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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ७८/१००78%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.78

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन । निर्विकारस्य धीरस्य निरातङ्कस्य सर्वदा ॥ ७८ ॥

IAST लिप्यंतरण

kva tamaḥ kva prakāśo vā hānaṃ kva ca na kiñcana | nirvikārasya dhīrasya nirātaṅkasya sarvadā || 78 ||

सरल उच्चारण: kva tamah kva prakaasho vaa haanam kva cha na kinychana nirvikaarasya dheerasya niraatangkasya sarvadaa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, तमः, क्व, प्रकाशः, वा, हानम्, क्व, च, न, किञ्चन, निर्विकारस्य, धीरस्य, निरातङ्कस्य, सर्वदा

निर्विकारस्य धीरस्य
निर्विकार और धैर्यवान ज्ञानी के लिए
सर्वदा निरातङ्कस्य
जो सदा समस्त भयों और संतापों से सर्वथा मुक्त (निरातंक) है
तमः क्व प्रकाशः वा क्व
अंधकार (अज्ञान) कहाँ और प्रकाश (ज्ञान) कहाँ?
हानम् क्व च
और किसी वस्तु की हानि (छूट जाना) कहाँ?
किञ्चन न
कुछ भी नहीं है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

सदा निर्विकार और समस्त भयों से मुक्त धीर ज्ञानी के लिए अंधकार कहाँ? प्रकाश कहाँ? और किसी वस्तु की हानि कहाँ? उसके लिए कुछ भी नहीं है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: अंधकार और प्रकाश, हानि और लाभ द्वैत के धर्म हैं। जब तक मनुष्य अज्ञान में होता है, तब तक उसे अविद्या का अंधकार और ज्ञान का प्रकाश अलग-अलग दिखता है; उसे चीज़ों के खोने का डर रहता है। किंतु जो ज्ञानी निर्विकार हो चुका है और जिसके सारे भय (आतंक) मिट चुके हैं, वह जानता है कि आत्मा स्वयंप्रकाश है। वहाँ न अज्ञान का अंधेरा है और न ज्ञान का कोई अलग प्रकाश; न कुछ खोने को है और न पाने को। वह पूर्णतः निर्भय और शांत रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

सूरज के सामने जाकर अगर कोई पूछे कि "यहाँ रात का अंधेरा कहाँ है और दिन का उजाला कहाँ है?", तो सूरज क्या कहेगा? सूरज तो बस प्रकाश ही प्रकाश है, उसके लिए अंधेरा कभी था ही नहीं।

ज्ञानी व्यक्ति की स्थिति भी उस सूरज जैसी हो जाती है। उसके मन में न तो अज्ञान का डर रहता है और न कुछ खोने की चिंता।

उसके सारे डर हमेशा के लिए खत्म हो चुके हैं। वह पूरी तरह शांत, स्थिर और निर्भय होकर अपनी आत्मा में चमकता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. निरातङ्कस्य सर्वदा अद्वैत ज्ञान के फल ‘अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि’ (बृहदारण्यक ४.२.४) की प्रत्यक्ष सिद्धि है। 2. क्व तमः क्व प्रकाशः वा ज्ञान और अज्ञान दोनों के द्वंद्व से पार तुरीयावस्था का निर्देश है। 3. हानं क्व च आत्मा की अखंडता को सिद्ध करता है—जहाँ कोई अभाव नहीं, वहाँ हानि कैसी?। 4. निर्विकारस्य आत्मा के शाश्वत कूटस्थ स्वभाव की प्रतिष्ठा है। 5. साधक को आध्यात्मिक भय और असुरक्षा से मुक्त होकर अपने मूल अभय-स्वरूप में टिकने की प्रेरणा देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे अंतरिक्ष में कोई तूफान किसी तारे को तोड़ नहीं सकता, वैसे ही संसार का कोई उतार-चढ़ाव निरातंक ज्ञानी को डरा नहीं सकता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी किले के अंदर पूरी तरह सुरक्षित होते हैं, तो बाहर की बारिश और आँधी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती; आत्मा में स्थित ज्ञानी संसार के संकटों में ऐसे ही निडर रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: डरना बंद कीजिए; आपकी आत्मा में न कोई अंधेरा है न कोई नुकसान हो सकता है, आप सदा से निर्भय और अखंड हैं।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘हानं क्व’ का अर्थ व्यावहारिक नुकसान की अनदेखी करना नहीं है; यह आत्म-स्तर पर किसी भी क्षति के अभाव का बोध है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन में किसी अनहोनी का डर सताए, तो सीना तानकर कहें: "मेरी आत्मा निर्विकार और निरातंक है, मुझे कोई भय नहीं छू सकता।" (भय के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने जीवन में लगातार कुछ खो जाने या भविष्य के अंधेरे से डर-डरकर जी रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "कोई अंधकार नहीं, कोई नुकसान नहीं; मैं निर्विकार, निरातंक और अखंड ज्योतिस्वरूप आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: निर्विकार और सदा निर्भय ज्ञानी के लिए न अंधकार है न प्रकाश, और न किसी वस्तु की हानि।

English

Translation: Where is darkness, where is light, or where is loss of anything, for the steadfast one who is ever changeless and free from all fear?

Simple explanation: Where is darkness, where is light, or where is loss of anything whatsoever, for the steadfast sage who is eternally changeless and utterly free from terror?

विषय और संबंधित श्लोक

  • निरातंक-स्थिति
  • अभय-बोध
  • निर्विकार-आत्मा
  • हानि-लाभ-पार
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.77: ज्ञानाद् गलितकर्मा यो।
  • श्लोक 18.79: क्व धैर्यं क्व विवेकित्वम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 385–387 (PDF पृ. 392–394)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का अठहत्तरवाँ श्लोक।