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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.75
सत्यापित
मूल संस्कृत
निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि । मनोरथान् प्रलापांश्च कर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ॥ ७५ ॥
IAST लिप्यंतरण
nirodhādīni karmāṇi jahāti jaḍadhīr yadi | manorathān pralāpāṃś ca kartum āpnoty atatkṣaṇāt || 75 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
निरोध-आदीनि, कर्माणि, जहाति, जड-धीः, यदि, मनोरथान्, प्रलापान्, च, कर्तुम्, आप्नोति, अतत्क्षणात्
- यदि जड-धीः जहाति
- यदि मंदबुद्धि (अज्ञानी) मनुष्य छोड़ देता है
- निरोध-आदीनि कर्माणि
- मन के निरोध और ध्यान आदि साधना के कर्मों को
- अतत्क्षणात् आप्नोति कर्तुम्
- तो वह तुरंत करने लग जाता है
- मनोरथान् प्रलापान् च
- मन के हवाई महल (कामनाएँ) और व्यर्थ की बकवास
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
यदि मंदबुद्धि अज्ञानी मनुष्य बिना आत्मज्ञान के हठपूर्वक ध्यान और निरोध आदि कर्मों को छोड़ देता है, तो वह तुरंत मन के हवाई महल बनाने और व्यर्थ प्रलाप करने में लग जाता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अष्टावक्र की अत्यंत यथार्थवादी चेतावनी है। पिछले श्लोकों में उन्होंने ज्ञानी के लिए साधना और निरोध की अनावश्यकता बताई थी। किंतु यदि कोई अपरिपक्व साधक (जडधीः) बिना आत्म-साक्षात्कार के ही साधना, ध्यान और संयम को छोड़ दे, तो उसका मन शांत नहीं होगा; बल्कि वह तुरंत सांसारिक वासनाओं, ख्याली पुलावों (मनोरथान्) और व्यर्थ की बातों में भटक जाएगा। इसलिए जब तक सच्चा ज्ञान न हो, तब तक साधना का त्याग नहीं करना चाहिए।
सरल हिन्दी में समझें
अगर कोई कच्चा तैराक यह सोचकर कि "महान तैराक तो बिना हिले पानी पर तैरते हैं", हाथ-पैर चलाना बंद कर दे, तो क्या होगा? वह तुरंत डूब जाएगा।
अष्टावक्र समझाते हैं कि आत्मज्ञान से पहले साधना छोड़ देना बहुत खतरनाक है।
जो अज्ञानी बिना समझ के ध्यान और संयम छोड़ देता है, उसका दिमाग तुरंत फालतू के ख्याली पुलाव पकाने लगता है और वह दिनभर व्यर्थ की बकवास में समय बर्बाद करने लगता है। मन को शांत किए बिना साधना छोड़ना पतन का रास्ता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. जडधीर्यदि जहाति अपरिपक्व साधकों द्वारा की जाने वाली आध्यात्मिक भूलों की ओर स्पष्ट संकेत है। 2. मनोरथान् प्रलापांश्च वासनाओं के उस वेग को दर्शाता है जो संयम हटने पर अनियंत्रित हो जाता है। 3. साधना का त्याग ज्ञान के फलस्वरूप स्वतः होना चाहिए, आलस्य या अहंकार से जबरन नहीं। 4. यह गीता के ‘कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥’ (३.६) की प्रत्यक्ष पुष्टि है। 5. साधक को पाखंडी संन्यास से बचाकर प्रामाणिक आंतरिक साधना में लगे रहने की चेतावनी देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे बिना लगाम का घोड़ा अगर रोक न पाए तो खाई में गिर जाता है, वैसे ही बिना आत्मज्ञान के साधना छोड़ने वाला साधक वासनाओं के गड्ढे में गिर जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
डाइट और एक्सरसाइज़ के अनुशासन को यह कहकर छोड़ देना कि "मैं तो शरीर से परे आत्मा हूँ", और फिर दिनभर जंक फूड खाकर बीमार पड़ जाना; अपरिपक्व साधक साधना छोड़कर ऐसे ही भटकता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अहंकार में आकर साधना मत छोड़िए; जब तक सच्चा आत्मज्ञान न हो, तब तक अनुशासन और संयम ही आपकी रक्षा करते हैं।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘जहाति जडधीः’ का अर्थ ध्यान या निरोध की निंदा करना नहीं है; यह बिना पात्रता के साधना छोड़ने के खतरे से सावधान करना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज अपनी दैनिक साधना और अच्छे नियमों को आलस्य के कारण न छोड़ें; उन्हें पूरी निष्ठा से निभाएँ। (साधना के नियम में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अद्वैत की ऊँची-ऊँची बातें करके अपनी साधना और अनुशासन से जी चुरा रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपनी सांसों पर एकाग्र हों; अनुभव करें कि जब तक मन पूरी तरह शांत न हो, तब तक सजगता ही सबसे बड़ा कवच है।
एक पंक्ति में सार: यदि अज्ञानी हठ से साधना छोड़ दे, तो वह तुरंत ख्याली पुलाव और व्यर्थ प्रलाप में भटक जाता है।
English
Translation: If the dull-witted gives up mental restraint and practices, he immediately falls into daydreaming and rambling prattle.
Simple explanation: If the dull-witted person prematurely abandons practices like mental restraint, he immediately succumbs to endless daydreams and idle prattling.
विषय और संबंधित श्लोक
- अपरिपक्व-त्याग-चेतावनी
- जडधी-लक्षण
- मनोरथ-प्रलाप
- साधना-मर्यादा
- श्लोक 18.74: क्व विद्या च क्व वा विश्वम्।
- श्लोक 18.76: मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का पचहत्तरवाँ श्लोक।