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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.74
सत्यापित
मूल संस्कृत
अक्षयं गतसन्तापमात्मानं पश्यतो मुनेः । क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा ॥ ७४ ॥
IAST लिप्यंतरण
akṣayaṃ gatasantāpam ātmānaṃ paśyato muneḥ | kva vidyā ca kva vā viśvaṃ kva deho'haṃ mameti vā || 74 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
अक्षयम्, गत-सन्तापम्, आत्मानम्, पश्यतः, मुनेः, क्व, विद्या, च, क्व, वा, विश्वम्, क्व, देहः, अहम्, मम, इति, वा
- अक्षयम् गत-सन्तापम् आत्मानम्
- अविनाशी और समस्त संतापों से रहित अपनी आत्मा को
- पश्यतः मुनेः
- साक्षात देखने वाले मननशील ज्ञानी के लिए
- विद्या च क्व
- विद्या (ज्ञान की साधना) कहाँ?
- वा विश्वम् क्व
- और यह विश्व कहाँ?
- क्व देहः
- और यह देह कहाँ?
- अहम् मम इति वा क्व
- और ‘यह मैं हूँ’ अथवा ‘यह मेरा है’ का भाव कहाँ?
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अविनाशी और समस्त संतापों से रहित अपनी आत्मा को साक्षात देखने वाले मुनि के लिए विद्या कहाँ? विश्व कहाँ? देह कहाँ? और ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ का भाव कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: जब मनुष्य अपनी आत्मा को पहचान लेता है जो कभी नष्ट नहीं होती (अक्षय) और जिसमें तीनों ताप (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) कभी नहीं पहुँचते, तब उसकी दृष्टि से सारे द्वैत विलीन हो जाते हैं। अब उसके लिए न कोई विश्व है, न देह है, और न "मैं" और "मेरा" की कोई कल्पना। यहाँ तक कि विद्या (अविद्या को काटने वाला ज्ञान) भी अपना काम करके शांत हो जाती है। केवल एक अखंड सच्चिदानंद सत्ता शेष रहती है।
सरल हिन्दी में समझें
जब बीमारी पूरी तरह ठीक हो जाती है, तो क्या आप दवा की शीशी को गले में लटकाए घूमते हैं? नहीं, दवा भी छोड़ दी जाती है।
जब किसी इंसान को अपनी अमर, अविनाशी और परम शांत आत्मा का अनुभव हो जाता है, तो उसके सारे दुख हमेशा के लिए मिट जाते हैं।
अब उसके लिए न तो यह दुनिया बचती है, न शरीर का बोझ, और न "यह मैं हूँ और यह मेरा है" का चक्कर। यहाँ तक कि पढ़ाई और ज्ञान के साधन भी पूरे हो जाते हैं। वह केवल अपनी पूर्ण शांति में रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. अक्षयं गतसन्तापम् आत्मा के नित्य-मुक्त और निर्विकार स्वभाव का अकाट्य प्रमाण है। 2. क्व विद्या च क्व वा विश्वम् ज्ञान और ज्ञेय दोनों के लय की तुरीयातीत स्थिति को दर्शाता है। 3. अहं मम इति वा देहाध्यास और अस्मिता का समूल उच्छेद है। 4. जब अधिष्ठान का ज्ञान हो जाता है तो अध्यस्त प्रपंच का अत्यंत अभाव सिद्ध होता है। 5. साधक को समस्त उपाधियों से परे अपनी अविनाशी आत्मा में विश्राम लेने का निर्देश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे लकड़ी को जलाने के बाद आग बुझाने वाली लकड़ी भी खुद जलकर राख हो जाती है, वैसे ही अविद्या को नष्ट करने के बाद विद्या भी शांत हो जाती है और केवल आत्मा शेष रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी परीक्षा में टॉप कर लेते हैं तो एडमिट कार्ड और नोट्स का कोई महत्व नहीं रह जाता; आत्मज्ञान होने पर सारे साधन ऐसे ही पूरे हो जाते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: आप अविनाशी और संताप-मुक्त आत्मा हैं; "मैं" और "मेरा" के छोटे दायरे से बाहर निकलिए, सारा ब्रह्मांड आपका स्वरूप है।
सामान्य गलतफहमी
आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘क्व देहः’ का अर्थ शरीर को नष्ट करना या उसका ध्यान न रखना नहीं है; यह देहाभिमान से मुक्ति की दार्शनिक ऊंचाई है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब "यह मेरा है" की कोई चिंता सताए, तो तुरंत कहें: "मेरी आत्मा अक्षय है, कोई सांसारिक हानि मुझे कम नहीं कर सकती।" (चिंता के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने इस नश्वर शरीर और छोटी सी पहचान को ही सब कुछ मानकर अनंत आत्मा को भूल बैठा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "कोई संताप नहीं, कोई विनाश नहीं; मैं अक्षय, शांत और ‘मैं-मेरे’ से परे अखंड परमात्मा हूँ।"
एक पंक्ति में सार: अविनाशी और संताप-रहित आत्मा को देखने वाले के लिए न विश्व है, न देह, न विद्या और न ‘मैं-मेरा’।
English
Translation: Beholding the Self as imperishable and free from all sorrow, where is knowledge, where is the world, where is the body, or where is "I" and "mine" for the sage?
Simple explanation: Beholding the Self as imperishable and utterly free of all sorrow, where is intellectual knowledge, where is the universe, where is the body, and where is "I" or "mine" for the liberated sage?
विषय और संबंधित श्लोक
- अक्षय-आत्मा
- गतसन्ताप
- अहं-मम-बाध
- विद्या-विश्व-पार
- श्लोक 18.73: निष्कामः शोभते बुधः।
- श्लोक 18.75: निरोधादीनि कर्माणि।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का चौहत्तरवाँ श्लोक।