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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.77
सत्यापित
मूल संस्कृत
ज्ञानाद् गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत् । नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ ७७ ॥
IAST लिप्यंतरण
jñānād galitakarmā yo lokadṛṣṭyāpi karmakṛt | nāpnoty avasaraṃ kartuṃ vaktum eva na kiñcana || 77 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
ज्ञानात्, गलित-कर्मा, यः, लोक-दृष्ट्या, अपि, कर्म-कृत्, न, आप्नोति, अवसरम्, कर्तुम्, वक्तुम्, एव, न, किञ्चन
- ज्ञानात् गलित-कर्मा यः
- ज्ञान के कारण जिसके समस्त कर्म विलीन हो चुके हैं
- लोक-दृष्ट्या अपि कर्म-कृत्
- वह संसार की दृष्टि में कर्म करता हुआ भी
- कर्तुम् अवसरम् न आप्नोति
- कुछ करने का अवसर (अहंकार) नहीं पाता
- वक्तुम् एव न किञ्चन
- और न उसके पास कहने के लिए कुछ बचता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
ज्ञान के कारण जिसके सारे कर्म गल चुके हैं, वह लोकदृष्टि में कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ करने का अवसर नहीं पाता, और न उसके पास कहने के लिए कुछ बचता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह वास्तविक ज्ञानी की आंतरिक स्थिति का वर्णन है। ज्ञानी के सारे कर्म आत्मज्ञान की अग्नि में जलकर गल चुके हैं। बाहर से लोग देखते हैं कि वह राजा की तरह न्याय कर रहा है, खा रहा है या चल रहा है, किंतु ज्ञानी के अंतःकरण में "मैं कुछ कर रहा हूँ" का कोई अवसर या स्थान ही नहीं बचता। उसका अहंकार इतना शून्य हो चुका है कि वह न किसी कर्म का कर्ता बनता है और न अपने ज्ञान का बखान करने के लिए कोई शब्द बोलता है। वह परम मौन में जीता है।
सरल हिन्दी में समझें
जब किसी कठपुतली का नाच होता है, तो क्या कठपुतली अपनी मर्ज़ी से नाचती है? नहीं, धागे तो पीछे खड़े कलाकार के हाथ में होते हैं।
ज्ञानी व्यक्ति का शरीर भी परमात्मा के हाथों में एक कठपुतली की तरह हो जाता है। बाहर से देखने पर लगता है कि वह सब कुछ कर रहा है।
लेकिन अंदर से वह जानता है कि करने वाली प्रकृति है, वह खुद कुछ नहीं करता। उसके पास न तो किसी काम का घमंड जताने का मौका होता है और न बड़ी-बड़ी बातें बनाने का। वह पूरी तरह शांत और मौन रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. ज्ञानाद् गलितकर्मा ज्ञानाग्नि में समस्त संचित और क्रियमाण कर्मों के भस्म होने का प्रमाण है (गीता ४.३७)। 2. लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत् व्यावहारिक और पारमार्थिक दृष्टि के भेद को स्पष्ट करता है—बाहर से कर्ता, भीतर से अकर्ता। 3. नाप्नोत्यवसरं कर्तुम् कर्ता-अहंकार के आत्यंतिक अभाव का सूचक है जहाँ संकल्प की कोई जगह नहीं। 4. वक्तुमेव न किञ्चन वाक्-प्रपंच के उपशम और परम तूष्णीम् (मौन) की अवस्था है। 5. साधक को वाचालता और कर्तापन दोनों को विदा करके परम शांति में प्रतिष्ठित होने का उपदेश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे भुना हुआ बीज खेत में बोने पर भी अंकुरित नहीं होता, वैसे ही ज्ञान से गले हुए कर्म कोई नया संस्कार पैदा नहीं करते। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक स्वचालित मेट्रो ट्रेन जिसमें ड्राइवर के केबिन में कोई नहीं बैठा, फिर भी ट्रेन समय पर चल रही है और रुक रही है; ज्ञानी का शरीर बिना कर्ता के ऐसे ही सुचारू चलता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने किए गए कामों का ढोल पीटना बंद कीजिए; जब कर्तापन का अहंकार मिटता है, तो बोलना और करना सब शांत हो जाता है।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘नाप्नोत्यवसरम्’ का अर्थ समाज में गूंगा या अकर्मण्य हो जाना नहीं है; यह आंतरिक अहंकार और वाचालता की समाप्ति है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई काम बहुत अच्छा हो जाए, तो अपनी तारीफ़ करने के बजाय मौन रहकर मुस्कुराएँ। (सफलता के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने हर छोटे काम का श्रेय लेने और उसके बारे में डींगें हाँकने का मौका ढूँढता रहता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट पूर्ण मौन में बैठें; न कुछ बोलना है न योजना बनानी है; केवल अपनी शांत अकर्ता उपस्थिति में विश्राम लें।
एक पंक्ति में सार: ज्ञान से जिसके कर्म गल गए, वह कर्म करता हुआ भी अकर्ता रहता है और उसके पास कहने को कुछ नहीं बचता।
English
Translation: He whose actions have dissolved through knowledge, though appearing active to worldly eyes, finds no occasion to act, nor anything at all to say.
Simple explanation: One whose actions have completely dissolved through Self-knowledge, though appearing active to worldly observers, finds no internal occasion to act, nor anything whatsoever left to say.
विषय और संबंधित श्लोक
- गलितकर्मा
- लोकदृष्ट्या-कर्म
- परम-मौन
- अकर्ता-स्थिति
- श्लोक 18.76: अन्तर्विषयलालसः।
- श्लोक 18.78: क्व तमः क्व प्रकाशो वा।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का सतहत्तरवाँ श्लोक।