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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ८९/१००89%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.89

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि । मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९ ॥

IAST लिप्यंतरण

sarvatrānavadhānasya na kiñcid vāsanā hṛdi | muktātmano vitṛptasya tulanā kena jāyate || 89 ||

सरल उच्चारण: sarvatraanavadhaanasya na kinychid vaasanaa hridi muktaatmano vitriptasya tulanaa kena jaayate (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

सर्वत्र, अनवधानस्य, न, किञ्चित्, वासना, हृदि, मुक्त-आत्मनः, वितृप्तस्य, तुलना, केन, जायते

सर्वत्र अनवधानस्य
संसार के समस्त प्रपंचों के प्रति स्वाभाविक रूप से असावधान (उदासीन) रहने वाले
हृदि किञ्चित् वासना न
जिसके हृदय में तनिक भी कोई वासना या कामना नहीं है
मुक्त-आत्मनः वितृप्तस्य
उस पूर्ण तृप्त और मुक्त आत्मा की
तुलना केन जायते
तुलना किसके साथ की जा सकती है? (वह सर्वथा अतुलनीय है)

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

संसार के प्रपंचों के प्रति सर्वथा उदासीन, जिसके हृदय में तनिक भी वासना नहीं है—उस पूर्ण तृप्त और मुक्त आत्मा की तुलना संसार में किससे की जा सकती है?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह मुक्त पुरुष की अतुलनीय महिमा का गान है। ‘अनवधानस्य’ का अर्थ है कि ज्ञानी का ध्यान संसार के झगड़ों, प्रलोभनों और षड्यंत्रों में नहीं उलझता; वह इन सबको तिनके के समान समझता है। उसके हृदय में न भोग की वासना है और न मान की। वह अपनी आत्मा के परमानंद से इतना छककर तृप्त (वितृप्त) हो चुका है कि तीनों लोकों में ऐसा कोई राजा, देवता या चक्रवर्ती सम्राट नहीं है जिसकी तुलना उसके आनंद से की जा सके। वह सर्वथा अद्वितीय है।

सरल हिन्दी में समझें

इस दुनिया में हम हमेशा तुलना करते रहते हैं कि "उसके पास मुझसे बड़ी गाड़ी है, उसका घर मुझसे बड़ा है।" लेकिन क्या सूरज की रोशनी की तुलना किसी दीए से हो सकती है?

जिस इंसान के दिल से सारी इच्छाएं मिट चुकी हैं और जो अपनी आत्मा के आनंद से पूरी तरह भर चुका है, उसकी बराबरी दुनिया का कोई भी अमीर आदमी नहीं कर सकता।

वह दुनिया के फालतू प्रपंचों की तरफ देखता भी नहीं। वह इतना मस्त और संतुष्ट है कि उसकी खुशी की तुलना किसी से नहीं की जा सकती।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. तुलना केन जायते अद्वैत जीवनमुक्ति के अद्वितीय और अनुपम स्वरूप की घोषणा है। 2. अनवधानस्य संसार के प्रति अद्वैत उपेक्षा (supreme indifference) का सूचक है जहाँ द्वैत का कोई महत्व नहीं। 3. न किञ्चिद्वासना हृदि अंतःकरण की पूर्ण निष्कामता का अकाट्य प्रमाण है। 4. वितृप्तस्य वह परम तृप्ति है जिसके बाद किसी अन्य रस की अपेक्षा नहीं रहती (तैत्तिरीय २.८ ‘श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य’)। 5. साधक को सांसारिक तुलनाओं और होड़ से निकालकर आत्म-तृप्ति के अतुलनीय पद की ओर ले जाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे हिमालय के शिखर की तुलना किसी कंकड़ के ढेर से नहीं की जा सकती, वैसे ही मुक्त आत्मा के आनंद की तुलना किसी सांसारिक सुख से नहीं हो सकती। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति भी रात को नींद की गोलियां खाते हैं, जबकि एक आत्मज्ञानी पेड़ के नीचे बेफिक्र सोता है; ज्ञानी की शांति की तुलना किसी अरबपति की दौलत से नहीं हो सकती। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दूसरों से अपनी तुलना करना बंद कीजिए; जब आपके भीतर आत्म-शांति का खज़ाना है, तो आपकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘अनवधानस्य’ का अर्थ सड़क पर चलते समय बेपरवाह होकर दुर्घटना करा लेना नहीं है; यह सांसारिक प्रलोभनों के प्रति अनासक्ति का प्रतीक है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब किसी दूसरे की तरक्की या दौलत देखकर जलन हो, तो तुरंत कहें: "मेरी आत्मा अद्वितीय और पूर्ण तृप्त है, मुझे किसी से तुलना नहीं करनी।" (तुलना के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं लगातार अपनी ज़िंदगी की तुलना दूसरों से करके अपनी अंदरूनी शांति का अपमान कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मुझमें कोई कमी नहीं, कोई चाह नहीं; मेरी आत्मा अद्वितीय, पूर्ण तृप्त और अतुलनीय है।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: संसार में उदासीन और वासना-रहित उस पूर्ण तृप्त मुक्त पुरुष की तुलना किससे की जा सकती है?

English

Translation: Careless of everything, with not a trace of desire in his heart—with whom can that liberated, contented soul be compared?

Simple explanation: Paying no heed to worldly distractions, harboring not the slightest craving in his heart—with whom can that liberated, supremely contented soul ever be compared?

विषय और संबंधित श्लोक

  • अतुलनीय-महिमा
  • अनवधान
  • वितृप्त-आत्मा
  • वासना-शून्यता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.88: विनिर्धूतरजस्तमः।
  • श्लोक 18.90: जानन्नपि न जानाति।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 407–409 (PDF पृ. 414–416)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का नवासीवाँ श्लोक।