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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.88
सत्यापित
मूल संस्कृत
निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ ८८ ॥
IAST लिप्यंतरण
nirmamaḥ śobhate dhīraḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ | subhinnahṛdayagranthir vinirdhūtarajastamaḥ || 88 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
निर्ममः, शोभते, धीरः, सम-लोष्ट-अश्म-काञ्चनः, सुभिन्न-हृदय-ग्रन्थिः, विनिर्धूत-रजस्-तमः
- धीरः शोभते
- धीर ज्ञानी परम सुशोभित होता है
- निर्ममः
- ममता (मेरेपन के भाव) से सर्वथा रहित
- सम-लोष्ट-अश्म-काञ्चनः
- जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना तीनों एक समान हैं
- सुभिन्न-हृदय-ग्रन्थिः
- जिसके हृदय की अविद्या रूपी गाँठ पूरी तरह कट चुकी है
- विनिर्धूत-रजस्-तमः
- और जिसके रजोगुण और तमोगुण सर्वथा धुल (नष्ट) चुके हैं
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
ममतारहित, मिट्टी, पत्थर और सोने को समान समझने वाला, जिसके हृदय की अविद्या-ग्रंथि कट चुकी है और जिसके रजोगुण-तमोगुण धुल चुके हैं—वह धीर ज्ञानी परम सुशोभित होता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह उपनिषदों के प्रसिद्ध सत्य ‘भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः’ (मुंडक २.२.८) का साकार रूप है। हृदय की ग्रंथि क्या है? चित्त और जड़ शरीर का आपस में यह गाँठ बाँध लेना कि "मैं शरीर हूँ और यह मेरा है।" जब आत्मज्ञान की कृपा से यह अविद्या रूपी गाँठ खुल जाती है, तो मनुष्य के सारे दोष और विकार धुल जाते हैं। अब उसके लिए मिट्टी का ढेला और सोने का ढेर दोनों एक समान मिट्टी के विकार मात्र हैं। वह परम निर्मम होकर चमकता है।
सरल हिन्दी में समझें
जब तक इंसान को सोने की चमक लुभाती है, तब तक वह लालच का गुलाम रहता है।
लेकिन ज्ञानी व्यक्ति की आँखें इतनी साफ़ हो चुकी हैं कि उसके लिए चाहे रास्ते का पत्थर हो, मिट्टी का ढेला हो या सोने का बिस्कुट—तीनों केवल पृथ्वी के कण हैं। वह किसी के पीछे नहीं भागता।
उसके दिल के अंदर जो अज्ञान और अहंकार की गाँठ बंधी थी, वह खुल चुकी है। उसका मन बिल्कुल शीशे की तरह साफ़ और पवित्र हो चुका है। वह दुनिया का सबसे शांत और सुंदर इंसान बन जाता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. समलोष्टाश्मकाञ्चनः गीता के ६.८ और १४.२४ के समत्व की अद्वैत पराकाष्ठा है। 2. सुभिन्नहृदयग्रन्थिः अहंकार और आत्मा के अध्यास के आत्यंतिक नाश का शास्त्रीय प्रमाण है। 3. विनिर्धूतरजस्तमः चित्त की पूर्ण सत्व-शुद्धि और गुणातीत स्थिति का निर्देश करता है। 4. निर्ममः स्वामित्व के भ्रम से मुक्ति का नाम है—जहाँ सब ब्रह्म है वहाँ मेरा क्या?। 5. साधक को सांसारिक लालच और हृदय की संकीर्णताओं को काटकर शुद्ध आत्म-प्रकाश में जीने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे रस्सी में लगी हुई कठिन गाँठ खुलते ही रस्सी सीधी और सहज हो जाती है, वैसे ही हृदय की ग्रंथि खुलते ही मनुष्य का अंतःकरण परम सरल और मुक्त हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी म्यूजियम में सोने की पुरानी मोहरों और मिट्टी के पुराने बर्तनों को केवल ऐतिहासिक वस्तु के रूप में देखते हैं बिना किसी को चुराने की लालच के; ज्ञानी धन-दौलत को ऐसे ही तटस्थ भाव से देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सोने और मिट्टी के पीछे पागल होना छोड़िए; अपने दिल की अज्ञान की गाँठ खोलिए, आपका सच्चा खज़ाना आपकी आत्मा है।
सामान्य गलतफहमी
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘समलोष्टाश्मकाञ्चनः’ का अर्थ समाज में धन का अव्यवहारिक दुरुपयोग करना नहीं है; यह आंतरिक निष्कामता और लोभ-मुक्ति का प्रतीक है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब पैसों या गहनों का कोई लालच मन में आए, तो कहें: "यह सब मिट्टी का रूप है, मेरी आत्मा इन सबसे अनमोल और पूर्ण है।" (लोभ के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं धन-दौलत और सोने की चमक के पीछे इतना अंधा हो चुका हूँ कि अपने हृदय की शांति को भूल गया हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "हृदय की सारी गांठें खुल चुकी हैं; रज और तम का मैल धुल चुका है; मैं निर्मम, शांत और विशुद्ध आत्मा हूँ।"
एक पंक्ति में सार: ममता-रहित, मिट्टी और सोने को समान जानने वाला, हृदय-ग्रंथि से मुक्त ज्ञानी परम सुशोभित होता है।
English
Translation: Free from possessiveness, regarding earth, stone, and gold as equal, with the heart’s knot rent asunder and impurities washed away, the wise shines.
Simple explanation: Void of possessiveness, regarding a clod of earth, a stone, and gold as equal, with the knots of the heart entirely severed and the dust of passion and darkness shaken off, the steadfast sage shines resplendent.
विषय और संबंधित श्लोक
- समलोष्टाश्मकांचन
- हृदयग्रंथि-भेद
- निर्मम-स्थिति
- गुणातीत
- श्लोक 18.87: केवलो रमते बुधः।
- श्लोक 18.89: सर्वत्रानवधानस्य।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का अठासीवाँ श्लोक।