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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ७२/१००72%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.72

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः । क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादिता ॥ ७२ ॥

IAST लिप्यंतरण

sphurato'nantarūpeṇa prakṛtiṃ ca na paśyataḥ | kva bandhaḥ kva ca vā mokṣaḥ kva harṣaḥ kva viṣāditā || 72 ||

सरल उच्चारण: sphuratonantaroopena prakritim cha na pashyatah kva bandhah kva cha vaa mokshah kva harshah kva vishaaditaa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

स्फुरतः, अनन्त-रूपेण, प्रकृतिम्, च, न, पश्यतः, क्व, बन्धः, क्व, च, वा, मोक्षः, क्व, हर्षः, क्व, विषादिता

अनन्त-रूपेण स्फुरतः
अनंत रूपों में प्रकाशित होने वाले
च प्रकृतिम् न पश्यतः
और अपने से अलग किसी प्रकृति (संसार) को न देखने वाले ज्ञानी के लिए
बन्धः क्व
बंधन कहाँ है?
वा मोक्षः च क्व
और मोक्ष कहाँ है?
हर्षः क्व विषादिता क्व
हर्ष कहाँ है और विषाद कहाँ है?

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अनंत रूपों में प्रकाशित होने वाले और अपने से भिन्न प्रकृति को न देखने वाले ज्ञानी के लिए बंधन कहाँ? मोक्ष कहाँ? हर्ष कहाँ और विषाद कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: बंधन और मोक्ष, हर्ष और शोक तब तक होते हैं जब तक मनुष्य अपने से भिन्न किसी ‘प्रकृति’ या ‘जगत’ को सत्य मानता है। किंतु जब ज्ञानी यह देखता है कि जो कुछ भी दिख रहा है वह उसकी अपनी ही अनंत चेतना का स्फुरण (प्रकाश) है और कोई दूसरी प्रकृति है ही नहीं, तब किससे बंधना और किससे छूटना? जब सब कुछ वह स्वयं ही है, तो न किसी लाभ पर हर्ष होता है और न किसी हानि पर विषाद।

सरल हिन्दी में समझें

जब आप किसी शीशमहल में खड़े होते हैं, तो आपको अपने ही हज़ारों चेहरे दिखाई देते हैं। क्या आप उनसे डरते हैं या उनसे दोस्ती करने के लिए हाथ बढ़ाते हैं? नहीं, आप जानते हैं कि वे सब आप ही हैं।

ज्ञानी व्यक्ति पूरी दुनिया में केवल अपनी ही चेतना का खेल देखता है। उसके लिए कोई दूसरा है ही नहीं जिससे वह डरे या नफरत करे।

इसलिए उसके लिए न कोई जेल है, न कोई आज़ादी, न कोई खुशी का पागलपन और न कोई गम का रोना। वह सदा अखंड आनंद में रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. अनन्तरूपेण स्फुरतः अद्वैत वेदांत की सर्वस्वरूपता (सर्वं खल्विदं ब्रह्म) का साक्षात दर्शन है। 2. प्रकृतिं न पश्यतः सांख्य के प्रकृति-पुरुष द्वैत के पार जाने की अद्वैत स्थिति है। 3. क्व बन्धः क्व मोक्षः मांडूक्य कारिका के ‘न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः’ (२.३२) की प्रत्यक्ष पुष्टि है। 4. हर्ष और विषाद का अभाव द्वंद्वातीत आत्म-स्थिति का शाश्वत लक्षण है। 5. साधक को बंधन और मोक्ष के भ्रम से मुक्त करके अपनी नित्य अनंतता का बोध कराता है।

उदाहरण से समझें: जैसे सोने के लिए हार, कंगन और कुंडल सब सोना ही हैं, कोई अलग वस्तु नहीं, वैसे ही ज्ञानी के लिए सारा जगत अपनी ही चेतना का विस्तार है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक लेखक जब अपनी लिखी हुई कहानी के सारे पात्रों—नायक, खलनायक और विदूषक—को अपनी ही कल्पना का रूप देखता है, तो वह किसी से नफरत नहीं करता; ज्ञानी संसार को ऐसे ही देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: बंधन और मोक्ष के झगड़े से बाहर निकलिए; पूरी सृष्टि आपकी अपनी चेतना का विस्तार है, यहाँ न कोई डर है न कोई गम।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘क्व बन्धः क्व मोक्षः’ का अर्थ जीवन की जिम्मेदारियों को नकारना नहीं है; यह पारमार्थिक सत्य का सर्वोच्च साक्षात्कार है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब किसी से ईर्ष्या या क्रोध आए, तो तुरंत सोचें: "वह भी मेरी ही चेतना का एक रूप है, दूसरा कोई है ही नहीं।" (क्रोध के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने आप को एक छोटा, कमजोर और बद्ध जीव मानकर मोक्ष के लिए छटपटा रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "यह सारा ब्रह्मांड मेरी ही अनंत चेतना में चमक रहा है; न कोई बंधन है, न मोक्ष, केवल मैं ही मैं हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अनंत रूप से प्रकाशित और प्रकृति को न देखने वाले के लिए कहाँ बंधन, कहाँ मोक्ष, कहाँ हर्ष और कहाँ शोक?

English

Translation: Shining as the infinite form, seeing no independent Nature, where is bondage and where is liberation, where is joy and where is sorrow?

Simple explanation: Radiating as infinite consciousness and beholding no separate objective Nature, where is bondage and where is liberation, where is elation and where is dejection?

विषय और संबंधित श्लोक

  • अनन्त-स्फुरण
  • प्रकृति-बाध
  • बन्ध-मोक्ष-पार
  • अद्वैत-समता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.71: शमहेतुकम्।
  • श्लोक 18.73: बुद्धिपर्यन्तसंसारे।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 373–375 (PDF पृ. 380–382)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का बहत्तरवाँ श्लोक।