दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

प्रकरण 19: उन्नीसवाँ प्रकरणश्लोक ३/८38%

अध्याय 19 · धारणाओं से परे

अष्टावक्र गीता, श्लोक 19.3

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

क्व भूतं क्व भविष्यद् वा वर्तमानमपि क्व वा । क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ३ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva bhūtaṃ kva bhaviṣyad vā vartamānam api kva vā | kva deśaḥ kva ca vā nityaṃ svamahimni sthitasya me || 3 ||

सरल उच्चारण: kva bhootam kva bhavishyad vaa vartamaanam api kva vaa kva deshah kva cha vaa nityam svamahimni sthitasya me (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, भूतम्, क्व, भविष्यत्, वा, वर्तमानम्, अपि, क्व, वा, क्व, देशः, क्व, च, वा, नित्यम्, स्व-महिम्नि, स्थितस्य, मे

क्व भूतम् क्व भविष्यत्
भूतकाल कहाँ, भविष्य कहाँ
वर्तमानम् अपि क्व
वर्तमान भी कहाँ
क्व देशः
देश या स्थान कहाँ
क्व नित्यम्
नित्य कहाँ, अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए भूत कहाँ, भविष्य कहाँ, वर्तमान भी कहाँ, स्थान कहाँ और नित्य भी कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

काल के तीनों नाम और देश तथा नित्य एक ही प्रश्न में आते हैं। जनक समय का इनकार नहीं करते। वे उसकी पकड़ पूछते हैं। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।

सरल हिन्दी में समझें

बीता कल, आने वाला कल, और यही क्षण। हम अक्सर इन्हीं तीन में बँटे रहते हैं। स्थान और नित्यता भी ऐसे ही नाम हैं।

जनक कहते हैं कि अपनी महिमा में ये कहाँ ठहरते हैं।

आज का काम, आज की नींद और आज का वादा इस श्लोक से नहीं कटता। कटती है वह बेचैनी जो कल को वर्तमान से बड़ा बनाए रखती है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों पूछे गए हैं। केवल भविष्य का विरोध नहीं है। 2. वर्तमानमपि कहकर वर्तमान को भी बचाकर नहीं रखा गया। 3. देश स्थान है। नित्य उसका जोड़ा है, अनंत काल या सर्वत्र का नाम। 4. काल और देश अनुभव के चौखटे हैं। चौखटा मिटाने से सड़क नहीं मिटती। 5. स्वमहिम्नि स्थितस्य मे फिर वही ठहराव है। 6. योजना बनाना इस श्लोक का निषेध नहीं है।

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।

उदाहरण से समझें: जैसे घड़ी समय बताती है पर घड़ी ही दिन नहीं बन जाती, वैसे ही काल के नाम अनुभव को मापते हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कल की सूची उपयोगी रहती है, पर कोई व्यक्ति उसे रात की नींद से बड़ा नहीं रहने देता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: भूत और भविष्य को देखें। उन्हें वर्तमान की साँस और आज के काम से बड़ा न बनने दें।

सामान्य गलतफहमी

काल कहाँ है, इसका अर्थ यह नहीं कि वादा, समय-सारणी या किसी की प्रतीक्षा छोड़ दी जाए।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज की एक योजना रखें, और उसे पूरा करते समय केवल यही काम देखें। (दिन की सूची में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं बीते और आने वाले कल को इस साँस से अधिक सच माने बैठा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट केवल बैठें। भूत का एक चित्र आए तो उसका नाम लेकर छोड़ें। आज का एक आवश्यक काम याद रखें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अपनी महिमा में मेरे लिए भूत, भविष्य, वर्तमान, स्थान और नित्य कहाँ हैं?

English

Translation: Where is past, future, or even the present, where is place, where is the eternal, for me established in my own majesty?

Simple explanation: Time and place remain usable. Janaka asks where they stand once he is established in his own majesty.

विषय और संबंधित श्लोक

  • काल-प्रश्न
  • देश-और-नित्य
  • स्वमहिमन्
  • वर्तमान-भी
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 19.2: क्व धर्मः क्व च
  • श्लोक 19.4: क्व चात्मा क्व च

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के नवदश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।