphuraṇarūpasya viduṣaḥ kva vidhīyate | vairāgyaṃ kva ca vā tyāgaḥ kva ca vā śamahetukam || 71 ||

सरल उच्चारण: shuddhasphuranaroopasya vidushah kva vidheeyate vairaagyam kva cha vaa tyaagah kva cha vaa shamahetukam (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

शुद्ध-स्फुरण-रूपस्य, विदुषः, क्व, विधीयते, वैराग्यम्, क्व, च, वा, त्यागः, क्व, च, वा, शम-हेतुकम्

शुद्ध-स्फुरण-रूपस्य विदुषः
विशुद्ध चैतन्य प्रकाश रूप ज्ञानी के लिए
क्व विधीयते
विधि-नियम (क्या करना चाहिए) कहाँ है?
वैराग्यम् क्व
वैराग्य कहाँ है?
त्यागः च वा क्व
और त्याग कहाँ है?
शम-हेतुकम् च वा क्व
और मन को शांत करने के साधन (शमहेतु) कहाँ हैं?

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

विशुद्ध चैतन्य प्रकाश रूप ज्ञानी के लिए विधि कहाँ है? वैराग्य कहाँ है? त्याग कहाँ है? और मन को शांत करने के साधन कहाँ हैं? (वह इन सबसे सर्वथा परे है)।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: विधि (नियम), वैराग्य, त्याग और शम (शांति के साधन) उन लोगों के लिए होते हैं जो अभी अज्ञान में हैं और जिनका चित्त चंचल है। किंतु जो ज्ञानी साक्षात शुद्ध चैतन्य का स्फुरण बन चुका है, उसके लिए न कोई करने योग्य विधि है, न कुछ त्यागने को है और न शांति पाने के लिए कोई साधन करना है। वह स्वयं ही शांति का सागर है, इसलिए उसके लिए सारे साधन और नियम अर्थहीन हो जाते हैं।

सरल हिन्दी में समझें

जब सूरज आसमान में चमक रहा होता है, तो क्या उसे उजाला करने के लिए किसी मोमबत्ती या टार्च की ज़रूरत पड़ती है? नहीं, वह खुद ही उजाला है।

जो इंसान अपनी आत्मा के प्रकाश को पहचान चुका है, उसके लिए नियम-कानून, त्याग और साधना के सारे रास्ते पूरे हो चुके होते हैं।

उसे न कुछ छोड़ना है, न कुछ पकड़ना है, और न शांत होने के लिए कोई कसरत करनी है। वह खुद ही शांति और प्रकाश का रूप बन चुका है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. शुद्धस्फुरणरूपस्य आत्मा के स्वयंप्रकाश और अजस्र चैतन्य-प्रवाह को व्यक्त करता है। 2. क्व विधीयते विधि-निषेध के अधिकार के अतिक्रमण की उद्घोषणा है। 3. वैराग्यं क्व त्यागः क्व यह सिद्ध करता है कि जहाँ कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, वहाँ किसका त्याग और किससे वैराग्य? (अद्वैत)। 4. शमहेतुकम् क्व शांति के साधनों की आवश्यकता के अंत को दर्शाता है—शांति जब स्वभाव बन गई तो साधन व्यर्थ हैं। 5. साधक को साधनों के जाल से छुड़ाकर साध्य-स्वरूप में विश्राम दिलाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे पूरे सागर को पीने के बाद किसी प्याऊ की ज़रूरत नहीं रहती, वैसे ही आत्म-प्रकाश मिलने के बाद शांति के साधनों की कोई ज़रूरत नहीं रहती। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप अपने घर पहुँच जाते हैं तो आप गूगल मैप्स बंद कर देते हैं; मंज़िल मिलने के बाद नक्शे की कोई ज़रूरत नहीं होती; आत्मज्ञानी के लिए साधन ऐसे ही पूरे हो जाते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: साधनों को हमेशा के लिए मत पकड़िए; जब आप खुद शांति का रूप हैं, तो शांति ढूँढने की भागदौड़ छोड़ दीजिए।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘क्व विधीयते’ का अर्थ नियमों को तोड़कर अधर्म करना नहीं है; यह सिद्धावस्था की पूर्ण विश्रांति का दार्शनिक स्वरूप है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब साधना में कोई कमी या तनाव लगे, तो रुककर कहें: "मेरी आत्मा शुद्ध प्रकाश है, मुझे कुछ पाना या छोड़ना नहीं है।" (साधना के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मंज़िल पर पहुँचने के बाद भी रास्ते के पत्थरों और नक्शों को ढोने में लगा हुआ हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मैं शुद्ध स्फुरण रूप हूँ; कोई विधि नहीं, कोई त्याग नहीं, केवल अखंड और नित्य पूर्णता।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: शुद्ध प्रकाश रूप ज्ञानी के लिए न विधि है, न वैराग्य, न त्याग और न शांति का कोई साधन।

English

Translation: For the wise one who is of the nature of pure awareness, where is injunction, where is detachment, where is renunciation, and where are the causes of peace?

Simple explanation: For the illumined sage who embodies pure conscious radiance, where are scriptural injunctions, where is dispassion, where is renunciation, and where are the contrived means for cultivating peace?

विषय और संबंधित श्लोक

  • शुद्ध-स्फुरण
  • विधि-पार
  • त्याग-पार
  • शमहेतु-मुक्ति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.70: अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः।
  • श्लोक 18.72: स्फुरतोऽनन्तरूपेण।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 371–373 (PDF पृ. 378–380)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का इकहत्तरवाँ श्लोक।